युद्ध समस्या का समाधान नहीं

  • 2016-10-05 06:30:18.0
  • उगता भारत ब्यूरो

युद्ध समस्या का समाधान नहीं

स्वामी अग्निवेश
जम्मू-कश्मीर के उड़ी क्षेत्र में सेना के शिविर पर हुए आतंकी हमले का जवाब देने के लिए भारत ने कूटनीतिक प्रयास से पाकिस्तान को अलग-थलग तो कर ही दिया, सर्जिकल स्ट्राइक से वहां चल रहे छह आतंकी शिविरों के अड़तीस आतंकियों को भी मार गिराया। बांग्लादेश, भूटान, अफगानिस्तान के इस्लामाबाद जाने से इनकार करने पर पाकिस्तान में होने वाला सार्क सम्मेलन भी रद्द हो गया है। सिंधु जल समझौते पर हमारी सख्ती से पाक पहले ही सहमा हुआ था। राजस्थान सीमा पर सेना की बंदोबस्ती उसकी बौखलाहट को दर्शा रही है। पाकिस्तान की परमाणु हमले की धमकी को तवज्जो न देते हुए भारत ने आतंकियों के खिलाफ मोर्चा खोल कर अपना रुख जाहिर कर दिया है। सीमा से दस किलोमीटर तक की जगह खाली करने का निर्देश जवाबी हमले की दृष्टि से उठाया गया कदम प्रतीत हो रहा है। सर्वदलीय बैठक के बाद विपक्ष का सरकार का साथ देना, सेना को हाई अलर्ट करना, पश्चिमी कमान के साथ ही अस्पताल कर्मियों की छुट्टियां रद्द करना युद्ध के संकेत दे रहा है।
ऐसे में प्रश्न है कि क्या युद्ध एकमात्र विकल्प बचा है। क्या इससे आतंकवाद की समस्या दूर हो जाएगी? हमारी प्राथमिकता युद्ध नहीं, आतंकवाद को समाप्त करना है और इस मामले में पाकिस्तान हमसे ज्यादा त्रस्त है। कभी स्कूलों पर, तो कभी धार्मिक स्थलों पर और कभी भीड़भाड़ वाले स्थानों पर आतंकी हमले होना वहां पर आम बात है। यह भी सर्वविदित है कि पाक की जनता वहां की सरकार से ज्यादा सेना पर विश्वास करती है। ये सब झेलना पाक सरकार की मजबूरी है। ऐसे में जरूरत है कि आपस में उलझने के बजाय भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान संयुक्त कमान बना कर आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक जंग लड़ें। सार्क देशों को भी इसमें शामिल कर लिया जाए तो और बेहतर होगा। पाकिस्तान को यह समझना होगा कि भारत ने पाकिस्तान की सीमा में नहीं, बल्कि पीओके में कार्रवाई की, जो उसका है।

पाकिस्तान से युद्ध होने के बाद हमारे सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में भी सोचना होगा। यह युद्ध पाकिस्तान-भारत तक सीमित नहीं रहेगा। कई देश इस पर राजनीति करने को तैयार बैठे हैं। भले आज कई देश भारत के साथ खड़े दिख रहे हैं, पर युद्ध की स्थिति में यूरोपीय देशों के अलावा अरब देशों के पलटी मारने का अंदेशा है। क्या हमारी आतंरिक सुरक्षा इतनी सुदृढ़ है कि हम हर स्तर पर मामले को संभाल लेंगे। अगर है तो पठानकोट के बाद उड़ी में इतना बड़ा आतंकी हमला कैसे हो गया? हमारी खुफिया एजेंसियां क्या कर रही थीं? सेना ऐसे कैसे लापरवाह बनी रही कि आतंकियों ने हमले को इस तरह अंजाम दिया। कैसे वे बार-बार हमारी सीमा में घुस जाते हैं। वह भी तब जब क्षेत्र में हाई अलर्ट घोषित हो।

सवाल यह भी है कि शिविर में आग कैसे लगी, इसकी पुख्ता पुष्टि अभी तक नहीं हुई है। निश्चित रूप से सेना की जवाबी कार्रवाई सराहनीय है, पर सेना में भी भ्रष्टाचार की बातें सामने आती रही हैं। आज के हालात में हर पहलू पर गौर करने की जरूरत है। जरूरत इस बात की सबसे ज्यादा है कि आतंकवाद की जड़ें कहां तक फैली हैं? कौन इसका जन्मदाता है? पाकिस्तान और भारत के मनमुटाव का फायदा कौन उठा रहा है? इन दोनों देशों के झगड़े का फायदा किसे मिलेगा। दरअसल, अमेरिका ने अपने स्वार्थ के लिए आतंकवाद को जन्म दिया और इसकी आड़ में अपने हथियार बेचने लगा। इसमें दो राय नहीं कि पाकिस्तान में आतंकियों के जमावड़े के चलते हमारे देश में समय-समय पर आतंकी हमले हुए हैं। सेना और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी भी आतंकियों को बढ़ावा देती हैं, पर क्या पाकिस्तान की जनता इससे प्रभावित नहीं? वहां पर भी कभी मासूम बच्चे, तो कभी सेना के जवान और कभी आम नागरिक आतंकी हमले में मर रहे हैं।

कहना गलत न होगा कि हमारे देश से ज्यादा आतंकी हमले पाकिस्तानी अवाम झेल रहे हैं। तो ऐसे में पाक सरकार के साथ वहां के लोगों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए हमें आगे बढऩे की जरूरत है। कहीं पाकिस्तान से युद्ध के चक्कर में हम जनता की परेशानियों और जरूरतों को न भूल जाएं। पाक के लोग भी हमारे ही हैं। जब विभिन्न समस्याओं से जूझते-जूझते देश का किसान आत्महत्या कर रहा हो, मजदूर के पास काम न हो, महंगाई और भ्रष्टाचार चरम पर हो, ऐसे में राफेल लड़ाकू विमान की उनसठ हजार करोड़ रुपए की डील की सहमति क्या साबित कर रही है?
युद्ध असली रूप लेता है तो और अन्य सौदे भी होंगे। स्वाभाविक है कि हथियारों पर बड़ा बजट बनेगा। आज जरूरत इस बात को समझने की है कि खेलने-कूदने की उम्र में बच्चे कैसे आतंकवादी बन जा रहे हैं? कैसे मजबूरी का फायदा उठा कर आतंकी संगठन इन बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

दरअसल, आतंकी संगठन अपने नापाक मकसद के लिए गरीब, भटके नौजवानों को बरगला कर आतंकी दुनिया में धकेल रहे हैं। ऐसा नहीं कि यह खेल पाकिस्तान में ही चल रहा हो। हमारा देश भी इससे वंचित नहीं है। यहां पर भी इसी तरह बेरोजगारी, गरीबी और हालात का फायदा उठाते हुए युवाओं को गलत रास्ते पर ले जाया जा रहा है। बीच-बीच में काफी युवाओं के पाक की खुफिया एजेंसी आइएसआइ और कुख्यात आतंकी संगठन आइएस के संपर्क में होने की बातें सामने आती रहती हैं।

सोचने की जरूरत है कि आतंक से प्रभावित कौन हो रहा है? हर आतंकी हमले में या तो सैनिक मरते हैं या फिर निर्दोष जनता। परेशानी भी इन्हीं लोगों को होती है। आतंकी संगठनों के सरगना हों या फिर इस व्यवस्था को जन्म देने वाले राजनेता या फिर हमलों के जिम्मेदार लोग, उनका कुछ खास नहीं बिगड़ता। इस समय देश में उकसावे की प्रवृत्ति हावी है।युद्ध के मामले में बड़े स्तर पर मंथन की जरूरत है। चीन के साथ हुआ 1962 का युद्ध, 1965 में पाकिस्तान से हुआ युद्ध हो या फिर 1971 का या फिर करगिल का, इन युद्धों के जिम्मेदार लोगों का क्या बिगड़ा? कौन मरा, कौन प्रभावित हुआ? ताशकंद समझौते के तहत हमें पीछे हटने को मजबूत करने वाला कौन था।

करगिल में बंधक बनाए गए पाकिस्तानी सैनिकों को छुड़वाने वाला कौन था। कड़ा फैसला लेने से पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाले समर्थन पर भी सोचना होगा। मिलेगा तो किस हद तक।
बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान ने एक तरह से भारत को समर्थन दे दिया है। चीन ने पाकिस्तान में मोटा निवेश कर रखा है, तो उसका रुख पाकिस्तान के पक्ष में होना स्वभाविक है। हां, इन हालात में चीन युद्ध कभी नहीं चाहेगा। वह भी दोनों देशों से संवाद प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात कर रहा है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के खास बने हुए हैं, पर क्या अमेरिका भारत का हो सकता है? या कभी हुआ है? अक्सर देखा गया है कि अमेरिका पाक मामले में भारत के साथ राजनीति ही करता आया है। वह भारत को आतंकी हमले के प्रति सचेत भी करता है और पाकिस्तान को हथियार भी देता है। देखना यह भी होगा कि आतंकवाद से प्रभावित पाकिस्तान तो अपना सब कुछ खो चुका है, पर भारत के पास खोने के लिए बहुत कुछ है। युद्ध होने पर आतंकवादियों का ध्यान पाक पर न रह कर भारत की ओर हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र महासभा में जिस तरह नवाज शरीफ ने बुरहान को हीरो के रूप में पेश किया, वह आतंकियों को खुश करने का प्रयास था। जनता और आतंकियों का रुख भारत की ओर करने के लिए नवाज शरीफ खुद माहौल को गरमाने में लगे हैं।

हम लोग भले आतंकवादियों को मार कर वाहवाही लूटने का प्रयास करते हों, पर सोचने की बात है कि ये लोग तो आते ही मरने और मारने के लिए हैं। विचार करने की बात यह भी है कि इन लोगों को सैनिक शिविरों की आंतरिक जानकारी कैसे मिलती है? क्या सुरक्षा की दृष्टि से बनाए गए हमारे तंत्र भ्रष्टाचार के चलते लगातार कमजोर नहीं हो रहे हैं? सोशल मीडिया में भले युद्ध करने के लिए अभियान चला दिया गया हो, पर क्या आज के दौर में युवाओं का सेना से मोहभंग नहीं हो रहा है? कितने माता-पिता हैं, जो अपने बच्चों को देश के लिए मरने-मिटने के लिए प्रेरित करते हैं। कितने लोग हैं, जो युद्ध के बाद उत्पन्न होनी वाली परेशानियों से बिलबिलाएंगे नहीं। निश्चित रूप से हमारे सैनिकों की शहादत का बदला लिया जाए, पर ठंडे दिमाग से। युद्ध से पहले श्रीनगर और कश्मीर की स्थिति भी देखना जरूरी है जहां पर लंबे समय से कफ्र्यू चल रहा है और स्वाभाविक ही सेना और सरकार के प्रति वहां के लोगों में गुस्सा है। युद्ध के समय इनकी प्रतिक्रिया दिक्कत बढ़ाने वाली होगी।
इतिहास से सबक लेते हुए विश्व की उभरती दो शक्तियों- भारत और चीन को मिल कर यूरोप की राजनीति और कूटनीति को समझना होगा। यूरोप का पिछलग्गू होने के बजाय एशिया के देशों को एकजुट होना होगा। हमें समझना होगा कि अमेरिका के नाम का दबाव तो बना सकते हैं पर सबंंधों के मामले में वह न कभी भारत का हुआ है और न कभी होगा।