सांस्कृतिक भारत का अखंड स्वरुप

  • 2015-08-15 13:59:26.0
  • डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
सांस्कृतिक भारत का अखंड स्वरुप

डा0 कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

कहा जाता है कि वीर सावरकर की अस्थियाँ अभी भी उनके वंशजों के पास सुरक्षित हैं । वे अपनी मृत्यु से पूर्व वसीयत कर गये थे कि उनकी अस्थियाँ सिन्धु नदी में तभी प्रवाहित की जायें जब भारत एक बार फिर से अखंड हो जाये । अखंड भारत का क्या अर्थ है ? पन्द्रह अगस्त के दिन इसकी चर्चा करना सामयिक होगा क्योंकि इसी दिन भारत का विभाजन हुआ था । भारत की परिभाषा दो प्रकार से की जाती है । पहली सांस्कृतिक भारत और दूसरा भौगोलिक भारत । सांस्कृतिक भारत की सीमा तो निश्चित नहीं की जा सकती क्योंकि वह अवधारणा मानचित्र पर नहीं बल्कि ह्रदय में होती है । इसीलिए कहा जाता है कि किसी भी देश का सांस्कृतिक पक्ष अमूर्त होता है और भौगोलिक पक्ष मूर्त होता है । भौगोलिक भारत की सीमाओं का संकेत विष्णु पुराण में दिया गया है--- समुद्र के उत्तर में और सागर के दक्षिण में जो भू भाग फैला हुआ है वह भारत कहलाता है और इसकी संतान भारती कहलाती है । पुराणकार ने स्पष्ट ही इसमें भारत की भौगोलिक सीमाएँ निश्चित की हैं । लेकिन इसके भीतर रहने वाले लोग कौन हैं ? यदि पुराणकार इस भूभाग को केवल निर्जीव भौगोलिक इकाई मानता तो वह कहता कि हिमालय और सागर के बीच के इस क्षेत्र में रहने वाले लोग भारती या भारतीय हैं। लेकिन पुराणकार ने ऐसा नहीं कहा । उसने कहा कि इसकी संतानें भारती के नाम से जानी जाती हैं । यदि इस भू भाग में रहने वाली संतानें हैं तो भारत , भारत न रह कर भारत माता की अवधारणा में परिवर्तित हो जाता है । निर्जीव भू भाग में रहने वाले लोगों को निवासी न कह कर संतान कहने का अर्थ है कि पुराणकार भारत को ज़मीन का निर्जीव टुकड़ा नहीं बल्कि जीवन्त ईकाई  मानता है ।

जीवन्त या चेतनायुक्त के खंडित होने का ही दुख या दर्द होता है । खंडित शरीर पीड़ा दायक है इसलिये उसे फिर से अखंड बनाना है ताकि भारत माता की पीड़ा समाप्त हो जाये । भारत के इस अखंड स्वरुप को चिन्हित करने के लिये हम कितना पीछे जा सकते हैं ? स्पष्ट ही उस काल तक जब अफग़़ानिस्तान भारत के इस भूभाग के भीतर ही गिना जाता था और वहाँ के निवासी भी इसकी संतान में गिने जाते थे । लेकिन काल  प्रवाह में अफग़़ानिस्तान में रहने वाले लोगों ने धीरे धीरे भारत माता के व्यापक स्वरुप को नकार दिया और स्वयं को अलग मानना शुरु कर दिया । तब उस सीमित भू भाग को भी भारत माता का अंग मानना बंद कर दिया। यानि भारत माता के शरीर के उस अंग को लक़वा मार गया । लेकिन यह पुरानी घटना है। बहुत पुरानी । ज़्यादा से ज्यादा डेढ हज़ार साल पुरानी तो है ही ।

लेकिन भारत माता के शरीर के एक हिस्से को लक़वे मारने की बीमारी शुरु हो गई तो उसके शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैलने का ख़तरा शुरु हो गया । यदि उसी वक़्त इलाज शुरु हो जाता तो शायद बचाव हो सकता था ।  लेकिन ऐसा नहीं हुआ । शायद हो ही नहीं सकता था। जिस प्रकार इस्लामी विदेशी हमले शुरु हो गये थे , उसका मुक़ाबला करने के लिये भारतीय समाज की भीतरी संरचना को उसका मुक़ाबला करने के अनुकूल बनाना था । भारतीय समाज उसी प्रक्रिया में लग गया था । अंग्रेज़ों के आने के बाद पक्षाघात की यह बीमारी और तेज़ हो गई । या कहना चाहिये इलाज के नाम पर बदमाश डाक्टर ने यही निर्णय किया कि लकवाग्स्त हिस्से को काट दिया जाये । इसके लिये लम्बे समय तक लकवाग्स्त इलाक़े को चिन्हित किये जाते रहने का पाखंड चलता रहता । अंत में यहाँ से जाने से पहले उन्होंने पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान नाम से , भारत माता के दो अंगों को काट दिया । इसी पूर्वी पाकिस्तान ने कालान्तर में अपना नाम बांग्लादेश कर दिया । ज़ाहिर है इस अंग भंग से भारत माता को उस समय तो वेदना हुई होगी , अब तक भी हो रही है ।

लेकिन प्रश्न यह है कि इसके स्वरुप को पुन: अखंड कैसे किया जाये ? लकवाग्स्त हिस्से को फिजियोथ्रेपी से अनेक बार चिकित्सक ठीक कर देते हैं । लकवाग्रस्त हिस्सा फिर सामान्य हो जाता है । लेकिन फिजियोथ्रेपी तो तभी तक संभव है जब तक लकवाग्रस्त हिस्सा शरीर से काटा नहीं जाता । बांग्लादेश और पाकिस्तान तो भारत से काटे जा चुके हैं । बांग्लादेश का अर्थ है आधा बंगाल और पाकिस्तान का मतलब है सिन्ध , बलोचिस्तान , पूर्वी पंजाब और ख़ैबर पख्तूनख्वा । ध्यान रहे पुराने साहित्य में सिन्ध के अतिरिक्त बाक़ी के ये क्षेत्र पंजाब ही कहलाते थे । ख़ैर वर्तमान स्थिति में भारत को पुन: अखंड बनाने के लिये क्या प्रयास हो सकते हैं , यह महत्वपूर्ण है ।

सबसे पहले तो डा0 भीम रामजीराव आम्बेडकर की बात की जाये , जिन्होंने विभाजन से कुछ समय पूर्व थाटस आन पाकिस्तान लिख कर खासी हलचल मचा दी थी और उन्हें इसके लिये तीखी आलोचना का शिकार भी होना पड़ा था । आम्बेडकर ने आशा व्यक्त की थी कि विभाजन के बाद कुछ ही साल में उन लोगों को , जिन्होंने पाकिस्तान के निर्माण के लिये जी जान लगाई थी , अपनी ग़लती का एहसास हो जायेगा और पाकिस्तान फिर अपने मूल से जुड़ जायेगा । आम्बेडकर की कल्पना में यह काम दस साल के भीतर हो जायेगा , लेकिन भारत माता के दुर्भाग्य से उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पायी । इतना ही नहीं पाकिस्तान सरकार का विरोध भारत के प्रति बढ़ता ही गया है ।

एक हल अपने वक़्त में लाला हरदयाल ने सुझाया था । यह पिछली शताब्दी के दूसरे या तीसरे दशक की बात थी । उस समय तक पाकिस्तान और बांग्ला देश नहीं बने थे । इसलिये लाला हरदयाल की वेदना अफग़़ानिस्तान को लेकर थी । उन्होंने सुझाव दिया था कि अफग़़ानिस्तान का पुन: हिन्दूकरण करना होगा । आज की शब्दावली में कहें तो वहाँ के लोगों की घर वापिसी । भारत को अखंड करने का और सुरक्षित करने का यही तरीक़ा है। हिन्दूकरण से शरीर के उस हिस्से का लकवा दूर हो जायेगा और वह भारत के अन्य सामान्य अंगों की तरह व्यवहार करने लगेगा । यानि हिन्दूकरण , लाला हरदयाल के लिये फिजियोथ्रेपी थी । लेकिन इसका एक दूसरा अर्थ भी है । लकवा क्यों हुआ है , इसका कारण भी ढूँढ लिया गया है । भारत के जिस हिस्से की संतानों का मतान्तरण हो गया , कालान्तर में उस हिस्से को लकवा मार गया और वह हिस्सा धीरे धीरे देश से ही अलग हो गया । पहले मानसिक तौर पर और बाद में भौगोलिक तौर पर । उसी का इलाज लाला हरदयाल ने ढूँढा था । हिन्दूकरण या फिर आर्यसमाज की शब्दावली में कहें तो शुद्धीकरण ( लाला हरदयाल आर्यसमाजी थे) और आज की शब्दावली में कहना हो तो घर वापिसी । बहुत बाद में प्रो0 बलराज मधोक ने इसके लिये भारतीयकरण शब्द का प्रयोग किया। लेकिन वह अफग़़ानिस्तान और पाकिस्तान के लोगों के लिये नहीं था बल्कि भारत के भीतर के इस्लाम मताबलम्बियों के लिये था । लेकिन लाला हरदयाल द्वारा सुझाए गये इस इलाज का उत्तर भी आम्बेडकर ने ही दिया था । आम्बेडकर ने इस इलाज को नामुमकिन बताया था । उनका कहना था कि इसके लिये जितना पैसा चाहिये था वह कहाँ से आयेगा ? दूसरा इस्लामी देशों में इस्लाम से बाहर जाने की अनुमति नहीं है । इस अपराध की सज़ा मौत है । ऐसे हालात में यह प्रयोग संभव ही वहीं है । आम्बेडकर इस मामले में यथार्थ के ज़्यादा नज़दीक़ दिखाई देते हैं ।

एक तीसरा तरीक़ा भी है , जिसका प्रयोग अभी भी कुछ सीमा तक किया जा रहा है । लकवाग्रस्त और काट दिये गये क्षेत्र के स्थानों से भावनात्मक जुड़ाव बनये रखना । गुरु नानक देव जी के जन्मस्थान ननकाना साहिब जाते रहना । कटासराज मंदिर की तीर्थ यात्रा करना , हिंगलाज देवी के मंदिर की तीर्थ यात्रा इत्यादि । बंगलादेश में ढाकेश्वरी मंदिर की तीर्थयात्रा को पुन: प्रारम्भ करना । इसी प्रकार पाकिस्तान और बांग्लादेश में कुछ इसी प्रकार के अन्य ऐतिहासिक स्थानों की पहचान की जा सकती है । यह प्रयोग कुछ सीमा तक तो चालू है , लेकिन इसका और विस्तार किया जा सकता है ।