गांधी की छवि बिगाडऩे का खेल

  • 2016-01-30 09:30:56.0
  • भगवान सिंह

कभी तुलसीदास ने राम को लेकर कहा था ‘ऐसो को उदार जग माहीं’। कुछ इसी तर्ज पर इन दिनों कुछेक सुधीजन ‘गांधी जस उदार कोई नाहीं’ का बखान करने में लगे हैं। निस्संदेह गांधी बहुत उदार थे, गतिशील थे, जड़तावादी नहीं थे, इसीलिए तो उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम रखा ‘सत्य के प्रयोग’। सत्य को लेकर वे जीवनपर्यंत प्रयोगशील रहे, जो उनकी गत्यात्मकता, लचीलेपन और उदारता का भी प्रमाण है। यहां तक तो गांधी की उदारता या गतिशीलता की बात ठीक है, लेकिन जब उनकी इस उदारता को बढ़ा-चढ़ा कर या तोड़-मरोड़ कर इस रूप में पेश किया जाता है कि गांधी न मांसाहार के विरुद्ध थे, न गोहत्या के विरुद्ध, न मदिरापान के विरुद्ध, तो दाल में काला ही काला नजर आने लगता है।

gandhi गांधी की छवि

पिछले दिनों कुछ पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों और निजी टीवी चैनलों पर हुई कुछ बहसों ने गांधी की ऐसी ही छवि पेश की है। कुछ सज्जन गांधी की उदारता पर मुग्ध होकर बताते हैं कि गांधी खुद तो शाकाहारी थे, पर अपने आश्रम में अतिथियों को सामिष भोजन कराने से परहेज नहीं करते थे। इसके प्रमाणस्वरूप वे यह तथ्य प्रस्तुत करते हैं कि जब कभी सीमांत गांधी यानी खान अब्दुल गफ्फार खां साबरमती आश्रम में आते थे, तो उनके लिए सामिष भोजन परोसा जाता था। यह बात एक प्रसिद्ध पत्रकार ने भी कुछ समय पहले इसी अखबार में लिखी थी। उन्होंने यह भी बताया था कि चूंकि मौलाना अबुल कलाम आजाद मदिरापान करते थे, इसलिए गांधी अपने आश्रम में उनके लिए मदिरा की भी व्यवस्था रखते थे। अभी कुछ दिन पूर्व एक निजी चैनल पर हो रही बहस में हिंदी के एक महाज्ञानी प्रोफेसर साहब भी यह ज्ञान दे गए कि गांधी इतने उदार थे कि आश्रम में बैठक समाप्त होने के बाद मदिरापान के आदी मौलाना आजाद को मदिरापान कराते थे। इस प्रकार गांधी की उदारता के नए-नए किस्से इन दिनों खूब गढ़े जा रहे हैं। सच कहें, तो इस प्रकार के वक्तव्य गांधी की उदारता दर्शाने के लिए नहीं, बल्कि उनके द्वारा जिये गए मूल्यों पर हमले के शातिर तरीकों के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। निस्संदेह बगैर उदारता के कोई व्यक्ति महान नहीं हो सकता। उदारता महानता की जननी होती है। पर ध्यान रहे रबर के लचीलेपन की खुशफहमी में हम उसे इतना न खींच दे कि वह टुकड़े-टुकड़े हो जाए, वीणा के तारों को इतना न ऐंठ दें कि तार ही टूट जाएं। इसी तरह किसी व्यक्ति को महान बताने के लिए उसमें इतनी उदारता न तलाशी जाए कि उसके सारे जीवन-मूल्य, सिद्धांत ही धूल-धूसरित हो जाएं और वह ‘बिना पेंदी का लोटा’ कहलाने लगे। जहां तक मांसाहार का सवाल है, यह सर्वविदित है कि गांधी पक्के शाकाहारी थे। बचपन में चार-पांच बार बुरी सोहबत में मांसाहार कर चुके गांधी ने हमेशा-हमेशा के लिए इसका परित्याग कर दिया। बैरिस्ट्री की पढ़ाई के लिए विलायत जाते वक्त मां पुतलीबाई द्वारा कराई गई तीन प्रतिज्ञाओं में एक थी कभी मांसाहार न करने की। लंदन पहुंच कर वहां वे शाकाहारी जमात के सदस्य बने, शाकाहार के पक्ष में किताबें पढ़ीं। यह सब उनकी आत्मकथा में दर्ज है। वे और उनकी पत्नी कस्तूरबाई ने मरणांतक बीमारियों में भी डॉक्टरों के कहने के बावजूद मांसाहार करना स्वीकार नहीं किया। दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स, टॉल्सटॉय आश्रमों से लेकर भारत तक, उनके आश्रमों में सबके लिए शाकाहारी भोजन का ही चलन रहा। प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर ने गांधी के बारे में लिखे अपने संस्मरणों में बताया है कि किस तरह सेवाग्राम आश्रम में जहां वे कुछ दिन तक गांधी के साथ रहे थे, सबके लिए सादा शाकाहारी भोजन बनता था। अब ऐसे निरामिश प्रेमी गांधी को मांसाहार का पक्षधर सिद्ध करने की कोशिश करना उनकी उदारता में चार-चांद लगाना है या उनकी उदारता की ऐसी-तैसी कर उनकी मिथ्या छवि गढऩा है? यह जरूर है कि गांधी मांसाहार का परित्याग किसी पर जर्बरदस्ती थोपने के पक्ष में कभी नहीं रहे। अगर मांसाहार किसी के लिए अपरिहार्य हो तो गांधी इस कारण उससे परहेज या घृणा करने वाले नहीं थे। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास’ में उल्लेख किया है कि जब 1910 में जोहान्सबर्ग के निकट टॉल्सटॉय फार्म की स्थापना की गई तो वहां रहने वालों में मुसलिम-ईसाई समुदायों के कई स्त्री-पुरुष थे जो मांसाहार के अभ्यस्त थे। गांधी ने लिखा है कि यह उनके लिए धर्म-संकट जैसी स्थिति थी, लेकिन उनके लिए प्राथमिकता थी आंदोलन की सफलता, इसलिए वे लोग मांसाहार-निषेध के कारण आंदोलन से अलग न हो जाएं, इसलिए उन्हें मांसाहार की स्वीकृति दे दी गई। लेकिन उन लोगों ने ‘गांधी भाई’ की भावना का आदर करते हुए मांसाहार का निश्चय त्याग दिया और खुशी-खुशी शाकाहारी भोजन ग्रहण करने लगे। लगभग ऐसी ही बात सीमांत गांधी वाले मामले में है। यह जरूर है कि जब एक बार सीमांत गांधी साबरमती आश्रम में पधारे, तो गांधी ने उनकी सामिष पसंद को ध्यान में रखते हुए उनके लिए आश्रम के बाहर से सामिष भोजन तैयार करके लाने को कहा था। लेकिन सीमांत गांधी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने महात्मा गांधी की भावना का आदर करते हुए मांसाहार करने से इनकार कर दिया। अब इस बात को किस तरह तोड़-मरोड़ कर मांसाहार के संबंध में गांधी की गलत तस्वीर पेश की जाती है, विचारणीय है।

यह बात हमेशा ध्यान में रहनी चाहिए कि गांधी के लिए सामिष या निरामिष भोजन व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का मामला था। वे यह जरूर चाहते थे कि हर व्यक्ति स्वत: अहिंसा प्रेमी होकर जीव-हत्या से विरत हो जाए।

वे जब यह कहते हैं कि ‘हिंदू धर्म प्राणिमात्र की एकता में विश्वास करता है’ और ‘गाय करुणा का महाकाव्य है’ तो जाहिर है कि वे गाय हो या अन्य जीव, सभी की हत्या के विरुद्ध थे। लेकिन वे बल-प्रयोग से इसे किसी पर थोपने के विरुद्ध थे। यही कारण था कि 1920 में खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने के एवज में उन्होंने मुसलिम संप्रदाय से गोहत्या बंद करने की वचनबद्धता को शर्त बनाने से इनकार कर दिया था। इसके लिए उन्होंने जागरूकता पैदा करना वांछनीय समझा और निरंतर अपने लेखों-भाषणों के जरिए जीवहत्या या मांसाहार के विरुद्ध चेतना जागृत करने का प्रयास करते रहे। निस्संदेह वे गोहत्या या मांसाहार के विरुद्ध थे, लेकिन यह भी सच है कि वे गोहत्या करने वाले व्यक्ति की हत्या करने के भी सख्त खिलाफ रहे। इस लिहाज से, आज जो गोवध रोकने के नाम पर इंसान की हत्या करते हैं, वे गांधी के सिद्धांतों की हत्या करते हैं। जो गांधी को मांसाहार का पक्षधर सिद्ध करने का प्रयास करते हैं वे भी गांधी की ‘उदारता’ के बहाने उनके विचारों की हत्या करते हैं।

जहां तक मद्य-पान का सवाल है, यह मांसाहार से बिलकुल अलग मामला है। गौरतलब है कि मांसाहार निषेध के लिए गांधी ने कोई आंदोलन नहीं चलाया, पर मद्यपान निषेध तो उनके आंदोलन और रचनात्मक कार्यक्रमों का एक अभिन्न अंग रहा। सर्वविदित है कि गांधी ने 1920 में असहयोग आंदोलन के समय से स्वदेशी प्रचार, अस्पृश्यता-निवारण प्रचार के साथ-साथ मद्यपान निषेध का भी प्रचार चलाया। विदेशी सामानों की होली जलाना, शराबबंदी करवाना, शराब की दुकानों पर पिकेटिंग कराना जैसे कार्य व्यापक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर किए गए। कहा जाता है कि शराबबंदी का ऐसा असर हुआ कि ब्रिटिश सरकार की राजस्व-आय में भारी गिरावट आ गई। ऐसे में यह कहना कि गांधी अपने आश्रम में मौलाना अबुल कलाम आजाद के लिए शराब रखते थे, उनके पूरे मद्य-निषेध आंदोलन को प्रवंचना सिद्ध कर देता है।