देश में दवाओं का निदान

  • 2016-03-19 09:30:50.0
  • अभिषेक कुमार

स्वास्थ्य मंत्रालय ने कफ सीरप के मिश्रण समेत उन करीब 344 दवाओं को प्रतिबंधित करने की पहल की है, जिनमें दो या ज्यादा दवाओं का निश्चित मात्रा में मिश्रण होता है। मंत्रालय ने कार्रवाई यह कहते हुए की है कि इनसे लोगों की सेहत को खतरा है और इनके सुरक्षित विकल्प मौजूद हैं। अचरज इस बात का है कि जिन दवाओं पर पाबंदी लगाई गई है, उनमें से कई ऐसी हैं जिन्हें आम आदमी डॉक्टर के परचे के बगैर किसी भी दवा विक्रेता से भरोसे के साथ खरीदता रहा है और उनके बेशुमार विज्ञापनों, उनकी, बिक्री और इस्तेमाल में दशकों तक कोई बाधा नहीं रही है। इनमें कुछ नाम लिए जा सकते हैं, जैसे विक्स एक्शन 500, कफ सीरप कोरेक्स, फेनेसिडिल और बेनाड्रिल। इनके अलावा देश में धड़ल्ले से बिक रही पांच सौ और दवाओं पर पाबंदी की तलवार लटकती बताई जा रही है क्योंकि स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार मिश्रित दवाओं के नुस्खे या फिक्स्ड-डोज कॉम्बीनेशन (एफडीसी) से तैयार होने वाली ये विषाणुरोधी (एंटीबायोटिक) और एंटीडायिबिटक दवाएं अप्रासंगिक, असुरक्षित और अप्रभावी हैं। इन्हें बनाने व इनकी बिक्री को गैरकानूनी घोषित किया जा सकता है।

देश में दवाओं का निदान

मंत्रालय का कहना है कि ऐसी ज्यादातर दवाएं केंद्र सरकार की मंजूरी के बिना बनाई और बेची जा रही हैं। खास बात यह है कि कई दवाओं के मिश्रण से तैयार इन दवाओं को अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और जापान में बेचने की इजाजत नहीं है। बताया यह भी जा रहा है कि स्वास्थ्य मंत्रालय करीब छह हजार और दवाओं की जांच-पड़ताल कर रहा है जिनमें से एक हजार से ज्यादा एफडीसी यानी मिश्रण से तैयार नुस्खे हैं।

इन सैकड़ों-हजारों दवाओं को बनाने और बेचने पर पाबंदी की मंशा कई सवाल खड़े कर रही है। सबसे पहली जिज्ञासा यही है कि सालों-साल सरकार की नाक के नीचे खुल्लमखुल्ला बेची जाने वाली इन दवाओं में ऐसी क्या खराबी आ गई है, जो इन्हें बेचने-खरीदने पर पाबंदी लगाने की नौबत आई है। एफडीसी यानी फिक्स्ड-डोज कॉम्बीनेशन कहलाने वाली ये दवाएं गली-मोहल्लों के मेडिकल स्टोर से लेकर आम जनरल स्टोर तक में आसानी से मिल जाती हैं। खांसी-जुकाम जैसे मामलों में तो इन पर लोग आंख मूंद कर भरोसा करते आए हैं। पर अब बताया जा रहा है कि इन्हीं दवाओं की वजह से हमारे शरीर की रोगाणुरोधी प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती रही है। कुछ मामलों में टॉक्सिसिटी (दवाओं का विषैला प्रभाव) ज्यादा होने के कारण कई महत्त्वपूर्ण अंगों के नाकाम होने का खतरा भी पैदा हो जाता है। मोटेतौर पर ये ऐसी दवाएं हैं जिनमें दो या इससे अधिक दवाओं का निश्चित मात्रा (फिक्स-डोज कॉम्बीनेशन) में मिश्रण होता है।

इन दवाओं के सेवन का फौरन असर तो लोग महसूस करते हैं लेकिन थोड़े समय बाद इनके हानिकारक प्रभाव पैदा होने की बात अब बताई जा रही है। जैसे कहा जा रहा है कि इस तरह के एंटीबायोटिक के ज्यादा मात्रा में इस्तेमाल से सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर असर होता है और ये लिवर के लिए भी हानिकारक हैं। एफडीसी से तैयार होने वाले एंटीबायोटिक के ज्यादा सेवन से दिल का दौरा पडऩे का खतरा बढ़ जाता है।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपनी जांच में कई विटामिन मिश्रणों (कॉम्बीनेशंस) को भी अविवेकपूर्ण पाया। इन दवाओं के खतरों को भांपते हुए वर्ष 2013 में स्वास्थ्य से संबद्ध संसदीय समिति ने इस मामले में कड़ा रुख अख्तियार किया था और इन्हें सेहत के लिए खतरनाक बताते हुए बाजार से बाहर का रास्ता दिखाने को कहा था। समिति का यह भी कहना था कि कई कॉम्बीनेशंस में तो एक से ज्यादा एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल किया गया है, जो कि अवैज्ञानिक होने के साथ ही बैक्टीरिया और वायरस में दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकता है।

सबसे उल्लेखनीय तो सरकार की यह दलील है कि इनमें से कई दवाओं को दवा नियामक संस्था सीडीएससीओ से मंजूरी ही नहीं हैं और कंपनियां हानिकारक मिश्रण के बावजूद इनकी धड़ाधड़ बिक्री करती रहती हैं। पर जरा यह देखा जाए कि आखिर इन दवाओं के खतरों को महसूस करने में कितनी अधिक देरी की गई है। जैसे दवा कंपनी प्रॉक्टर एंड गैंबल ने प्रतिबंध के बाद अपने जिस लोकप्रिय ब्रांड विक्स एक्शन-500 एक्स्ट्रा के निर्माण और बिक्री पर रोक लगाने की कार्रवाई की है, उसे भारत के दवा बाजार में आज से तैंतीस साल पहले उतारा गया था। इसी तरह प्रतिबंधित की गई अन्य दवाओं में कोरेक्स और फेनेसिडिल बाजार में पच्चीस साल से बिक रही थीं और लोग इनका धड़ल्ले से सेवन कर रहे थे। सवाल है कि आखिर ढाई-तीन दशक तक स्वास्थ्य मंत्रालय क्या कर रहा था, जबकि इन्हीं दवाओं की बिक्री पर कई मुल्कों में पांबदी लगी हुई थी? क्या सरकारें इस मामले में जान-बूझ कर खामोश थीं? उल्लेखनीय है कि इन सैकड़ों-हजारों दवाओं को बनाने की इजाजत भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल (डीसीजीआई) कार्यालय से नहीं ली गई थी और राज्यों ने अपने स्तर पर ही इन्हें बनाने की इजाजत दवा कंपनियों को दे दी थी। इस बारे में दवा विशेषज्ञों का साफ मत है कि कई दवाओं या सॉल्ट से तैयार होने वाली इन दवाओं को एक नई दवा मान कर इनके ठीक वैसे ही क्लीनिकल ट्रायल होने चाहिए थे, जैसे नई दवाओं के होते हैं। हालांकि ट्रायल का मतलब है कि एक ही दवा के निर्माण और मंजूरी पर दवा कंपनियों को करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करने पड़ते और दवा को बाजार में उतारने में सालों का इंतजार करना पड़ता। संभवत: इसीलिए सारे नियम-कायदे ताक पर रख दिए गए और विज्ञापन-तंत्र की बदौलत ये दवाएं आम लोगों तक पहुंचा दी गईं।

यों सरकार इस मामले में यह कह कर अपना बचाव कर सकती है कि उसने वर्ष 2007 में भी ऐसी ही करीब 294 दवाओं पर रोक लगाई थी और राज्यों से इन्हें बनाने के लाइसेंस निरस्त करने को कहा था, लेकिन तब दवा कंपनियां उसके फैसले के खिलाफ अदालत में चली गई थीं और वहां से उन्हें राहत मिल गई थी।

इसके बाद सरकार की पहल पर दो साल पहले दवा तकनीकी सलाहकार बोर्ड की बैठक हुई और उसने इस मसले पर दिशा-निर्देश बनाने के लिए एक समिति का गठन भी किया। समिति की सिफारिशों के आधार पर ही इन सारी दवाओं की क्षमता और इंसानी सेहत पर उनके असर की जांच की जा रही है। पर करीब पांच-छह हजार दवाओं के इस जखीरे की जांच-पड़ताल और दवा कंपनियों के दावों की परख आसान काम नहीं है, क्योंकि अभी यह मामला सालों तक अदालत के गलियारों लटका रह सकता है।

इन मामलों को देखने से लगता है कि आखिर क्यों अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भारतीय दवा कंपनियों द्वारा बनाई गई दवाओं की गुणवत्ता को लेकर आशंकित रहते हैं और दवाओं में यदि कुछ भी अनुचित पाते हैं, तो उनका आयात रोक देते हैं। स्पष्ट है कि इन ज्यादातर देशों को अपने नागरिकों की सेहत की फिक्र है, जबकि हमारे देश में यह बात तो शायद सरकार के आखिरी एजेंडे में भी बड़ी मुश्किल से ही अटती रही है।
-अभिषेक कुमार

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