कलम की तलवार से झुकता है निजाम

  • 2016-07-17 10:15:00.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य
कलम की तलवार से झुकता है निजाम

प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। भारत की आजादी के संघर्ष में प्रेस की उल्लेखनीय भूमिका रही है। इसने तत्कालीन सत्ता के असंवैधानिक, अनैतिक और बर्बर कार्यों की पोल खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिससे जनजागरण करने में सहायता मिली। कलम की तलवार के सामने तत्कालीन निजाम को झुकना पड़ा और अंत में हम एक आजाद देश के आजाद नागरिक कहलाये। हमारे ऐसे अनेकों क्रांतिकारी थे जिन्होंने अपने स्वयं के समाचार पत्र निकाले और वैचारिक क्रांति का हल चलाकर हमारे मन मस्तिष्क की भूमि को राजनीतिक क्रांति के लिए उर्वरा बनाया।

'स्वराज्य' नाम का एक ऐसा ही समाचार पत्र था जिसके एक नही कई संपादकों को जेल की हवा खानी पड़ी थी। केवल एक लेख लिखने पर ही 10 वर्ष की कठोर सजा हमारे कई संपादकों को केवल इसलिए भुगतनी पड़ी कि वे भारत की सनातन और स्वतंत्रता प्रेमी संस्कृति को लोगों के सामने परोस रहे थे। अंग्रेजी सत्ता जितना ही आजादी के दीवाने उन देशभक्त क्रांतिकारी संपादकों के लेखों को लेकर निर्दयी होती जाती थी हमारी स्वतंत्रता की बलिवेदी की अग्नि भी उतनी ही प्रचण्ड होती जाती थी।

अब प्रश्न है कि देशभक्ति का माहौल कलम कैसे बना सकती है? इसका सीधा सा उत्तर है कि व्यक्ति के अंतर्मन में आग तभी लगा करती है जब स्वबोध जागृत हो उठता है। लकड़ी में आग तो है पर आग के लिए लकड़ी में घर्षण की या मंथन की आवश्यकता है, घर्षण से या मंथन से पैदा होने वाली मचलन लकड़ी में आग लगा देती है जिससे लकड़ी प्रकाशपुंज बन जाती है और यही अग्नि राष्ट्र के संदर्भ में क्रांति बन जाया करती है। भक्त के हृदय में जब यह आग लगती है तो यह भक्ति बन जाती है और जब कोई देशभक्त मचलता है तो यही आगे उसके सीने में देशभक्ति बन जाया करती है। कलम निजता का बोध कराती है स्वदेश, स्वसंस्कृति, स्वभाषा, स्वराष्ट्र, स्वतंत्र, स्वराज्य आदि का वास्तविक बोध हमें कराती है और हम धीरे-धीरे 'स्व' बोध, आत्मबोध और राष्ट्रबोध से भर उठते हैं। ऐसे 'स्व' से भर उठना अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए परमावश्यक है। संसार में वही देश अपनी संस्कृति बचाने में सफल रहे हैं, जो स्वबोध से प्रेरित रहे हैं। आजादी के बाद इस देश में 'स्वबोध' की गहरी जड़ों पर शोध कार्य चलना चाहिए था, जिससे हम और भी अधिक अपने आपको जान पाते। हमारे क्रांतिकारी आंदोलन का एकमात्र उद्देश्य 'स्वबोध' पर शोध करना था और स्वतंत्रता प्राप्ति कर इस प्रक्रिया को शोध की उस पराकाष्ठा तक पहुंचाना था जहां ये विश्व बोध में परिवर्तित हो जाती और भारत विश्वगुरू बनकर सारे संसार का नायक बन जाता। पर हमसे चूक हो गयी और हमने स्वबोध को किसी विदेशी विचारधारा का पिछलग्गू बना दिया। उस पिछलग्गूपन की उन्मादी दौड़ में हम रास्ता भटक गये और अपने 'स्वबोध' के शोध को भूल गये। चारों ओर भौतिकवाद की चकाचौंध व्याप गयी और हमने देखा कि हमारा मीडिया भी चांदी की चमक में स्वधर्म से भटक गया। फिल्मी जगत ने, उद्योगपतियों ने, नेताओं ने, और माफिया जगत ने, दबंग लोगों ने कलमों का 'कलमा पढऩा' आरंभ कर दिया। बहुत सी कलमें बिकने लगीं रातों रात भारत के 'स्वबोध' के शोध को बंद करने के लिए फटाफट शटर गिराये जाने लगे। अपवादों को नमन करते हुए और उनका अभिनंदन करते हुए मैं यह कहना चाहूंगा कि ऐसी परिस्थितियों में हमारे महान पूर्वजों और क्रांतिकारी आंदोलन के अनेकों नायकों के सपनों पर तुषारापात होने लगा। फलस्वरूप पिछले 70 वर्ष में देश में विदेशी संस्कृति ने इतनी अधिक विनाशलीला मचाई है जितनी वह आजादी से पूर्व विदेशी शासकों के काल में भी नही मचा पायी थी। इस सांस्कृतिक हमले के कारण हम अपने त्यौहारों से, अपनी सामाजिक परंपराओं से, अपने इतिहास से, अपनी संस्कृति से अपने धर्म से मुंह फेरने लगे हैं, गीता, गंगा, गाय और गायत्री के उपासक इस देश में इन चारों के लिए ही प्राण संकट उपस्थित हो गया। मीडिया को चाहिए था कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को सहेजकर रखने के लिए वह अधिक से अधिक शालीन और गंभीर भूमिका का निर्वाह करती। अधिक से अधिक ऐसे प्रयास किये जाते कि हमारी युवा पीढ़ी अपने देश की संस्कृति से जुड़ती अपने राष्ट्रीय मूल्यों और परंपराओं को अपनाती और विश्व में उसकी प्रचारक प्रसारक बनकर विश्वशांति में सहायक होती।

ऐसी परिस्थितियों में हम देर से एक ऐसे पत्र की इच्छा लेकर चल रहे थे जो हमारे भीतर 'स्वबोध' कराये, स्वधर्म, संस्कृति, स्वराष्ट्र इत्यादि की अलख जगाये और हमारी युवा पीढ़ी को यह बताने में समर्थ हो कि :-

हम क्या थे क्या हो गये और क्या होंगे अभी

आओ मिल बैठकर विचारें ये समस्याएं सभी

हमारी मान्यता रही है :-

जिसमें न निज गौरव न निज देश का अभिमान है

वह नर नही पशु निरा है और मृतक समान है

इसलिए बातें निज गौरव और निज देश के अभिमान को जगाने की होनी चाहिए। 'उगता भारत' पिछले 6 वर्ष से अपने इसी मिशन में लगा है। आपके सहयोग, आशीर्वाद और प्रेम की पतवार को अपना सहारा बनाकर यह निरंतर आगे बढ़ रहा है। आर्थिक विषमताओं से जूझते हुए भी यह पत्र आगे बढ़ रहा है तो इसके लिए मैं अपनी टीम को और अपने साथियों को ही धन्यवाद कहूंगा। जिनके अथक और गंभीर प्रयासों से हम कदम दर कदम आगे बढ़ रहे हैं। इस दीपक की रक्षा करने में आपका प्रेम, सहयोग और आशीर्वाद हमें सदा मिलेगा ऐसी मैं अपेक्षा करता हूं।


साथ ही 'उगता भारत' के चेयरमैन के रूप में आपको इस बात के लिए वचन देता हूं कि आपके द्वारा दी गयी सहायता राशि का अन्यथा दुरूपयोग नही किया जाएगा। जय हिन्द, जय भारत।