गऊ-सेवा ही सच्ची राष्ट्र सेवा है : सुनील गऊदास

  • 2014-11-09 13:24:49.0
  • उगता भारत ब्यूरो

[caption id="attachment_17296" align="alignright" width="364" class=" "]sunil gaudas नई दिल्ली। ‘उगता भारत ट्रस्ट’ के नवनियुक्त राष्टरीय संयोजक सुनील गऊदास जी का साक्षात्कार लेते उगता भारत समाचार पत्र के सहसंपादक श्रीनिवास एडवोकेट। छाया : उगता भारत[/caption]

श्री सुनील गऊदास जी महाराज गौ सेवा के लिए पूरे देश में कार्य कर रहे हैं। कई राष्ट्रीय स्तर के गौ सेवा प्रतिष्ठानों ने उन्हें इस कार्य के लिए सम्मानित भी किया है। परंतु श्री गऊदास गौ सेवा के प्रति इतने समर्पित हैं कि उन्हें ये सम्मान बहुत छोटी चीज नजर आते हैं। पिछले दिनों उन्हें ‘उगता भारत ट्रस्ट’ का राष्ट्रीय संयोजक नियुक्त किया गया था। तब उनसे गौ सेवा के विषय में जो चर्चा हुई उसके मुख्य अंश हम यहां प्रस्तुत कर  रहे हैं-

उ.भा.: गऊदास जी गाय के विषय में आपके क्या विचार हैं?

गऊ दास जी: देखिए गाय भारतीय संस्कृति की रीढ़ है, इसलिए भारतीय संस्कृति को ही यदि गो-संस्कृति कहा जाए तो भी कोई अतिश्योक्ति नही है। हमें गौ के विषय में ध्यान रखना चाहिए कि यह विशुद्घ सत्वमयी भगवती पृथ्वी की प्रतिमूर्ति है, समग्र धर्म, यज्ञ, सतकर्म और विश्व संचालन का आधार है और सीधेपन तथा वात्सल्य की तो सीमा ही है। इसके दर्शन, स्पर्श, वंदन, अभिनंदन, आदि से मनुष्यों के कितने ही रोग, शोक और संताप मिट जाते हैं।

उ.भा. : स्वतंत्रता के पश्चात देश में गाय की दुर्गति क्यों हुई?

गऊ दास जी: देखिए गऊ के प्रति मेरा समर्पण अनन्य है, गऊ मेरी माता है, और मैं गऊ का वत्स (बछड़ा) हूं। गऊ सेवा करना मेरे लिए प्रदर्शन की बात नही है। अपितु गऊ मेरी माता होने के कारण मेरा पालन पोषण कर रही है, इसलिए उसके प्रति पूर्ण समर्पण हमारा राष्ट्रीय संस्कार बनना चाहिए। स्वतंत्रता से पूर्व हमारे देश के लोगों की गऊ माता के प्रति ऐसी ही भावना हुआ करती थी इसलिए भारत रोग, शोक और संतापों से मुक्त था। तब इस देश को लोग सोने की चिडिय़ा कहा करते थे। तब दुख दारिद्रय इस देश में नही था। पर आजादी के बाद स्थिति में आमूल चूल परिवर्तन आया। हमारी सोच गऊ माता के प्रति बदल गयी,  और गऊ हमारे लिए केवल एक प्राणी होकर रह गयी। जिससे आज गऊ माता इस देश में सबसे अधिक दुखी है। जिसे देखकर असीम पीड़ा होती है।

उ.भा.: गऊ माता के प्रति लोगों में जागृति कैसे लाई जाए?

गऊ दास जी: इसके लिए हमें  अपनी देशी गाय की उपयोगिता को आम लोगों को बताना समझाना पड़ेगा। विदेशी जर्सी गाय हमारे लिए रोगों का खजाना है, जबकि हमारी अपनी देशी गाय हमारे स्वास्थ्य का खजाना है, इस अंतर को हमें संचार माध्यमों और विचार गोष्ठियों के द्वारा समझाना होगा। गऊ माता के  गोबर, गोमूत्र, दुग्ध, छाछ आदि से ही नही अपितु गायों के आवास तक से हमारे लिए स्वास्थ्य प्रद गंध निकलती है, जिसे आज हमारा देश भूल रहा है। भारतीय गायों का विशिष्ट लक्षण है इसका गलकंबल और पीठ का ककुद। गऊ माता की सेवा से जो भी आध्यात्मिक और आर्थिक लाभ हैं वह देशी गऊ की सेवा से ही हैं।

उ.भा. : बैलों के बारे में आप क्या कहेंगे?

गऊ दास जी: हमारे यहां माना गया है कि वृषो हि भगवान्  धर्म:। जब साक्षात् धर्म रूप वृषभ: चतुष्पाद से संपन्न होकर पृथ्वी पर विचरण करेगा, तब पूर्ण सतयुग आ जाएगा, और सभी लोग जितेन्द्रिय होकर भक्त, संत, धर्मात्मा, महात्मा एवं विद्वान बन जाएंगे। किसी को किसी वस्तु का स्वप्न में भी अभाव नही होगा, परिपूर्ण परमानंनद की व्याप्ति एवं प्राप्ति होने लगेगी।

गऊ से जितने लाभ हमको प्राप्त होते हैं, वृषभ: से भी हम उसी अनुपात में नही तो बहुत अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं, इसलिए शास्त्रकारों ने वृषभ: अर्थात बैल को भी हमारे लिए बहुत उपयोगी बताया है। इसके गोबर से हम जैविक खाद तैयार कर सकते हैं, हवन के लिए समिधाएं प्राप्त कर सकते हैं, उससे भार  वाहन और ट्रैक्टर की जगह कृषि उत्पादन के लिए काम ले सकते हैं। वृषभ  प्राचीन काल से ही किसान का सच्चा मित्र रहा है। भूल हमने की है, उससे अपनी मित्रता तोडक़र।  श्री गऊदास ने कहा कि इस समय पूरा विश्व भारत की ओर बड़ी आशा भरी नजरों से देख रहा है। यह काल भारत के उत्थान का काल है, जिसमें हमें अपने सांस्कृतिक मूल्यों को गले लगाकर आगे बढऩा होगा और उसके लिए इस समय देश में गऊ क्रांति करने की आवश्यकता है।