साहित्यकारों की  विकृत राजनीति

  • 2015-10-16 05:00:54.0
  • मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

एक बहुत ही सोची समझी राजनीति के तहत देश के मूर्धन्य विद्धान व लेखकों ने  अपने पुरस्कारों को एक के बाद एक लौटाने का अभियान प्रारम्भ कर दिया है। इसमें अधिकांश साहित्यकार साहित्य अकादमी के पुरस्कारों से सम्मानित थे । इन साहित्यकारोंं का नेतृत्व नेहरूजी की रिश्तेदार नयनतारा कर रही हैं जो कि साहित्य अकादमी के पुरस्कार से सम्मानित की जा चुकी हैं। यह पूरा देश अच्छी तरह से जान रहा है कि अभी तक देश में कांग्रेस व वामपंथी विचारधारा की सत्ता का प्रभाव हर संस्था पर रहा है। इन्हीं संस्थाओं में साहित्य अकादमी का नाम भी शामिल हैं जिसमें अभी तक वामपंथी व देशविरोधी ताकतों , विचारों का कब्जा था।    इनमें से अधिकांश लेखकों को केवल एक ही परिवार व विचारधारा की स्वामिभक्ति के कारण ही पुरस्कार मिले हैं। इनमें से अधिकांश लेखक अपनी सरकारी पहुंच के कारण नि:शुल्क हवाई यात्राओं और फ्री में पार्टी आदि का आनंद भी उठाया करते थे। कुछ लेखक तो अपनी शराबी और औरतबाजी के कारण कुख्यात भी रहे हैं।     जो लेखक अपने पुरस्कारों को लौटा रहे हैं कहा जा रहा है कि वे कन्नड़ लेखक और तर्कवादी विचारक कलबर्गी की हत्या और दादरी हत्याकांड के विरोध में अपने पुरस्कार वापस कर रहे हैं। इन लेखकों का आरोप है कि जब से देश में मोदी जी के नेतृत्व में बहुृमत से भाजपा की सरकार आयी है तब से देश में असहिष्णुता का वातावरण बना है और सांप्रदायिक वातवारण का  माहौल भी खराब हुआ है। यह सभी लेखक बहुत ही संकीर्ण विचारधारा और मानसिक कुंठा से ग्रसित प्रतीत हो रहे हैं।

आज पूरा देश इन सभी साहित्यकारों  व लेखकों से यह पूछ रहा है कि क्या आज से पहले देश में हिंसा, आतंकवाद व आगजनी का दौर नहीं था। इन लेखकों  को यह अच्छी तरह से पता होना चाहिए कि वे अपने जिन आकाओं के कहने के बल पर आत्मघाती कदम उठा रहे हैं उनके शासनकाल में ंही सर्वाधिक दंगे हुए। 1984 के सिख दंगों में जब सिखों का सामूहिक नरसंहार एक विशेष परिवार को खुशकरने के लिए किया गया तब ये लेखक कहां थे? बिहार व उप्र के अधिकांश हिस्सों में जब भीषण दंगों का सृजन हुआ  तब यह लेखक कहां थे ?  अपना पुरस्कार वापस करने वाले लेखक केवल और केवल राजनैतिक पब्लिसटी कार रहे हैं  और उनकी मीडिया में आने की चाहत है क्योंकि अब बदलते परिदृश्य में उनकी कोई ऐसी खास भूमिका नहीं रह गयी कि वे मीडिया में चर्चा का विषय बनें और जरा सी छींक आने पर सरकार उनके सामने नतमस्तक हो जाये और अधिकारी सरकारी गाड़ी लेकर उनके दरवाजे सिर झुकाने के लिए हाजिर हो जाये। सर्वाधिक ताज्जुब कि बात यह है कि इन लेखकों के समर्थन में सलमान रूश्दी जैसे लोग भी आ गये हैं।

यहां पर यह बात रखनी बेहद आवश्यक है कि इनमें से अधिकांश लेखकों ने जब पूरे देश में चुनावी वातावरण चरम सीमा पर था तब मोदी विरोधी एक मुहिम चला रखी थी। उन्हें बहुत ही अफसोस व दु:ख हो रहा था कि गुजरात दंगों का एक आरोपी देश का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है। जिन कन्नड़ लेखक कलबर्गी की हत्या हुई वह तो मोदी विरोधी अभियान के बहुही बड़े नेतृत्वकर्ता थे। वे बहुसंखक हिंदू समाज की आस्थाओं के केंद्र बिंदुओं पर बराबर हमला करते थे। दिवंगत कलबर्गी ने अपने लेखों व टीवी चैनलों की बहस में  हिंदुओ का सुनियोजित तरीके से अपमान किया था। कलबर्गी ने अपने लेखों के माध्यम से भगवान श्रीराम व महाभारत जैसी कथाओं के अस्त्त्वि पर ही प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिये थे। फिर आखिर हिंदू समाज से ही सहिष्णुता बनाये रखने की अपील की क्यों की जाती है।उस समय कलबर्गी केस साथ कर्नाटक के कई और लेखकगण खड़े हो गये थे। पुरस्कार वापस लौटा रहे लेखकों व साहित्यकारों का दोहरा चरित्र सामने आ चुका है। इन लेखकों ने अपना माइंड सेटअप कर रखा है ओैर वह है राष्ट्रीय अस्मिता के साथ  खिलवाड़ करना और बहुसंख्यकहिंदू समाज की भावनाओं को लगातार ठेस पहुंचाते रहना। क्या केवल हिंदू समाज ने ही केवल ठेका ले रखा है कि वह शांतिपूर्वक सब कुछ सहता रह,े सहता रहे। सामाजिक समरसता और सहिष्णुता का पक्षधर  समाज भी है केवल तथाकथित सरकारी सुखभेाग पर जिंदा रहने वाले लेखकों ने ही देश के समाज का ठेका नहीं ले रखा है।

आखिर इन लेखकों का ब्रहमज्ञान दादरी और कलबर्गी घटना के बाद ही क्यों जागा? यह इन लोगों की एक निश्चय ही सुनियोजित व घृणित राजनैतिक साजिश है तथा पुरस्कार वापस देेकर पीएम मोदी के मजबूत इरादों की घृणित परीक्षा ले रहे हैं।  इन लेखकों ने देश के लिए वास्तव में क्या किया है यह भी बताना होगा। यह लेखक केवल देश की जनता को गुमराह कर रहे हैं। यह लेखक अच्छी तरह से जानते हैं कि पीएम मोदी पर किसी भी प्रकार का अनैतिक दबाव डालकर कोई भी  काम नहीं करवाया जा सकता है। इन लेखकों को देश के संविधान का भी  लगता है वास्तविक ज्ञान नहीं है या फिर समय के चलते उसकी नयी परिभाषा गढऩे का षडय़ंत्र का हिस्सा बन रहे हैें। इन लेखकों को अच्छी तरह से पता होना चाहिये कि कलबर्गी हत्याकांड तो कर्नाटक में हुुआ है और दादरी कांड उप्र में। इन सभी प्रकरणों में राज्य सरकारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इन लेखकों को कर्नाटक के मुख्यमंत्री और कांग्रेसाध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी से जाकर पूछना चाहिये कि वहां के मुख्यंत्री व सरकार अब तक कलबर्गी हत्याकांड के आरोपी को क्यों नहीं पकड़ सकी है ?

एक समय था जब लेखकों की लेखनी में आजादी की तरंगे उठने लगती थीं और विदेशी सत्ता कांपने लग गयी थी। जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था  तब कई लेखको की कलम से अंग्रेजी सत्ता कांप उठी थी। लेकिन आज परिस्थितियां अलग हैं। आज लेखकों व साहित्यकारों में खेमेबाजी सपष्ट रूप से देखी जा रही है। एक बात आर है कि कुछ वामपंथी विचारधारा के लेखक चुनावों के दौरान धमकी दे रहे थे कि यदि मोदी जी देश के प्रधानमंत्री बने तो वह देश छोडक़र चले जायेंगे यह उनके लिए सुनहरा अवसर आ चुका है। यदि इन  लेखकों को लगता है कि उनकी स्वतंत्रता का हनन हो रहा है तो वह बड़े आराम से देश को दोड़ सकते हैं। सांप्रदायिकता और असहिष्णुता के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले लेखक राजनैतिक नौअंकी कर रहे हैं वह बिलकुल उसी तरह से जैसे कि पुणे में एफटीअीआई्र के निदेशक गजेंद्र चौहान के मामले में हो रहा है। इन बातों स्पष्ट संकेत जा रहा है यह पुरस्कार योग्यता के आधार पर नहीं दिये गये थेे अपितु राजनैतिक विचारधारा व वंशवाद का गुणगान करने के कारण ही दिये गये थे। केद्रींय मंत्री महेश शर्मा ने इन लेखकों के इरादों पर जो संदेह व्यक्त किया है वह उचित ही है। पुरस्कारों का राजनैतिककरण अब हो गया है। यह सब केवल अपनी भड़ास निकाल रहे हैं क्यंोंकि इनका अवैध रूप से संचालित हो रहा सत्तासुख समाप्त हो गया  है। सरकारी दावतें समाप्त हो चुकी हैं। तो फिर पुरस्कारों का क्या औचित्य।