आतंकवादियों के पर कतरने का नही, पैर काटने का समय है

  • 2016-10-03 13:00:03.0
  • रज्जाक अहमद

आतंकवादियों के पर कतरने का नही, पैर काटने का समय है

कश्मीर में पिछले दिनों जो कुछ हुआ उससे धरती की यह जन्नत जल उठी। कफ्र्यू के लगभग ढाई माह के काल में अब तक 76 मौतें हो चुकी हैं। 1000 लोग घायल हुए हैं, इसके अलावा घायल सुरक्षाकर्मियों की संख्या भी सैकड़ों में है। राज्य सरकार परेशान है। मुख्यमंत्री ने पीएम मोदी से मदद मांगी है। केन्द्र सरकार ने सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल भेजकर कश्मीर समस्या को समझने व उसके स्थायी समाधान के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। परन्तु सरकार के इस कदम को हुर्रियत व अलगाववादियों के नेताओं के व्यवहार से जो निराशा मिली वह अफसोसजनक ही नही बेहद शर्मनाक भी है, उनकी इस हिमाकत से सरकार की ही नही पूरे देश की तौहीन हुई है। ऐसी परिस्थितियों में जरूरी हो गया है कि इन अलगाववादियों की इन हरकतों का जवाब उन्हें उनकी भाषा में ही दिया जाना जरूरी है। अब यह विषय राजनीति करने का नही रहा है। 
सब जानते हैं कि इस सारे मामले की कमान सीमा पार बैठे हमारे सबसे बड़े दुश्मन के हाथों में है। यह अलगाववादी व हुर्रियत नेता उसके एजेंट हैं। देश में आम आदमी को अब से पहले इनके बारे में अधिक जानकारी नही थी। यह अलगाववादी व हुर्रियत नेता जो आतंकवादी ही हैं, के विषय में बेहद दुखद बात ये है कि इन्हें अभी तक हमारी सरकारें ही पालती रही हैं। यह बात अब मीडिया के द्वारा सार्वजनिक हो रही है। 

भारत सरकार ने कुछ चुनिंदा अलगाववादी नेताओं पर पिछले पांच वर्षों में 356 करोड़ रूपया उनके घूमने, फिरने सुरक्षा व अन्य मद में खर्च किये। पिछले पांच वर्षों में ही 506 करोड़ रूपया इनकी सुरक्षा पर खर्च आया, 26.43 लाख रूपया यात्रा व ट्रांसपोर्ट हवाई जहाज का किराया आदि पर खर्च हुआ। 21 करोड़ रूपया इनके फाइव स्टार होटलों में ठहराने का खर्च हुआ। अठारह हजार पुलिस कर्मी इनकी सुरक्षा में लगे हैं। जिन पर तीन सौ करोड़ रूपया सालाना खर्चा आता है। इन्हें एक वर्ष में चार विदेशी दौरे करने की छूट है। जिनका खर्चा भी भारत सरकार देती है, अगर इन्हें वार्ता  के लिए दिल्ली बुलाया जाता है, तो भी इनका किराया, होटलों में ठहरने का खर्चा भारत सरकार देती है। इसके अलावा इनमें से कई सारे गद्दारों को जैड सुरक्षा मिली हुई है। इसके बावजूद कश्मीर को जलाने का काम ये अलगाववादी नेता ही करते हैं। बेहद शर्मनाक बात है कि देश का सौदा होता रहा और उसकी भनक तक भी किसी को नही लगने दी। देश की एकता और अखण्डता की बात करने वाले लोग ही देश का सौदा करते रहे इससे ज्यादा दुखद बात और क्या हो सकती है? 

कश्मीर के बुरे हालात में हमारी सरकार इन अलगाववादी नेताओं को पूरी सुविधाओं के साथ इनके घर पर ही नजरबंद कर देती है, जबकि उस समय इन्हें जेल में होना चाहिए। सवाल ये है कि इन्हें इतनी वीआईपी सुरक्षा किसलिए दी जा रही है? इन्हें खतरा किससे है? यह तो खुद पूरे देश के लिए खतरा हैं। यह भारत के संविधान का सम्मान नही करते, उसमें इनका विश्वास नही है। आये दिन राष्ट्रीय अस्मिता का अपमान करते हैं। इन्हीं गद्दारों की वजह से वर्ष में सैकड़ों जवान कश्मीर सीमा की रक्षा करते हुए शहीद होते हैं। शहीदों के रोते हुए परिवार व उनके बिलखते बीवी बच्चों की कल्पना करके देखो। उनके दर्द की कल्पना से आपकी चीख निकल पड़ेगी। आखिर यह कब तक चलेगा? 

इस फंड पर तुरंत रोक लगाया जाना जरूरी है। चंूकि इसका इस्तेमाल देश विरोधी गतिविधियों पर हो रहा है। जब ये अलगाववादी नेता हमारी सरकार के खर्चे पर विदेशी दौरे पर निकलते हैं तो जहाज में बैठते ही यह भारत के खिलाफ बयानबाजी करना व जहर उगलना शुरू कर देते हैं, तथा पाकिस्तान की तारीफ में कसीदे पढ़ते हैं। इस्लामी मुल्कों में जाकर भी यह भारत की बुराई करते हैं। जिससे इन्हें उन मुल्कों से अच्छी फंडिंग होती है। अब समय आ गया है कि सरकार इनके खिलाफ सख्त से सख्त कदम उठाये। 

हमें ध्यान रखना होगा कि इनके पूरे वर्ष का कलैंडर कब कहां क्या करना है, पाकिस्तान से तय होता है। इस सारे कार्यक्रम को आतंकवादी सरगना हाफिज सईद व लख्मी तय करते हैं। हमारे देश में इस कार्यक्रम पर अमल कराते हैं। अकेले अलगाववादी नेता यासीन मलिक पर दो दर्जन से अधिक मुकदमे हैं। जिनमें हत्या, आगजनी व देशद्रोह तक की संगीन  धाराएं हैं और भी ऐसे कई नेता हैं, फिर भी ना जाने कौन सी नीति के तहत सरकार इहें पालती रही हैं। यह सब कब से चल रहा है? इसकी जानकारी संसद तक को भी नही है। चूंकि इनके फंड का कोई ऑडिट नही होता। इनकी मदद से आतंकवादी ग्रामीण इलाकों में हाथों में हथियार लेकर खुले घूमते हैं। इन्होंने वहां के सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता व सरपंच आदि में इतनी दहशत पैदा कर दी है कि ना तो वो इनकी मुखालफत कर सकते हैं, ना इनके खिलाफ आवाज उठा सकते हैं। सरकार को चाहिए कि वह पुलिस व सुरक्षा बलों के आला अधिकारियों की मीटिंग एक साथ कराकर उन्हें इन आतंकियों के खिलाफ कठोर फैसला लेने की पूरी छूट दे। सुरक्षा बलों के बंधे हाथ खोल दिये जाएं। जल्द ही अच्छे नतीजे देखने को मिलेंगे। अलगाववादी नेता व अफजल प्रेमियों पर फास्ट टै्रक कोर्ट में देशद्रोह के मुकदमे चलाये जाएं। सबसे पहले इनके फंड समाप्त किये जाएं। इनके पासपोर्ट रद्द कर जब्त  किये जाएं। इनको दी जाने वाली सुरक्षा तुरंत  वापस ली जाए। इनको दी जाने वाली सभी सुविधाओं पर तुरंत रोक लगा दी जाए। इनके बैंक खातों की जांच करवाई जाए। इनसे ऐसा ही बर्ताव हो जैसा अपराधियों के साथ होता है। इन्हें बता दिया जाए कि अब से आगे तुम्हारी सुरक्षा हाफिज सईद व रहिल सरीफ करेंगे। पर फिर भी हमारा मानना है कि लोकतंत्र में बातचीत के रास्ते बंद नही होने चाहिए। सरकार को वहां के सामाजिक संगठनों से बात करनी चाहिए। उनके दिलों से इन आतंकवादियों का खौफ हटना चाहिए। शिक्षा के माहौल को फिर से बहाल करना होगा। नौजवानों का विश्वास लौटाना होगा। रोजगार के अवसर बढाऩे होंगे। गरीबी  भी कश्मीर समस्या का एक कारण है। यदि सरकार कठोर कार्यवाही करते हुए भी कश्मीर के आम आदमी का विश्वास जीतकर चलेगी तो इससे इन अलगाववादियों के हौसले पस्त होंगे। अब सरकार इनके पर कतरने की बात कर रही है। अच्छा हो कि सरकार को कानून के रास्ते इनके पैर काट देने चाहिए। सरकार अब इन सांपों को दूध पिलाना बंद करे। इनकी जगह फाइव स्टार होटल नही, जेल है। इस पर पूरा देश सरकार के साथ है। पूरा देश आतंकियों के खिलाफ सरकार की कठोर नीति का समर्थन कर रहा है और विषय में कोई राजनीति नही हो रही है, यह हम सबके लिए खुशी की बात है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)