विक्रम संवत के प्रवर्तक चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

  • 2016-04-11 09:30:37.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

विक्रम सम्बत का प्रवर्तन अर्थात प्रारम्भण करने वाले चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य कानाम विक्रम सेन था।अपने ज्ञानए वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्धविक्रमादित्य का जन्मकलि काल के 3000 वर्ष बीत जाने पर 101 ईसा पूर्व हुआ और उन्होंने 100 वर्ष तक राज किया।विक्रमादित्य भारत की प्राचीन नगरी उज्जयिनी के राजसिंहासन पर बैठने वाले चक्रवर्ती सम्राट थे । जिनके दरबार में उपस्थित रहने वाले नवरत्न आज भी प्रसिद्ध हैं । इनमें कालिदास भी थे। कहा जाता है कि विक्रमादित्य बड़े पराक्रमी थे और उन्होंने शकों को परास्त किया था।देश में सर्वाधिक प्रचलित विक्रम संवत को उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा ही प्रवर्तित माना जाता है। 3068 कलि अर्थात 34 ईसा पूर्व में रचित ज्योतिर्विदाभरण ग्रंथ में इस संवत के विक्रमादित्य द्वारा प्रवर्तन किये जाने की पुष्टि करते हुए कहा गया है कि विक्रमादित्य ने 3044 कलि अर्थात 57 ईसा पूर्व विक्रम संवत चलाया। कुछ ग्रंथों के अनुसार इन्द्रप्रस्थ के राजा राजपाल ;36 वर्षद्ध को सामंत महानपाल ने मारकर मात्र एक पीढ़ी में चौदह वर्ष तक राज्य किया। राजा महानपाल के राज्य पर राजा विक्रमादित्य ने अवन्तिका ;उज्जैनद्ध से लड़ाई करके महानपाल को मारकर एक पीढ़ी में 93 वर्ष तक राज्य किया। राजा विक्रमादित्य को मारकर शालिवाहन का उमराव समुद्रपाल योगी पैठणके ने मारकर वह और उसकी सोलह पीढिय़ों ने372 वर्ष चार मास सताईस दिन तक राज्य किया।

महाराजा विक्रमादित्य के सम्बन्ध में भविष्य पुराण और स्कंद पुराण में विस्तृत विवरण अंकित मिलता है।भविष्य पुराण के अनुसारए नाबोवाहन ;नववाहनद्धके पुत्र राजा गंधर्वसेन भी चक्रवर्ती सम्राट थे। गंधर्वसेन के पुत्र विक्रमादित्य और भर्तृहरी थे। विक्रमादित्य ईसा मसीह के समकालीन थे और उस समय उनका शासन अरब तक फैला हुआ था और उन्होंने अरब देश में एक ही स्थान पर 360 मंदिरों का निर्माण करवाया था जिसके मध्य में मक्केश्वर महादेव विराजमान थे।विक्रमादित्य के बारे में प्राचीन अरब साहित्य में भी वर्णन मिलता है।दरअसलए विक्रमादित्य का शासन अरब और मिस्र तक फैला हुआ था और संपूर्ण विश्व उनके नाम से परिचित था। फिर भी विक्रमादित्य के इतिहास को अंग्रेजों ने जान.बूझकर तोड़ा और भ्रमित किया और उसे एक मिथकीपय चरित्र बनाने का हर सम्भव प्रयास कियाए क्योंकि विक्रमादित्य उस काल में महान व्यक्तित्व और शक्ति के प्रतीक थेए जबकि अंग्रेजों को अपने आपको सर्वोपरि और फिर भारत को अनंत काल तक दासता की बेड़ी में जकड़े रहने के लिए यह सिद्ध करना जरूरी था कि ईसा मसीह के काल में दुनिया अज्ञानता में जी रही थी। लेकिन ऐतिहासिक ग्रन्थों के अध्ययन से ठीक इसके विपरीत इस सत्य का सत्यापन होता है कि कश्मीर के एक राजा मेघवाहन हुए हैं ए जिन्होंने भारतमें बाहर वर्षीय कुम्भों के समारोह की प्रथा आरम्भ की थी। मेघवाहनका पुत्र प्रवरसेम था और उसके दो पुत्र थे. हिरण्य और तोरमाण।दोनों भाई प्रेमपूर्वक राज्य कार्य बांटकर चलाते रहे। तोरमाण राज्य की अर्थ.व्यवस्था देखता था। उस काल में मुद्राएँ साहूकार चलाते थे। तोरमाणकी पत्नी काशिराज की पुत्री होने से अपने पिता के राज्य की प्रथा चलानेकी प्रेरणा अपने पति को देने लगी और राज्य की ओर से निश्चित भार की दीनार नामकी मुद्रा प्रचलित कर दी गई। मुद्रा पर नाम तोरमाण का नाम मुद्रित किया गया।बड़े भाई हिरण्य को उसकी पत्नी ने भडक़ाया और कहा कि अपने नाम सेमुद्रा चलाकर छोटा भाई स्वयं राजा बनना चाहता है। बड़े भाई हिरण्यको जब इस पर संदेह हुआ तो उसने छोटे भाई को बन्दीगृह में डाल दिया।उसकी पत्नी अंजना उसके साथ ही बन्दीगृह में रहने लगी। वहाँ उसके गर्भठहरा तो वह बन्दीगृह से निकल आलोप हो गयी। सुदूर पूर्व में राज्य केभीतर ही एक गाँव में एक कुम्हार के घर में छुपे रहकर उसने पुत्र को जन्मदिया और पुत्र का नाम उसके बाबा के नाम पर प्रवरसेन रख दिया। माँ को भय था कि हिरण्य अपनी पत्नी के सिखाने पर उसके पुत्र को कहीं नमरवा देए इस कारण वह गुप्त स्थान पर एक कुम्हार के परिवार में रहती हुईपुत्र प्रवरसेन का गाँव में ही पालन.पोषण करती रही।कुछ काल के उपरांत बन्दीगृह में तोरमाण का देहान्त हो गया और कुछही समय उपरान्त हिरण्य भी निरूसंतान मर गया। इस प्रकार राज्यविहीनहो गया। तब मन्त्रिगण मंत्री.सभा बना राज्य चलाने लगे। कई वर्ष तकमन्त्रिमण्डल राज्य चलाता रहा। इस काल में मन्त्रियों में कोई प्रमुखनहीं था। इस कारण सब लूट.खसोट करने लगे और राज्य में अराजकता बढऩेलगी तो मन्त्रियों ने यह उचित समझा कि भारत.सम्राट विक्रमादित्य सेकहा जाये कि कोई अपने आधीन राजा वहाँ शासन करने के लिए भेज दें।विक्रमादित्य ने अपनी सभा के कवि मातृगुप्त को वहाँ भेज दिया। इसविक्रमादित्य के विषय में राजतरंगगिणी में कहा गया है कि वह शकों को देश सेबाहर करने वाला था। इससे यह भास मिलता है कि वह विक्रमादित्य गुप्तपरिवार का शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय था। इससे यह अनुमान भी ठीकप्रतीत होता है कि मातृगुप्त विख्यात कवि कालिदास ही था। एक बात औरभी इस कल्पना का समर्थन करती है। वह यह कि कालिदास के माता.पिता का ज्ञान नहीं। ध्यातव्य हो कि कुछ इतिहासकार इसविक्रमादित्य को गुप्त परिवार का नहीं मानते और न ही मातृगुप्त को रघुवंशका रचियता मानते हैं।

कुछ इतिहासकारों का विचार है कि चंद्रगुप्त द्वितीय को उसके पिता समुद्रगुप्तने तब ही विक्रमादित्य की उपाधि से विभूषित कर दिया थाए जब वहअभी राजकुमार ही था। वह उस समय भी शकों से युद्ध में बहुत शौर्य प्रकटकर चुका था।
-अशोक प्रवृद्ध