आदिकाल से ही है मनुष्य शांति की खोज में

  • 2015-09-05 02:30:04.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

देवेन्द्रसिंह आर्य (चेयरमैन)

प्राचीन काल से अद्यतन पर्यन्त मानव की इच्छा रही है -शांति की खोज। इसलिए चाहे आज का मानव कितना भी भौतिक संसाधनों से परिपूर्ण है, तथा कितना भी व्यस्त है, परंतु वह एक असीम शांति की चाह में अवश्य है। मानव को असीम शांति कैसे प्राप्त हो सकती है? इस पर हमारे महर्षियों, मनीषियों, चिंतकों, मुनियों, महापुरूषों द्वारा अनेक रास्ते बताये गये हैं। आवश्यकता है तो मात्र उचित मार्ग अर्थात सत्मार्ग एवं सत्कार्य को ग्रहण करने की।

सर्वप्रथम हमें शांति के अर्थ को समझना होगा। वास्तव में दैहिक, दैविक एवं भौतिक त्रयताप से रहित चित्त की सम अवस्था को शांति कहते हैं। शांति भी तीन प्रकार की होती है आध्यात्मिक शांति, आधिदैहिक शांति एवं आधिभौतिक शांति। शांति की प्राप्ति कैसे संभव है, शांति प्राप्त होती है-आत्मसंतोष से, और आत्म संतोष कब प्राप्त होता है? मनुष्य अपने दायित्व एवं कत्र्तव्यों के समुचित निर्वहन के पश्चात आत्मसंतोष का अनुभव करता है। परंतु कत्र्तव्य का निष्पादन भी पवित्रता से किया गया हो, जिससे चित्त की निर्मलता निरंतर बनी रहती है, ऐसे मानव पर जो मन, वचन और कर्म तीनों से पवित्र हो, उसी पर उस निर्विकार निर्लेप नियंता की करूणा पल-पल बरसती है, वही शांति का अधिकारी है। इसके अतिरिक्त सत्व के प्रकाश में चित्त की प्रसन्नता का नाम संतोष है। जैसे मन सदैव एक सम नही रहता है, घटता बढ़ता है, लेकिन आयु हमेशा पल-पल श्वास श्वास पर घटती है, इसके विपरीत तृष्णा हमेशा बढ़ती ही रहती है, परंतु एक बात तो हमेशा एक जैसी रहती है-और वह है विधाता का विधान। मानव को अपने चित्त की वृत्ति तीनों प्रकार के तापों में विधि-विधान के तुल्य अर्थात सम रखना ही ईश्वरीय गुण होगा और इसी से शांति का मार्ग प्रशस्त होगा।

विवेकशील मानव स्वस्ति पर विचार करता है, इसका संधि विच्छेद हो तो सु+अस्ति अर्थात अच्छा है, शुभ है। जो कर्म शुभ है, उसके निष्पादन के बाद ही आत्म संतोष प्राप्त होता है । इसलिए शुभ व अशुभ पर विचार करके शुभ को धारण करना व अशुभ को छोड़ देना ही शांति का मार्ग है। निम्नलिखित मंत्रों को ध्यान से पढ़ें तो हमारे पूर्वजों के चिंतन की विश्व में कहीं भी कोई बराबरी नही कर सकता-

‘ओ३म द्यौ: शांतिरन्तररिक्षं शांति: पृथ्वी शांतिराप: शांतिरोषधय:। शांति: वनस्पतय: शांर्तिविश्वे देवा: शांति ब्रह्मा शांति: सर्व शांति: शांतिरेव शांति: सा मा शांतिरेधि’

अर्थात इस द्युलोक में अंतरिक्ष में, पृथ्वी पर औषधियों में, वनस्पतियों में समस्त विश्व में सर्वत्र शांति ही शांति हो, ऐसी भावना, कामना, याचना है इस मंत्र में और अंत में तीन बार फिर शांति:, शांति:, शांति: पुकारते हैं। तीन बार ही क्यों कहा शांति, शांति:? क्योंकि तीन प्रकार की शांति: आध्यात्मिक हो, आधिदैहिक शांति हो, आधिभौतिक शांति: हो, इसलिए भी कि तीन प्रकार की ऐषणा, लोकैषणा, वित्तैषणा एवं पुत्रैषणा शांत हो।

वृत्तियों का उदगम स्थल चित्त है। वृत्तियां भी दो प्रकार की होती हैं। सदप्रवृत्तियां और दुष्प्रवृत्तियां। मानव यदि चित्त की दुष्प्रवृत्तियों का दमन कर ले और सदप्रवृत्तियों को ही प्रभावी रखे तो मानव मानव ही नही अपितु देवता है और मानव यदि दुष्प्रवृत्तियों के प्रभाव में आ गया तो राक्षस हो गया। इसलिए चित्त की निर्मलता जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। एक ही चित्त में उठ रही वृत्ति से दानव या मानव की संज्ञा सुलभ है। इसलिए तो कहा है कि-

‘दमन कर चित्त की वृत्ति लगा ले गंग में गोता,’ यहां गंग का अर्थ गंगा से नही बल्कि ज्ञान गंगा से है। जनसाधारण इसका अन्यथा अर्थ लगाकार गंगा नदी में गोता लगाकर पाप निवृत्ति समझ बैठते हैं जो अज्ञानता का परिचायक है। ऐसा कभी नही हो सकता कि मानव के पाप एवं दुष्कर्मों का फल न मिले। गंगा में स्नान करने से पाप नही धुलते हैं और न ही पानी में घुलते हैं। जैसा किया है, वैसा भरता है। इसके अतिरिक्त गंगा नदी में गोता लगाते समय तन ही तो धोया, मन को नही धोया। चित्त में उठने वाली वृत्ति से ही मानव के भाव, विचार बनते हैं तथा विचारों से कर्म बनते हैं। कई सदकार्य करने या दुष्कर्म करने से पहले विचार बीज रूप में चित्त में ही उठेगा। अत: मदिरा सेवन करने से पहले मदिरा के प्रति चित्त में विचार उठेंगे। ऐसे ही सत्कर्म  एवं यज्ञ करने से पूर्व चित्त में अच्छे विचार आएंगे। विश्व का कल्याण करने की भावना चित्त में बलवती होती है। इसलिए चित्त की वृत्ति पर मानव विचार करे, क्योंकि वृत्ति ही शब्द बनी, शब्दों पर विचार करे क्योंकि वृत्ति ही शब्द बनी, शब्दों पर विचार करें जो कार्य की परिणति में बदलते हैं।

शांत चित्त करना कब संभव है? जब मानव के पास आध्यात्मिक ज्ञान, विवेक होगा। आध्यात्मिक ज्ञान से ही आधिदैहिक शांति संभव है या यूं कहें कि आधिदैहिक शांति का प्रादुर्भाव आध्यात्मिक शांति से होता है।

आधिदैहिक शांति के बाद आधिभौतिक शांति प्राप्त होती है। जैसे कि एक धातु के बने बर्तन में गर्म पेय पदार्थ रखने से धातु का बाहरी तल पकडऩे पर गर्म भासता है, लेकिन उसी धातु के बर्तन में यदि ठंडा पेय पदार्थ रखें तो वह ठंडा लगता है। इसी प्रकार अंतर्मन चित्त की शांति से ही परमशांति संभव है और यह भी सिद्घ होता है कि यद्यपि तीनों प्रकार की शांति आध्यात्मिक, आधिदैहिक एवं आधिभौतिक अन्योयाश्रित हैं, परंतु आध्यात्मिक शांति प्रथम एवं प्रमुख हैं। आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है आत्मसाक्षात्कार को ग्रहण करना चाहिए। आत्मावलोकन करना चाहिए तत्पश्चात मंथन करके बुराई और अकर्म को छोडऩा चाहिए। इंद्रियों को जीतकर साधना के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने से ही ईश्वर का साक्षात्कार प्राप्त होता है और चित्त की निर्मलता निरंतर बनी रहती है क्योंकि-

‘चित्त से चिंतन ब्रह्मा का देह करे सत्कर्म

वाणी सत भाषण करें यह मानव का धर्म’

विवेकी मानव व्यवहार से निवृत्त होकर परमार्थ में प्रवृत्त होते हैं। इसके लिए यह आवश्यक नही है कि आप पहाड़ों की गुफाओं में एकांत में जाकर ही साधना में लीन हों, बल्कि गृहस्थाश्रम में रहते हुए अपनी साधना एवं सदाचार की संपत्ति को सुरक्षित रखें। जैसे जागने वाले जंगल में भी सुरक्षित रहते हैं और लापरवाह एवं सोने वाले घनी बस्ती में लुट जाते हैं।