योग का वास्तविक रूप, भाग-2

  • 2016-12-30 13:30:42.0
  • उगता भारत ब्यूरो

योग का वास्तविक रूप, भाग-2

गतांक से आगे ...
हमने प्रथम भाग में सत्य बोलने के फल को जाना अब अहिंसा के विषय में जानते हैं। यदि हम दया करते हैं मन, वचन व कर्म से तो परिपक्व अवस्था में अर्थात् अहिंसा के सिद्ध हो जाने पर भयंकर प्राणी भी हमारे सामने नत मस्तक हो जाया करते हैं। एक बार माता गार्गी बहुत कम अवस्था में अपने गुरुकुल से भयंकर वनों में चली आयीं। उनके गुरु ने जब देख लिया कि गार्गी गुरुकुल में नहीं हैं तो वे उनको ढूंढने के लिए वन में आ गए। उन्होंने देखा कि गार्गी एक पेड़ के नीचे सामवेद के मंत्रों को जटा पाठ, घन पाठ व माला पाठ आदि विधियों से गा रही हैं तथा भयंकर हिंसक जीव जन्तु व विषधर सर्प उनके गायन को सुनने के लिए उनके समीप पंक्ति बद्ध हैं। तब ॠषि ने विचारा कि कितनी महान बलिष्ठ आत्मा है। यह है इस योग की महिमा।
महर्षि लोमश मुनि जब भी कदली वनों से होकर गुजरते थे, वनराज सिंह उनके चरणों में नतमस्तिष्क हुआ करता था। उनकी अहिंसा सिद्ध थी। अस्तेय का अर्थ है चोरी त्याग। मन, वचन व कर्म से ही हर प्रकार की चोरी त्याग देना ही अस्तेय है। महर्षि पतंजलि जी के योगदर्शन के अनुसार -
अस्तेय प्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम
॥ योगदर्शन।साधनपाद। 37॥
अर्थात् अस्तेय भाव के चित्त में पूरी तरह से प्रतिष्ठित हो जाने पर योगी को समस्त उत्तम पदार्थों की प्राप्ति होने लगती है ।
ब्रह्मचर्य का अर्थ है जो ब्रह्म के तुल्य आचार विचार व्यवहार वाला अर्थात् पूर्ण सदाचारी हो तथा उपस्थेन्द्रिय पर संयम रखने वाला हो। जो व्यक्ति कण-कण में प्रभु का व ओ3म् शब्द का स्मरण करने वाला हो वह ब्रह्मचारी कहलाता है। जब स्त्री व पुरुष का लिंगात्मक बोध भेद तिरोहित सा हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा पूरी तरह हो गई है। इसी प्रकार अपरिग्रह का अर्थ है स्वत्वाभिमान व अत्यंत लोलुपता का त्याग।
शौच - सत्य से मन तथा जल मृत्तिकादि से शरीर के अवयवों को शुद्ध रखना।
संतोष - धार्मिक आचार व्यवहार से जो कुछ भी प्राप्त हो जाए उसी में संतुष्ट रहना।
तप- कष्टों को सह कर भी जिस शुभ कार्य को कर रहे हैं उसे पूर्ण किये बिना न छोडऩा तथा इन्द्रियादियों पर संयम रखना तप कहलाता है।
ईश्वर प्रणिधान - हर समय ओ3म् इस परमात्मा के नाम का स्मरण करना, जप करना तथा हर स्थल पर परमात्मा का भाव रखना।
स्वाध्याय - अपनी अच्छाइयों व बुराइयों को विचारना व बुराइयों को छोड़ देना तथा आर्ष ग्रंथों का अध्ययन तथा सत्गुरु के शब्दों को विचारना। यह सब स्वाध्याय है।
आसन- इस विषय में महर्षि पतंजलि जी ने योगदर्शन में कहा है स्थिर सुखमासनम ॥ साधनपाद। 46॥
साधक को धारणा-ध्यान आदि के लिये लम्बी अध्यात्म यात्रा पर निकलना होता है इसके लिए किसी भी आसन में लम्बी अवधि तक बैठने का अभ्यास किया जाता है -
शरीर की जो स्थिति स्थिरता व सुखमयता से युक्त हो वह आसन कहलाती है।
कुछ मुख्य आसन इस प्रकार हैं -
पद्मासन, वज्रासन, शवासन, भुजंगासन, सर्वांगासन, हलासन, पश्चिमोत्तासन व चक्रासन आदि आदि। -ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

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