दिशा से भटकता आमिर प्रकरण

  • 2015-12-07 06:30:16.0
  • कुलदीप नैयर

जिन कारणों से प्रेरित होकर आमिर ने यह टिप्पणी की है, उनके बारे में लोगों की जानकारी बढ़ाने के बजाय बहस इस बात पर हो रही है कि आमिर ने ऐसा गैर जिम्मेदाराना बयान देने की हिम्मत कैसे की ? इसके जरिए हिंदू-मुस्लिम संबंधों का शाश्वत प्रश्न फिर से चर्चा के केंद्र में आ चुका है। किसी भी मसले के आधे पक्षों को नेपथ्य में धकेल कर आधे-अधूरे विषयों पर मंथन किसी भी तरह से लाभकारी नहीं हो सकता। अतीत में ऐसा ही होता रहा है। इस रवैये को छोडक़र राष्ट्र को अब ऐसे मसलों पर हर कोण और समन्वित ढंग से विचार करना होगाज् उस कार्यक्रम में मैं भी मौजूद था, जिसमें फिल्म अभिनेता आमिर खान ने टिप्पणी की थी कि उनकी पत्नी किरण ने उनसे कहा कि उन्हें अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए भारत छोडक़र किसी दूसरे मुल्क चले जाना चाहिए। उनकी इस अभिव्यक्ति में किसी तरह की घृणा नहीं थी। हां, उदासी की एक हल्की सी झलक उसमें जरूर थी। इसके बावजूद उनकी इस टिप्पणी ने मुझे विचलित कर दिया। वास्तव में पूरे देश को ही इसने झकझोर कर रख दिया। इससे पहले कभी मुझे इस बात का आभास नहीं हो सका था देश में हालात ऐसी स्थिति में आ चुके हैं कि आमिर खान सरीखे लोग भी देश छोडक़र किसी दूसरे मुल्क में बसने का विचार करने लगे हैं। ऐसे में अल्पसंख्यक समुदाय के आम लोगों में भय की भावना होना तो लाजिमी है। देश के करीब 500 कलाकारों व बुद्धिजीवियों द्वारा अपने-अपने पुरस्कार लौटाने की बात भी समझ में आती है।
aamir khan
उन्होंने इसे अपनी वेदना-व्यथा को प्रकट करने का एक जरिया बनाया है। आमिर खान की टिप्पणी के बाद सांप्रदायिक तत्त्व जाग उठे और प्रतिक्रिया में इन्होंने वह सब करना शुरू कर दिया, जो अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेलता है। इसी वजह से आमिर जैसे प्रतिभाशाली और विवेकी लोगों में भी भय की भावना पैदा हो जाती है। आमिर खान के इस बयान को भारतीय जनता पार्टी ने आड़े हाथों लिया और इसके लिए आमिर की जमकर आलोचना भी की। आमिर पर तरह-तरह के तंज कसे गए जैसा कि आज वह जो कुछ भी हैं, उन्हें भारत ने बनाया है तथा इस तरह की बयानबाजी आमिर की भारत के प्रति कृतघ्नता के भाव को दर्शाती है। आज आमिर खान जो भी कुछ बन सके हैं, वह उनकी खुद की मेहनत की बदौलत संभव हुआ है। भारत ने उनके कार्य को सराहा है। हमारा मानना है कि हाल के दिनों में ऐसा कुछ भी घटित नहीं हुआ है, जिसको लेकर आमिर को इस तरह का बयान देना पड़ता। लेकिन देश के माहौल को लेकर आमिर को जैसा महसूस हो रहा था, उन्होंने उसी को व्यक्त किया है। मैं उनकी भावनाओं की कद्र करता हूं। हम सभी को मिलकर इस बात को लेकर अंत:मनन करना चाहिए कि जिस आमिर खान को पूरा देश पसंद करता है, उसे सार्वजनिक तौर पर ऐसे बयान क्यों देने पड़ रहे हैं। आमिर खान को भी इस बात का अंदाजा होना चाहिए था कि आखिर जो बयान उन्होंने दिया है, देश पर उसका क्या असर पड़ सकता था। वह एक संवेदनशील व्यक्ति हैं। देश में गहरी होती असहिष्णुता की जड़ों को ध्यान में रखते हुए इस बात का अंदाजा होना चाहिए था कि इस तरह का कोई भी बयान उनके जैसे किसी भी व्यक्ति के प्रभाव को कम कर सकता है। भले ही उनकी पंथनिरपेक्षता का परिचय पत्र किसी भी तरह की उलाहना से परे है और उनका पूरा जीवन एक खुली किताब की तरह हमारे सामने है। इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही माना जाएगा कि उनके बयान को लेकर जो बहस देश भर में छिड़ी हुई है, वह सही दिशा में नहीं है। जिन कारणों से प्रेरित होकर आमिर ने यह टिप्पणी की है, उन कारणों के बारे में लोगों की जानकारी बढ़ाने के बजाय बहस इस बात पर हो रही है कि आमिर ने ऐसा गैर जिम्मेदाराना बयान देने की हिम्मत कैसे की? इसके जरिए हिंदू-मुस्लिम संबंधों का शाश्वत प्रश्न एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में आ चुका है। किसी भी मसले के आधे पक्षों को नेपथ्य में धकेल कर आधे-अधूरे विषयों पर मंथन किसी भी तरह से लाभकारी नहीं हो सकता। अतीत में ऐसा ही होता रहा है। इस रवैये को छोडक़र राष्ट्र को अब इन मसलों पर हर कोण से विचार करना होगा। अल्पसंख्यकों में यह विश्वास जगाना होगा कि आप भारत में पूरी तरह से सुरक्षित हैं। यही आमिर खान के बयान का सारांश है, न कि बहुसंख्यकों द्वारा उनके कहे पर की गई टिप्पणियां। दुर्भाग्यवश इस पूरे प्रकरण का संदर्भ बिंदु भी विभाजन ही है। आज विभाजन एक सच्चाई है। विभाजन के फार्मूले को उस समय जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल द्वारा स्वीकार किया गया था। हालांकि यह भी हकीकत है कि शुरुआती तौर पर ये दोनों नेता इस फार्मूले के कट्टर विरोधी थे। लेकिन जब उन्हें लगा कि अत्याचारी ब्रिटिश शासन से भारत को मुक्त करवाने का इसके अलावा कोई अन्य विकल्प उनके पास नहीं है, तो मजबूरन उन्हें इसे स्वीकार करना पड़ा। गवर्नर जनरल के कक्ष में जब महात्मा गांधी के समक्ष विभाजन का यह फार्मूला रखा गया था, तो वह बातचीत को बीच में ही छोडक़र चले गए थे। वह इस संदर्भ में कुछ भी नहीं चाहते थे, लेकिन तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने कहा था कि यदि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच कोई समझौता हो या न हो, वे देश छोड़ देंगे, तो भी नेहरू और पटेल ने तथ्यों को ध्यान में रखते हुए भारी मन से विभाजन को स्वीकार कर ही लिया था। यह सच है कि हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच खींची गई इन विभाजनकारी रेखाओं को एक बड़ी त्रासदी माना जा सकता है, क्योंकि इसने इन दोनों को एक नाजुक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था। लेकिन यह एक ऐसी कीमत थी, जिसे भारतीयों को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के लिए किसी भी हालत में चुकाना ही था। दुखद यह कि विभाजन दोनों मुल्कों के लिए बहुत घातक सिद्ध हुआ। परेशान करने वाला तथ्य यह है कि भारत और पाकिस्तान दो अलग राष्ट्र बनने के बाद अच्छे मित्र बनने के बजाय कटु दुश्मन बन चुके हैं। दोनों तरफ के नेताओं, विशेषकर पाकिस्तान के कुछ नेताओं को इस स्थिति के लिए गुनहगार माना जाएगा, जिन्होंने विभाजनकारी रेखाओं को और भी गहरा करने का कार्य किया है। कांग्रेस को जनता के समक्ष इस बात का खुलासा करना चाहिए कि जब मुस्लिमों को द्विराष्ट्रीय सिद्धांत के बारे में भ्रमित किया जा रहा था, उस दौरान कांग्रेस ने किसी अन्य विकल्प के बारे में क्यों विचार नहीं किया। कायद-ए-आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने तर्क पेश किया था कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग राष्ट्र होने चाहिएं। उन्होंने धर्म को राष्ट्रीयता का आधार माना। इसके विध्वंसकारी परिणाम हो सकते थे, लेकिन वह उस समय मुस्लिमों का समर्थन हासिल करने में सफल रहे थे। सत्ताओं का शांतिपूर्ण हस्तांतरण भी नाम का ही था। दोनों पक्षों के नेताओं के आश्वासन के बावजूद अपने ही मुल्क में अपने समुदाय के शरणार्थी शिविरों में रहना पड़ा था। उस दौरान जो रक्तपात हुआ, उससे पहले देश के इतिहास में ऐसा दृश्य कभी देखने को नहीं मिला। उस दौरान दोनों समुदायों के करीब दस लाख लोग मारे गए थे और इससे भी कई गुना लोगों को अपना घर-बार छोडक़र शरणार्थी शिविरों में पनाह लेनी पड़ी थी। स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान ने खुद को इस्लामिक मुल्क घोषित कर दिया, जबकि भारत ने पंथनिरपेक्षता को स्वीकार किया। 80 फीसदी हिंदू आबादी के बावजूद भारत ने संविधान के अनुसार शासन को प्राथमिकता दी। भारतीय कानून की नजर में हर भारतीय समान है और पंथ के आधार पर कोई भी छोटा-बड़ा नहीं है। इसके बावजूद राज्य संबंधी मामलों में मुस्लिमों की उपस्थिति बहुत कम है। वास्तविकता है कि स्वतंत्रता के बाद संयुक्त निर्वाचक मंडल की व्यवस्था को अंगीकार किया गया, उससे दोनों समुदायों में आपसी समरसता बढ़ी है। लेकिन यह भी एक जमीनी सच्चाई है कि इसका असर केवल चुनावों के दौरान ही देखने को मिलता है। जैसे ही चुनाव संपन्न हो जाते हैं, देश में दूसरे तत्त्व एक बार फिर से हावी हो जाते हैं और इसी के साथ मुस्लिमों की उपेक्षा का सिलसिला फिर से शुरू हो जाता है। इसी बीच हिंदुओं और मुस्लिमों में जो फासले चुनावों के पूर्व प्रभावी भूमिका में होते हैं, वे फिर से अपना असर दिखाना शुरू कर देते हैं। कमोबेश इसी स्थिति को भारत आज भी झेल रहा है।

Tags:    आमिर