मुंहतोड़ जवाब का इंतजार कर रहा है देश

  • 2016-09-27 07:30:51.0
  • कुलदीप नैयर
मुंहतोड़ जवाब का इंतजार कर रहा है देश

अभी हाल ही में उड़ी में जो घटना घटी है, वह रोग नहीं, बल्कि एक लक्षण मात्र है। मूल रोग तो वह युवा वर्ग है, जो एक आंदोलन को चलाकर खुद के लिए एक अलग देश बनाना चाहता है। ठीक उसी तरह से बलूचिस्तान भी पाकिस्तान के शिकंजे से मुक्त होकर खुद के लिए एक  अलग राष्ट्र के निर्माण का इच्छुक है। अगर वह अपने अभियान में सफल हो जाते हैं, तो निश्चित तौर पर एक और इस्लामिक देश अस्तित्व में आ जाएगा.

बलूचिस्तान उसी तरह से पाकिस्तान का एक अभिन्न अंग है, जैसे कश्मीर भारत का, लेकिन भारत में विलय के लिए महाराजा हरि सिंह द्वारा संधि पर हस्ताक्षर करने के 70 वर्ष बाद भी वह क्षेत्र उपद्रवियों का केंद्र बना हुआ है। हालांकि भारत के मामले में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने घाटी में हालात स्थिर होने के बाद जनमत संग्रह करवाने की बात कही थी। पंडित नेहरू अपने उस वादे को निभा नहीं पाए थे।

नेहरू इस बात को भांप गए थे कि चीजें महज 'गीता बनाम कुरान' सरीखे नारों तक सीमित होकर रह जाएंगी। लोगों का व्यवहार धार्मिक भावनाओं के आधार पर तय होगा, जिसमें वे अपने अधिकारों का सही ढंग से उपयोग नहीं कर पाएंगे। जब प्रतिष्ठित नेता शेख अब्दुल्ला भारतीय संघ में शामिल हो गए, तो उन्होंने यह तथ्य छिपा लिया कि घाटी के लोगों का अभी भी जनमत संग्रह में रुझान बना हुआ था, जिसके बिना विलय सफल नहीं हो सकता था। अभी हाल ही में उड़ी में जो घटना घटी है, वह रोग नहीं, बल्कि एक लक्षण मात्र है। मूल रोग तो वह युवा वर्ग है, जो एक आंदोलन को चलाकर खुद के लिए एक अलग देश बनाना चाहता है। ठीक उसी तरह से बलूचिस्तान भी पाकिस्तान के शिकंजे से मुक्त होकर खुद के लिए एक अलग राष्ट्र के निर्माण का इच्छुक है। अगर वह अपने अभियान में सफल हो जाते हैं, तो निश्चित तौर पर एक और इस्लामिक देश अस्तित्व में आ जाएगा। अभी हाल ही में मुझे एक संबोधन के लिए कश्मीरी विद्यार्थियों ने आमंत्रित किया था। इस दौरान मैंने उन्हें बताया कि जो ख्वाब उन्होंने अपने मन में पाल रखा है, लोकसभा उन पर सहमति के मूड में नहीं दिखती। उन्होंने कहा कि यह आपकी समस्या है कि आप यह बदलाव कैसे लाते हैं। इन युवाओं द्वारा एक अलग संप्रभु राष्ट्र की मांग उससे उलट है, जो कभी यासीन मलिक और शब्बीर शाह सरीखे लोगों ने कभी की थी। यह अलग बात है कि यासीन मलिक ने भी अब मौका पाकर बहती गंगा में हाथ धो लिए हैं।  अब घाटी के लोगों के लिए पाकिस्तान प्रासंगिक बन चुका है, क्योंकि उन्होंने भी अब  खुद की स्वराज्य की मांग को एक स्वतंत्र इस्लामिक देश के रूप में बदल दिया है। सीमा पर भारतीय सैनिकों पर किया गया हमला उनके गुस्से की पराकाष्ठा है। इस दौरान पाकिस्तान ने भी अपनी पंसद का माहौल देखकर घाटी में घुसपैठ की गतिविधियों को तेज कर दिया है। हालांकि यह पहली मर्तबा नहीं है कि पाकिस्तान ने भारत में घुसपैठिए भेजे हों और यह भी नहीं माना जा सकता कि यह उसका अंतिम प्रयास है।

पाक प्रायोजित आतंक की ऐसी घटनाओं का सिलसिला बहुत लंबा है, जिसमें भारतीय संसद, मुंबई और पठानकोट में हुए हमले प्रमुख हैं। इस तरह की हर घटना के बाद पूरे देश में बदला लेने के लिए युद्ध सरीखा विलाप सुनने को मिलता रहा है। उड़ी हमले के बाद तो सरकार पर इस बात को लेकर बहुत ज्यादा दबाव था कि जनता को इस तरह का पुख्ता विश्वास दिलाया जाता कि 'बदला लिया जाएगा और उसका समय व स्थान हम तय करेंगे।' जनता पाकिस्तानी करतूतों को लेकर अब जमीनी स्तर पर कार्रवाई चाहती है, भले ही उसकी कीमत जंग क्यों न हो। मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है कि संसद, मुंबई या फिर पठानकोट हमले के तुरंत बाद किस तरह की कार्रवाई हुई थी। उस समय प्रतिक्रिया के तौर पर हमने अपनी सैन्य टुकडिय़ों को कम से कम एक वर्ष या उससे थोड़े ज्यादा वक्त के लिए सीमा पर तैनात कर दिया। लेकिन इस बार आक्रोश काफी गहरा व व्यापक है। इसके बावजूद सरकार संयम बरतती हुई दिखी, जबकि नरेंद्र मोदी ने विश्वास दिलाया है कि इस कायराना हमले के दोषी किसी भी सूरत में बच नहीं सकते। आज जब दोनों ही देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं, तो हम उस सीमा को भी अच्छी तरह से जानते हैं, जहां तक दोनों देशों के शासक जा सकते हैं।
लेकिन यहां मैं एक बात को समझ नहीं पा रहा हूं कि जब भारत में हुए हमलों के दोषियों की शिनाख्त पाकिस्तानी नागरिकों के तौर पर होती रही है, तो फिर इस्लामाबाद कसूरवार लोगों के प्रति कार्रवाई से हिचकती क्यों रहा है? आज तक पाकिस्तान ने आतंकियों के खिलाफ जो भी कार्रवाई की है, वह भारत के आग्रह पर नहीं, बल्कि वाशिंगटन के आदेश पर की है। भारत में कुछेक युद्ध के इच्छुकों को छोड़ दें, तो बाकी सभी मानते हैं कि दोनों देशों में शांति बहाली का कोई विकल्प नहीं है। यह दोनों देशों के सियासतदानों को अपने कृत्यों का आत्म विश्लेषण करने के लिए भी सही वक्त है।भले ही वे आमने-सामने के किसी युद्ध की बात न भी करते हों, फिर भी उनके भाषण और देह भाषा मित्रता से कोसों दूर रही है। उनके आचार-व्यवहार में दोगलापन देखने को मिलता रहा है। आज तक दोनों ही तरफ की जनता इस युद्ध की भारी कीमत चुका चुकी है, तो फिर वे घृणा से लथपथ तीर क्यों छोड़ रहे हैं? फ्रांस और जर्मनी को भी करीब सौ वर्षों से भी लंबी लड़ाई झेलनी पड़ी थी। आज वे उन तमाम कड़वे अनुभवों को भुलाकर अच्छे मित्र बन चुके हैं। कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने मुझे यह उदाहरण विभाजन से पूर्व दिया था, जब मैंने उनसे पूछा था कि विभाजन के बाद जब अंग्रेज भारत छोडक़र चले जाएंगे, तो हिंदू-मस्लिम एक-दूसरे का गला काटने को दौड़ेंगे। उन्होंने मुझे बताया कि हम आपस में अच्छे मित्र की तरह रहेंगे। मुझे इस बात में रत्ती भी संदेह नहीं कि एक दिन ऐसा भी आएगा। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह भी कई बार इस बात का जिक्र कर चुके हैं कि नियति ने भारत और पाकिस्तान को साथ-साथ स्थापित किया है। ये दोनों भले ही अब तक अच्छे पड़ोसी नहीं बन पाए हों, फिर भी आने वाले समय में यह संभव है।

मैं उन लोगों की प्रशंसा करता हूं, जिन्होंने मुंबई हमले में मारे गए लोगों की याद में कराची में मोमबत्तियां जलाई थीं या लाहौर में जुलूस निकाला था, बेशक ये संख्या में बहुत कम थे। आज सही समय है कि भारत इसे समझने की कोशिश करे। इसके अलावा भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे रिश्तों के प्रति विश्वास कसौटी पर है। इसके साथ ही पाकिस्तान को भी उड़ी हमले के प्रति भारतीय जनता के आक्रोश को समझते हुए उसके प्रति सम्मान दिखाना होगा। जिन्होंने मुंबई या पठानकोट पर हमले को अंजाम दिया।

वे लोग संभवतय: अल कायदा या तालिबान से ताल्लुक रखते हैं और वे पाकिस्तान में भी खून का खेल खेल रहे हैं। ऐसे कुछ संगठन हैं, जो आतंकियों की मदद करते हैं, उन्हें प्रशिक्षण देते हैं और उन्हें असलह-बारूद थमाकर आतंक फैलाते हैं। आखिर पाकिस्तान की जमीन पर सक्रिय इन कट्टरपंथियों पर नकेल कसने के लिए वहां का कानून अपना काम क्यों नहीं कर रहा है? यहां तक कि भारतीय संसद पर हुए हमले के बाद कुछ आतंकियों की पहचान हुई थी, फिर भी वे पाकिस्तान में खुले घूम रहे हैं, घृणास्पद भाषण देते हैं और लोगों में जहर घोल रहे हैं। एनआईए उड़ी हमले की जांच कर रही है, जिसकी स्थापना मुंबई हमले के बाद जनता में पनपे आक्रोश को शांत करने के लिए हुई थी। 

मुख्य आतंकी हमलों की जांच उसके सुपुर्द की गई है, लेकिन इसका परिणाम संतोषजनक नहीं रहा है। देखते हैं कि उड़ी मामले की जांच में एनआईए कितनी सफल रहती है। देश दोषियों को मुंहतोड़ जवाब देने का इंतजार कर रहा है।