ईश्वर न होता तो क्या यह संसार होता?

  • 2016-12-09 08:00:57.0
  • मनमोहन सिंह आर्य

ईश्वर न होता तो क्या यह संसार होता?

हमारे इस संसार में जन्म लेने से पूर्व से ही यह संसार प्राय: इसी प्रकार व्यवस्थित रुप से चल रहा है। हमसे पूर्व हमारे माता-पिता, उससे पूर्व उनके माता-पिता और यही परम्परा सृष्टि के आरम्भ से चली आ रही है। इस परम्परा का आरम्भ कब व कैसे हुआ? इसका उत्तर है कि यह परम्परा इस सृष्टि के निर्माण के बाद मनुष्य व प्राणियों सहित सभी वनस्पतियों के लिए उपयुक्त वातावरण के बन जाने के बाद आरम्भ हुई। यह सृष्टि कैसे बनी तो इसका उत्तर है कि यह सृष्टि एक अपौरुषेय, मनुष्यों से भिन्न एक चेतन व विचारशील सत्ता जो सर्वव्यापक व सर्वशक्तिमान होने के साथ अल्पज्ञ न होकर सर्वज्ञ हैे और जिसे सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति व इसके संचालन सहित प्रलय करने का ज्ञान हो, उस सत्ता के द्वारा सुदूर अतीत में बनी है। संसार मे हम चेतन व जड़ दो प्रकार के पदार्थ देखते हैं। मनुष्य शरीर में उसकी आत्मा चेतन है तथा शरीर जड़ पदार्थ है। शरीर को अन्नमय कहा जाता है जो कि खेतों में कृषि कार्य करने पर उत्पन्न अन्न से बना होता है। भूमि वा खेत जड़ अर्थात् चेतना से शून्य होने के कारण ही जड़ कहाते हैं। जड़ पदार्थों को किसी भी प्रकार सुख व दु:ख की अनुभूति नहीं होती। इन जड़ पदार्थों का सूक्ष्मतम रूप प्रकृति कहलाती है जिसे भारत के प्राचीन मनीषी वा ऋषियों ने त्रिगुणात्मक अर्थात् सत्व, रज व तमों गुण वाली सत्ता बताया है। जिस प्रकार वैज्ञानिक खोज करके कोई घोषणा करता है, उसी प्रकार हमारे प्राचीन मनीषी ऋषियों ने सृष्टि व वेद आदि का सूक्ष्म व गम्भीर अध्ययन कर व सृष्टि के सबसे सूक्ष्मतम पदार्थ ईश्वर व जीवात्मा को जानकर इस रहस्य को समझा कि कार्य सृष्टि का कारण सूक्ष्मतम् त्रिगुणात्मक प्रकृति है। इसी से सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान एवं सच्चिदानन्दस्वरूप ईश्वर सृष्टि बनाता है। ईश्वर अनादि, अजन्मा व नित्य होने से उसका ज्ञान भी अनादि व नित्य होता है जो न तो वृद्धि को ही प्राप्त होता है और न हि ह्रास को। वह ज्ञान सदा एक समान, वृद्धि व ह्रास से रहित रहता है। यह जैसा खरबों वर्ष व उससे पूर्व था वैसा ही आज है और भविष्य मेंऐसा ही रहेगा। मनुष्य को इस पूरे रहस्य को जानने के लिए किसी योग्यतम वेदाचार्य से वेद, दर्शन व उपनिषदों आदि के अध्ययन सहित सफल व समाधि सिद्ध योगी बनना होगा, तभी वह सृष्टि को साक्षात् व यथार्थ रूप में जान सकता है।


हम उपर्युक्त पंक्तियों में सृष्टि का आरम्भ कैसे हुआ, इस प्रश्न पर विचार किया है। कब हुआ का उत्तर यह है कि यह अति प्राचीनतम है। यदि वर्षों में इसकी अवधि जाननी हो तो यह आर्य पंचांग के अनुसार आज से एक अरब छियानवें करोड़ आठ लाख त्रेपन हजार एक सौ सोलह वर्ष पूर्व उत्पन्न हुई थी। यह ध्यातव्य है कि सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ने चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को उत्पन्न किया था जो एक एक वेद के ज्ञान से सम्पन्न थे। इन्हें पल, क्षण, घंटे, दिन, रात्रि, सप्ताह, माह व वर्ष आदि का पूर्ण ज्ञान था। यह कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष सहित बारह महीनों व वर्ष का ज्ञान भी रखते थे। अत: इन्होंने प्रथम दिवस से ही वेद वा आर्य पंचांगानुसार काल गणना करना आरम्भ कर दिया था जो उत्तरोत्तर चलता रहा और अब भी चल रहा है। इसके अनुसार ही सृष्टि का आरम्भ होने से अब तक व्यतीत हुए दिनों, महीनों व वर्षों की गणना सम्भव होती है। इसके अतिरिक्त अन्य साधनों से सृष्टि की वर्तमान वय का ठीक ठीक अनुमान लगाना सम्भव नहीं है। विज्ञान ने जो अपनी पद्धतियां कार्बन डेटिंग आदि को विकसित की हंै, उसके अनुसार भी काल गणना लगभग इतनी ही सिद्ध होती है। अत: इस सृष्टिकाल को स्वीकार करना ही चाहिये क्योंकि इसमें त्रुटि होने का प्रश्न ही नहीं है।

यह भी जान लें कि सृष्टि की कुल आयु 4.32 अरब वर्ष होती है। शेष अवधि तक इस सृष्टि को चलना है। इसके लिए हमें वायु व जल सहित पृथिवी, वनों व अपनी कृषि की भूमि को उपजाऊ रखना होगा। यदि विकास आदि के कारण यह सन्तुलित व स्वच्छ नहीं रहेंगे तो सृष्टि से प्राणी जगत सहित वनस्पति जगत की सृष्टि के शेष काल के लिए समाप्ति भी हो सकती है। विश्व के सभी विकसित व विकासशील देश इससे चिन्तित हैं और इसका मार्ग ढूंढ रहे हैं, यह सन्तोष की बात है।

वेद और वैदिक साहित्य का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि संसार में ईश्वर, जीव व प्रकृति तीन नित्य पदार्थों का सदा से अस्तित्व है। ईश्वर व जीव चेतन तत्व हैं तथा प्रकृति जड़ हैं। यह तीनों ही सूक्ष्म पदार्थ हैं जिनमें ईश्वर सर्वातिसूक्ष्म है। इसके बाद जीवात्मा एकदेशी, अणुरूप व संख्या में असंख्य हैं जिनमें ईश्वर समाविष्ट व सर्वान्तर्यामी रूप से व्यापक है। प्रकृति भी सूक्ष्म है परन्तु ईश्वर व जीवात्मा, प्रकृति से भी सूक्ष्म होने के कारण, प्रकृति में प्रवेश कर सकते हैं। इसी कारण ईश्वर सर्वव्यापक है। ईश्वर सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान होने के कारण सनातन जीवों के लिए सृष्टि को बनाता है और उनके पूर्व जन्मों के कर्मों के फलों को देने के लिए उनको कर्मानुसार नाना प्रकार के शरीर देता है।