हर देशवासी के लिए पितृभू: और पुण्यभू: हो भारत

  • 2016-07-17 09:30:00.0
  • राकेश कुमार आर्य
हर देशवासी के लिए पितृभू: और पुण्यभू: हो भारत

'उगता भारत' के भव्य कार्यक्रम में उपस्थित जनगण को संबोधित करते हुए अपनी पुस्तकों के विमोचन के अवसर पर उनकी आवश्यकता के संदर्भ में बोलते हुए पत्र के प्रधान संपादक राकेश कुमार आर्य ने कहा-

''मुझे इतिहास के लेखन और उसके सच का बोध जैसा कि मुझसे पूर्व वक्ता रहे पत्र के चेयरमैन श्रद्घेय श्री देवेन्द्रसिंह आर्य जी ने स्पष्ट कर दिया है, अपने पूज्यपिताश्री महाशय राजेन्द्रसिंह आर्य जी से ही मिला। आज मेरे लिए उस प्रेरणा की लौ को जगाने का कार्य मेरे पिता तुल्य तीनों अग्रज कर रहे हैं और आप जैसे सुबुद्घ पाठक उस पर प्रोत्साहन देकर मुझे आगे बढऩे का हौंसला देते हैं। इस सबको मैं अपना सौभाग्य समझता हूं।

मैं जब अपने इतिहास के अनछुए पहलुओं को खोजता हूं तो एक ही बात रह-रहकर दिल से निकलती है कि :-

''एक हूक सी दिल में उठती है

एक दर्द जिगर में होता है।

हम रात को उठकर रोते हैं

जब सारा आलम सोता है।।''

जब मैं देखता हूं कि अपना प्यारा आर्यावर्त कटते-कटते और उसके टुकड़े टुकड़े करते आज के भारत या

'इंडिया' के रूप में कितना छोटा सा रह गया है और इसे बांटने व काटने के षडय़ंत्र आज भी पूर्ववत जारी हैं, तो मन करता है कि सारी रात जागता रहूं, सारी रात लिखता रहूं, मेरी लेखनी उन षडय़ंत्रों को खोलती और खोजती रहे जो इस देश के गौरव को मिटाने के लिए काम कर रही हैं।

जिस समय देश आजाद हुआ था उस समय देश का पहला प्रधानमंत्री नेहरू जी को बनाकर इस षडय़ंत्र की नींव रख दी गयी थी। उस समय देश के पंद्रह राज्यों में से बारह प्रांतों की कांग्रेस कार्यकारिणियों का प्रस्ताव सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाने के लिए गया था, जबकि दो राज्य ऐसे थे जो सी. राजगोपालाचार्य को देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे और केवल एक प्रांत ऐसा था-जो नेहरू जी के साथ था। परंतु गांधीजी की जिद ने नेहरू को देश का प्रधानमंत्री बनवा दिया। नेहरू जी ने अपने मंत्रिमंडल में शिक्षामंत्री का दायित्व मौलाना अब्दुल कलाम आजाद को दिया। जिन्होंने भारत के इतिहास में कालखण्डों का निर्धारण विदेशी आक्रांताओं के नाम से यथा सल्तनत काल, मुगलकाल, ब्रिटिश काल-इस प्रकार कर दिया। जिससे भारत के गौरवमयी इतिहास की प्रस्तुति पर प्रश्नचिन्ह लग गया। तब से हम आज तक कहते जा रहे हैं कि महाराणा प्रताप महान न होकर अकबर महान था। इस भावना को इस देश में गांधी के प्रति हमारे उस आदर्श ने स्थापित किया जिसे हम ये कहकर दोहराते हैं कि-

'साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल....

दे दी हमें आजादी बिना खडग़ बिना ढाल'

आज गांधीजी की अहिंसा पाकिस्तान में निढाल हुई पड़ी है जहां ढाई करोड़ हिंदुओं को मिटाते मिटाते अब केवल बीस पच्चीस लाख छोड़ा गया है। मैं बताना चाहूंगा कि 1924 में लाला लाजपतराय ने देशबंधु चितरंजनदास के लिए एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने कहा था कि मैं भी चाहता हूं कि हिंदू मुस्लिम एकताा की बातें की जाएं। मैंने पिछले छह महीने से कुरान का अध्ययन किया है, जिसकी शिक्षा साथ रहकर चलने की इजाजत नही देती। ऐसा देखकर मेरा मन एकता की झूठी बातों से हट जाता है।

मैं कहना चाहूंगा कि जिसने ये गीत बनाया कि....रोते हैं कुरान और गीता....उसने कुरान और गीता दोनों की शिक्षाओं को एक जैसा मानकर भूल की है। मानवता की हत्या पर तो केवल वही पुस्तक रोएगी जो मानवता वाद की बात करती हो। यदि कुरान में भी ऐसी शिक्षाएं हैं तो उनको मूल इस्लाम घोषित कर उसका प्रचार प्रसार होना चाहिए।

मैंने अपनी पुस्तक में आज के भारत के प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व को केवल इसलिए सराहा है कि आज हमें अपने प्राचीन गौरव को समझने और उस पर अनुसंधान एवं शोध करने का खुला माहौल मिला है। आज हमारा सैनिक सीमा पर खड़े होकर चीन के सैनिक की आंखों में आंख डालकर बात करता है, सारा देश ऊर्जा से और आत्मविश्वास से भरा हुआ लगता है, पाकिस्तान को कश्मीर के विषय में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय समर्थन नही मिल रहा है और हम कश्मीर में पाकिस्तान के अराजक और आतंकी तत्वों के साथ अपनी सेना को निर्णायक रूप से पहली बार लड़ते हुए देख रहे हैं। ऐसे ऊर्जावान नेतृत्व का अभिनंदन होना ही चाहिए।

मैं अंत में एक बात कहकर अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं-बात 1960 के दशक की है, जब प्रधानमंत्री श्री नेहरू इंडोनेशिया की यात्रा पर गये थे तो उस समय वहां के राष्ट्रपति सुकुर्ण थे, जिन्होंने भारत के प्रधानमंत्री के सम्मान में रात को रामलीला का मंचन कराया था।

प्रधानमंत्री श्री नेहरू ने मंच पर अपना स्थान ग्रहण किया। पड़ोस में राष्ट्रपति सुकर्ण बैठे थे। जब रामलीला का मंचन आरंभ हुआ तो भारत के सैक्युलर प्रधानमंत्री के मानस में गुदगुदी होने लगी उन्होंने राष्ट्रपति सुकर्ण से पूछ ही लिया कि आप मुसलमान होकर रामलीला क्यों कराते हैं? तब राष्ट्रपति सुकर्ण ने जो उत्तर दिया था उससे हमारे सैक्युलर पीएम मौन होकर निरूत्तर हो गये थे। आशा है आपको राष्ट्रपति सुकर्ण का उत्तर अवश्य ही रोमांचित करेगा। उन्होंने कहा था-''नेहरू जी हमने मजहब बदला है, पूर्वज नही बदले।'' आज के संदर्भ में जो लोग धर्मांतरण करते ही राम को किसी और का समझ लेते हैं या कृष्ण को किसी और का समझ लेते हैं उन्हें इस उत्तर से सबक लेना चाहिए। यह देश राम का देश है, कृष्ण का देश है-इसे पुण्यभू: और पितृभू: मानने वालों से हमारा कोई विरोध नही है। हम  पूजा पद्घति का विरोध नही करते, हम तो राष्ट्रद्रोही मानसिकता का विरोध करते हैं। देश में अमन के लिए यही आवश्यक है कि हर देशवासी इस भारतभूमि को अपनी पितृभू: और पुण्यभूमि स्वीकार करे।