दो पाटन के बीच फंसी भारत की स्वस्थ पत्रकारिता

  • 2016-04-30 06:30:26.0
  • संजीव पांडेय

स्वस्थ पत्रकारिता

नक्सल प्रभावित इलाकों में पत्रकारों पर मंडराते संकट को लेकर एक नई बहस चल रही है। यह बहस जरूरी है। क्योंकि नक्सली इलाकों में पत्रकारों को शासन और नक्सलियों, दोनों की तरफ से निशाना बनाया गया है। ताजा मामला छत्तीसगढ़ का है जहां की सरकार पर पत्रकारों को प्रताडि़त करने के आरोप लग रहे हैं। यहां पर पत्रकारिता के सामने आए संकट को लेकर एडिटर्स गिल्ड की रिपोर्ट भी आई है। हाल ही में एक पत्रकार की गिरफ्तारी के चलते मामले ने ज्यादा तूल पकड़ लिया। सरकार पर आरोप है कि नक्सल प्रभावित जिलों में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों को नक्सल समर्थक करार देकर पुलिस से छत्तीसगढ़ के विशेष कानून के अंतर्गत गिरफ्तार करवा रही है। छत्तीसगढ़ में कई पत्रकार जेल भेज दिए गए हैं। फिलहाल चार पत्रकार जेल में है। जबकि कुछ पत्रकार जेल से रिहा हो चुके हैं। उन्हें पुलिस ने नक्सली समर्थक होने का आरोप लगा कर गिरफ्तार किया था। कुछ पत्रकारों को तो पुलिस पत्रकार नहीं मान रही है, जबकि वे कई अखबारों के लिए लिखते रहे हैं।

फिलहाल छत्तीसगढ़ में चार पत्रकार जेल में हैं। इन पर पुलिस ने नक्सलियों के साथ सांठगांठ के आरोप लगाए हैं। जबकि इन चारों पत्रकारों को इलाके में निष्पक्ष पत्रकार माना जाता है। गिरफ्तार पत्रकार प्रभात सिंह, दीपक जायसवाल, संतोष यादव और सोमारू नाग पर पुलिस भले नक्सलियों के साथ सांठगांठ का आरोप लगा रही है, लेकिन पत्रकार संगठनों का मानना है कि सच्चाई तो यही है कि इन्होंने प्रशासन की कई खामियों को उजागर किया, इसलिए नाराजगी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया। फिलहाल पत्रकारों पर आए इस संकट के खिलाफ छत्तीसगढ़ के पत्रकार नौ-दस मई को नई दिल्ली में जंतर मंतर पर प्रर्दशन करंगे। पत्रकारों का आरोप है कि कुछ पत्रकार जो सरकार के दबाव में नहीं आ रहे हैं उन्हें इलाका छोडऩे के लिए कहा जा रहा है। उनके घरों पर हमले किए जा रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के सामने आ रहे संकट को जानने के लिए एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की टीम वहां गई थी। उसकी जांच रिपोर्ट आ गई है। रिपोर्ट में माना गया है कि छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के ऊपर आए जिस संकट की बात कही जा रही है वह काल्पनिक नहीं है, वह सच है। इस संकट के मूल में सरकार का दमनकारी रवैया है। पत्रकार गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे हैं। सरकार चाहती है कि पत्रकार उनके मनमाफिक खबरें लिखें। सुदूर नक्सल प्रभावित इलाकों में पत्रकारों से पुलिस यही उम्मीद करती है। वह चाहती है कि पत्रकार वही खबर लिखें जिसमें शासन की तारीफ हो। शासन के खिलाफ खबरें लिखने से सरकार नाराज है, खासकर पुलिस महकमा बहुत कुपित है। जो पत्रकार उनके खिलाफ लिखने की हिम्मत करता है उसे प्रताडि़त किया जा रहा है, जेल भेजा जा रहा है।

नक्सल प्रभावित इलाकों में पत्रकार दोहरे दबाव के शिकार हैं। पुलिस की खबर लिखने पर नक्सली उन्हें पुलिस का एजेंट बताते है। बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ में कई पत्रकारों की हत्या भी नक्सलियों ने इसी शक के आधार पर कर दी। नक्सल प्रभावित इलाके में पत्रकार साईं रेड््डी और नेमि जैन की हत्या नक्सलियों ने कुछ साल पहले की थी। इन दोनों पत्रकारों पर माओवादियों ने पुलिस के मुखबिर होने का आरोप लगाया था। जबकि दूसरी तरफ पुलिस इन पत्रकारों को नक्सलियों का मुखबिर बता रही थी। साईं रेड््डी पर दोहरी मार पड़ी थी। माओवादियों का कहना था कि वे पुलिस के मुखबिर हैं, जबकि पुलिस का कहना था कि उनकी माओवादियों से सांठगांठ है। पुलिस ने उन्हें माओवादियों से सांठगांठ के आरोप में मार्च 2008 में छत्तीसगढ़ पुलिस स्पेशल सिक्यूरिटी एक्ट के तहत गिरफ्तार किया था। पुलिस चाहती थी कि रेड््डी उनके इशारे पर काम करे। छत्तीसगढ़ में एक और पत्रकार नेमि जैन की हत्या भी नक्सलियों ने पुलिस के मुखबिर होने के शक में कर दी थी। हालांकि दोनों पत्रकारों की हत्या पर बाद में नक्सलियों ने माफी मांगी थी।

सच्चाई तो यह है कि नक्सल प्रभावित इलाके में जो खतरा पुलिस को होता वही खतरा पत्रकारों को होता है। उन्हें भी प्रेशर बम, लैंडमाइन का खतरा होता है। पुलिस व नक्सली मुठभेड़ की दोतरफा फायरिंग में अक्सर पत्रकार फंसते हैं। हालांकि इन दबावों के बीच भी बस्तर इलाके में करीब ढाई सौ पत्रकार काम कर रहे हैं। यों तो थोड़ा-बहुत तनाव अमूमम सभी संवाददाताओं को झेलना पड़ता है, पर नक्सल प्रभावित इलाकों में काम करने वाले रिपोर्टर एक बहुत असामान्य स्थिति के तनाव में रहते हैं। नक्सली भी अक्सर पत्रकारों के काम को बाधित करने की कोशिश करते हैं। जिस इलाके में नक्सली पत्रकारों को जाने से मना करते है वहां पत्रकार नहीं जा पाते हैं। कई बार पत्रकारों को पुलिस का मुखबिर समझ नक्सली उन्हें बंधक बनाते हैं। यह दिलचस्प है कि समय-समय पर पत्रकारों ने पुलिस को सहयोग दिया है। जब नक्सली पुलिसवालों को अपहरण कर ले गए तो पत्रकारों ने मदद की। इसके बावजूद पत्रकारों को पुलिस संदेह से देखती है। ठीक वही हालत नक्सिलयों की है। जब नक्सलियों को अपनी बात रखनी होती है तो पत्रकार याद आते हैं, नहीं तो बाकी समय उनकी निगाह में पत्रकार पुलिस के मुखबिर होते है।

पच्चीस मई 2013 को झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले में जब कई बड़े कांग्रेसी नेताओं की मौत हो गई तो एक पत्रकार नरेश मिश्र ने मौके पर सबसे पहले पहुंच दिवंगत कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ल को अस्पताल पहुंचाने में मदद की। नरेश की ही मोटरसाइकिल से भाग कर विधायक कवासी लखमा ने अपनी जान बचाई। नक्सली इलाकों में काम करने वाले पत्रकारों को एक पतली लाइन पर बचाव कर चलना होता है। अगर लाइन के एक तरफ पुलिस बल है तो दूसरी तरफ नक्सली हैं। अगर लाइन से हट कर रिपोर्टिंग की तो नक्सलियों से या पुलिस से मिले हुए घोषित हो जाते हैं। ऐसे में वे या तो नक्सलियों के हमले के शिकार हो सकते हैं या पुलिस की ज्यादती के।

छत्तीसगढ़ अकेला नक्सल प्रभावित राज्य नहीं है। बिहार और झारखंड भी खासे नक्सल प्रभावित राज्य हैं। इन राज्यों में भी पत्रकार नक्सली हिंसा के शिकार हुए हैं। वहीं पुलिस भी पत्रकारों को नक्सल समर्थक घोषित करने के लिए आतुर रहती है। हालांकि पत्रकारों को अपनी जान बचाने के लिए कई बार नक्सलियों की खबर लगानी होती है। क्योंकि दूरदराज के छोटे शहरों में पुलिस से ज्यादा नक्सलियों का दबदबा होता है। यही नहीं, माओवादी गुटों की आपसी रंजिश के शिकार भी पत्रकार होते हैं। किसी एक नक्सली गुट की ज्यादा खबर लगने के बाद दूसरे गुटों की तरफ से धमकी आती है। बिहार और झारखंड में तीन-चार नक्सली गुट सक्रिय हैं। इसमें सीपीआई-माओवादी, टीपीसी, आरसीसी जैसे संगठन शामिल हैं।

बिहार और झारखंड सीमा पर लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे एएनआई के रिपोर्टर सूर्यप्रताप सिंह नक्सल क्षेत्रों में पत्रकारिता के सामने मौजूद खतरे बताते हुए कहते हैं कि कड़ी प्रतिस्पर्धा के इस दौर में दिल्ली से आकर कोई पत्रकार अच्छा कवरेज नक्सली एरिया में कर जाए और स्थानीय टीवी चैनल और अखबार को कुछ पता न चले तो नौकरी खतरे में पड़़ सकती है। लेकिन इससे बड़ी चुनौती नक्सल क्षेत्र से संबंधित समस्याओं के कवरेज की है। पुलिस और प्रशासन की कोशिश होती है कि नक्सलियों की चल रही ‘समानांतर सरकार’ की खबरें टीवी और अखबारों में न आएं। क्योंकि इससे पुलिस और प्रशासन की पोल खुलती है। शेष दुनिया को पता चलता है कि पुलिस थानों तक सिमटी है और प्रशासन शहरी इलाकों तक सीमित है। गांवों में नक्सलियों की पुलिस है, नक्सलियों की अदालत है और नक्सलियों का ही विकास कार्यक्रम है। नक्सली क्षेत्र में कवरेज के मामले में पुलिस से ज्यादा नक्सली तेज हैं। वे पत्रकारों के लिए अपनी आचार संहिता जारी करते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि गांवों और जंगलों में उनके किए जा रहे ‘अच्छे कार्यों’ को टीवी चैनल और अखबार दिखाएं। जबकि पुलिस का दबाव होता है कि इसे न दिखाए जाए, क्योंकि यह नक्सलियों के छवि निर्माण (इमेज बिल्डिंग) का एक तरीका होता है। नक्सली कई जगह स्वास्थ्य शिविर का आयोजन करते हैं, लोगों को कंबल और कपड़े बांटते हैं, गरीबों को राशन मुहैया कराते हैं, सामूहिक विवाह का आयोजन करवाते हैं और कहीं पर सिंचाई के लिए छोटे-मोटे बांध का निर्माण भी करते हैं। पुलिस नक्सलियों से संबंधित इस तरह की खबरों को उनका महिमामंडन मानती है। नक्सली ‘हत्या’ शब्द की जगह ‘सफाया’ शब्द का इस्तेमाल करने के लिए पत्रकारों पर दबाव बनाते हैं। नक्सली अपनेनाम के आगे कॉमरेड लिखने के लिए पत्रकारों को कहते हैं। ‘कुख्यात’ शब्द के इस्तेमाल पर उन्हें आपत्ति है। नक्सलियों की खबर नहीं छपती है तो लगातार उनके फोन आते हैं। बिहार के गया जिले के बाराचट्टी प्रखंड के संवाददाता अमित कुमार सिंह के अनुसार नक्सली इलाके में खबर करना आसान काम नहीं है। अगर गांव में विकास से संबंधित कोई ‘नेगेटिव खबर’ लगाई तो पुलिस और प्रशासन नाराज हो जाता है। अमित कुमार सिंह के अनुसार मिड-डे मिल से बीमार हुए कुछ बच्चों के संबंध में उनकी लगाई गई खबर से नाराज प्रशासन ने उन पर एफआईआर करवा दिया। पुलिस ने इसमें नक्सलियों की मिलीभगत का आरोप लगा दिया। वे पत्रकारों के लिए अपनी आचार संहिता जारी करते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि गांवों और जंगलों में उनके किए जा रहे ‘अच्छे कार्यों’ को टीवी चैनल और अखबार दिखाएं। जबकि पुलिस का दबाव होता है कि इसे न दिखाए जाए, क्योंकि यह नक्सलियों के छवि निर्माण (इमेज बिल्डिंग) का एक तरीका होता है। नक्सली कई जगह स्वास्थ्य शिविर का आयोजन करते हैं, लोगों को कंबल और कपड़े बांटते हैं, गरीबों को राशन मुहैया कराते हैं, सामूहिक विवाह का आयोजन करवाते हैं और कहीं पर सिंचाई के लिए छोटे-मोटे बांध का निर्माण भी करते हैं। पुलिस नक्सलियों से संबंधित इस तरह की खबरों को उनका महिमामंडन मानती है। नक्सली ‘हत्या’ शब्द की जगह ‘सफाया’ शब्द का इस्तेमाल करने के लिए पत्रकारों पर दबाव बनाते हैं। नक्सली अपनेनाम के आगे कॉमरेड लिखने के लिए पत्रकारों को कहते हैं। ‘कुख्यात’ शब्द के इस्तेमाल पर उन्हें आपत्ति है। नक्सलियों की खबर नहीं छपती है तो लगातार उनके फोन आते हैं। बिहार के गया जिले के बाराचट्टी प्रखंड के संवाददाता अमित कुमार सिंह के अनुसार नक्सली इलाके में खबर करना आसान काम नहीं है।
-संजीव पांडेय