कोचिंग उद्योग के भरोसे चलती शिक्षा

  • 2015-12-19 10:00:15.0
  • उगता भारत ब्यूरो

हरिवंश चतुर्वेदी
राजस्थान का कोटा शहर 70 और 80 के दशकों में एक औद्योगिक शहर के रूप में जाना जाता था। कोटा की पहचान अब देश की कोचिंग इंडस्ट्री के केंद्र के रूप में होती है। समूचे उत्तर भारत के छोटे-बड़े शहरों से हर साल सवा लाख से अधिक विद्यार्थी इंजीनियरिंग और मेडिकल की कोचिंग के लिए कोटा आते हैं।

आज कोटा में लगभग 150 कोचिंग संस्थान हैं, जो औसतन एक लाख रुपये की सालाना फीस हर विद्यार्थी से वसूलते हैं। एशियाई विकास बैंक (एडीबी) द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, कोटा की कोचिंग इंडस्ट्री का आकार 600 करोड़ रुपये का है, जो सालाना 15 प्रतिशत बढ़ रहा है। भारत में कोचिंग इंडस्ट्री सिर्फ कोटा तक सीमित नहीं है। अपने संगठित और असंगठित रूपों में यह शहरों से लेकर गांवों तक पूरे देश में फैल गई है।

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हमारी स्कूली-शिक्षा में शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों पर व्यक्तिगत ध्यान न दिए जाने और स्कूली विद्यार्थियों में प्रतियोगी परीक्षाओं की ओर बढ़ते रुझान ने प्राइमरी से डिग्री कॉलेजों तक ट्यूशन और कोचिंग के जाल को बिछा दिया है। कोचिंग इंडस्ट्री का सबसे बुरा असर स्कूली शिक्षा पर पड़ा है। दसवीं पास करने के बाद लाखों किशोर विद्यार्थी आईआईटी की जेईई परीक्षा में बैठने के लिए कोचिंग में लग जाते हैं। उनके लिए 12वीं की परीक्षा पास करना आनुषंगिक हो जाता है।
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने 2010-2011 में भारत में कोचिंग इंडस्ट्री के आकार का अंदाज 40,187 करोड़ रुपये लगाया था, जो 2014-2015 में 75,629 करोड़ रुपया हो चुका था। ऐसोचैम के एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में कोचिंग इंडस्ट्री का आकार 2.60 लाख करोड़ रुपया है। एशियाई विकास बैंक द्वारा 2012 में किए गए अध्ययन के अनुसार, भारत में हाई स्कूलों में पढ़ रहे 83 प्रतिशत विद्यार्थी कोचिंग कक्षाओं में जाते हैं।
भारत में स्कूली विद्यार्थी सबसे ज्यादा कोचिंग इंजीनियरिंग और मेडिकल में प्रवेश पाने के लिए करते हैं। इंजीनियर बनने का सपना देखने वाला हर विद्यार्थी आईआईटी में दाखिला चाहता है। आईआईटी संस्थानों की 10,000 सीटों पर प्रवेश के लिए जिस संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई-मेन) का आयोजन हर वर्ष किया जाता है, उसमें करीब 13 लाख विद्यार्थी अपना भाग्य आजमाते हैं। उनमें से सिर्फ 1.5 लाख विद्यार्थियों का चयन जेईई (एडवांस) परीक्षा के लिए किया जाता है। बढ़ती लोकप्रियता के कारण इसकी कोचिंग देने वाले संस्थान अब बड़ी कोचिंग कंपनियों का रूप ले चुके हैं।
जेईई परीक्षा से जुड़ी समस्याओं पर सुझाव देने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने जिस अशोक मिश्रा समिति का गठन किया था, उसका मकसद प्रवेश परीक्षा में ऐसा बदलाव सुझाना था, जिससे छात्रों पर मानसिक दबाव कम हो और कोचिंग संस्थानों पर उनकी निर्भरता घट सके। समिति ने अपनी रिपोर्ट में जेईई के लिए कोचिंग लेने वाले विद्यार्थियों में दाखिले के लिए बढ़ते मानसिक दबाव, एकांगी विकास और कोचिंग के लिए आने-जाने में खराब होने वाले समय पर चिंता व्यक्त की है। कोचिंग उद्योग की निगरानी के लिए ऑल इंडिया काउंसिल फॉर कोचिंग ऑफ एंट्रेंस एग्जामिनेशन (एआईसीसीईई) स्थापित करने का भी सुझाव दिया गया है।
पिछले 10-15 वर्षों में स्कूली शिक्षा को सुधारने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएं चलाईं और कई अभियानों को संचालित किया। राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान, मिड-डे मील और शिक्षा का अधिकार जैसी योजनाओं पर लाखों करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन सरकारी स्कूलों की हालत जस-की-तस रही। अपने देश में स्कूलों में 25 करोड़ बच्चे पढ़ते हैं, जिन्हें एक करोड़ शिक्षक पढ़ाते हैं। 'प्रथम' जैसे स्वयंसेवी संगठनों द्वारा लगातार किए जाने वाले सर्वेक्षणों से जाहिर होता है कि 80 प्रतिशत स्कूली बच्चों की हो रही पढ़ाई-लिखाई बहुत खराब है। पांचवीं कक्षा के बच्चों का स्तर यदि दूसरी कक्षा तक का भी न हो, तो यह क्या स्कूली शिक्षा के नाम पर भद्दा मजाक नहीं होगा?
क्या अभिभावक प्राइवेट ट्यूशन की व्यवस्था से खुश हैं? कदापि नहीं। उनकी मजबूरी है कि यदि वे अपने बच्चों को ट्यूशन और कोचिंग के लिए नहीं भेजेंगे, तो उन्हें इंजीनियरिंग, मेडिकल के रोजगारपरक कोर्स में दाखिला नहीं मिलेगा। कोटा जैसी कोचिंग में पढ़ाने के लिए मध्यवर्ग भी आर्थिक दबाव में है, क्योंकि दो वर्षों तक चार-पांच लाख रुपये खर्च करके भी यह जरूरी नहीं कि हर बच्चे को आईआईटी में दाखिला मिल जाए।
हमारे सरकारी स्कूलों की कायापलट कब और कैसे होगी- यह कहना कठिन है। विद्यार्थियों से ठसाठस भरे क्लास रूम में अच्छे अध्यापक से भी यह उम्मीद करना मुश्किल होगा कि वह हरेक विद्यार्थी पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान दें। सरकारी या प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले हर विद्यार्थी को व्यक्तिगत कोचिंग अथवा ट्यूशन की जरूरत होती है। क्या गरीब एवं निम्न-मध्यवर्ग के परिवार ट्यूशन व कोचिंग का भार झेल पाएंगे? क्या उनकी अगली पीढि़यों को रोजगार के बाजार में प्रतियोगी बनाने के लिए कोचिंग-ट्यूशन की जरूरत नहीं पड़ेगी? अगर हां, तो यह कैसे संभव होगा और इसे करने की जिम्मेदारी किस की होगी?
इन कठिन सवालों के हल ढूंढ़ने में जिस व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी मिली है, उनका नाम है- सलमान खान, जो खान एकेडमी, यूएसए के संस्थापक और सीईओ हैं।
सलमान की मां दिल्ली में पढ़ी हैं और पिता बांग्लादेश से संबंध रखते हैं। एमआईटी और हार्वर्ड में पढ़ने के बाद सलमान ने अपने चचेरे भाई-बहनों और रिश्तेदारों के बच्चों को मुफ्त गणित तथा विज्ञान पढ़ाने का जो अनोखा प्रयोग किया, उसने आज दुनिया में तहलका मचा रखा है। सलमान खान ने गणित, विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा कंप्यूटर साइंस के हजारों वीडियो बनाए हैं। आज खान एकेडमी का उपयोग 2.6 करोड़ स्कूली बच्चे और अभिभावक करते हैं। अब तक एकेडमी 58 करोड़ लेक्चर और 400 करोड़ अभ्यास का संचालन कर चुकी है। एकेडमी 190 देशों की 36 भाषाओं में अपने वीडियो उपलब्ध कराती है।
उल्लेखनीय बात यह है कि खान एकेडमी एक 'नॉट-फोर-प्रॉफिट' संस्था है और अपनी सेवाएं मुफ्त प्रदान करती है।
सलमान खान का कहना है कि वह धनी व्यक्तियों से दान लेते हैं, जिनसे उन्हें 80 प्रतिशत आय होती है। खान एकेडमी से मुफ्त में पढ़ने वाले कुछ स्कूली बच्चे भी पांच से 10 डॉलर का दान उन्हें देते है। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कुछ बड़ी हस्तियां सलमान खान के बड़े समर्थक हैं, जैसे बिल गेट्स (माइक्रोसॉफ्ट), एरिक स्मिट (गूगल), रीड हेस्टिंग्स (नैटफ्लिक्स), कालार्ेस स्लिम (ग्रुपो कारसो)। पिछले सप्ताह खान एकेडमी ने भारत मंे हिंदी माध्यम की सेवाएं शुरू की हैं। सलमान अन्य भारतीय भाषाओं की ट्यूशन सेवाएं भी शुरू करने वाले हैं। फिलहाल वह एनसीईआरटी की 5वीं से 8वीं कक्षा तक के गणित विषय की फ्री ट्यूशन सेवा शुरू कर रहे हैं।
भारत की स्कूली शिक्षा में समस्याओं का अंबार लगा है। चारों तरफ नकारात्मक सोच दिखाई देती है। समृद्ध वर्ग के बच्चों के लिए चमकते-दमकते स्कूल और प्रतिभाशाली शिक्षक उपलब्ध हैं, पर साधनहीन, गरीब, वंचित वर्ग के करोड़ों बच्चों को भी अच्छे स्तर की स्कूली शिक्षा चाहिए। अभी कई दशकों तक इन बच्चों को ट्यूशन और कोचिंग की जरूरत रहेगी क्योंकि उनके मां-बाप पढ़े-लिखे नहीं हैं। हम खान एकेडमी के अनुभव को किसी भी कारण से खारिज करें, मगर भारत की स्कूली शिक्षा को सुधारने के कई नुस्खे सलमान खान के पास हैं।