ओ३म् : योग का वास्तविक रूप - भाग 1

  • 2016-12-11 11:00:52.0
  • उगता भारत ब्यूरो

ओ३म् : योग का वास्तविक रूप - भाग 1

लेखक-ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा
भाइयों बहनों! वैसे तो सभी लोग योग शब्द से परिचित हैं। पुरातन काल से अब तक ॠषि मुनियों व साधु संतों ने, महर्षि पतंजलि के योगदर्शन से लेकर घरंड संहिता में समझाए हठ योग के तत्वों तक व आधुनिक रूप से विदेशों में प्रचलित योग के अनेक रूपों तक अलग अलग विधि से योग को समझाया है। परन्तु योग वास्तव में क्या है इसको मैं अपने शब्दों में लिख रहा हूँ।
योग अर्थात् जुड़ाव, मिलान या जमा। योग वह निधि है जिसको पाकर मानव मात्र शारीरिक, आत्मिक बल से परिपूर्ण, प्रसन्न वदन, शांत चित्त, संतुष्ट व शोभनीय बन जाए ।
योग अर्थात् परमात्मा से मेल, ऐश्वर्य से मेल, शारीरिक / आत्मिक बलों से मेल, समाज से मेल तथा सदाचार व समस्त शुभ गुणों से मेल।
योग के नाम पर आजकल उछलकूद, हठ योग, ध्यान मात्र आदि पद्धतियाँ प्रचलित हैं परंतु पूर्ण योग की स्थिति में तो धन, ऐश्वर्य, सुबुद्धि, ज्ञान व विज्ञान आदि सब ही कुछ प्राप्त हो जाता है अत: इन पद्धतियों में अपूर्णता है। यदि पूर्ण योग की स्थिति को जानना है तो हमें समाधि स्थिति तक पहुंच कर परमात्मा के दर्शन करने होंगे। कहा भी है -
परमात्मा को समाधिस्थ बुद्धि से जाना जाता है-महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती
पूर्ण योग की स्थिति को समझने के लिए पहले महर्षि पतंजलि द्वारा बताए योग के आठ अंगों पर निगाह डाल लेवें-
1- यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य)
2- नियम (शौच, संतोष, तप, ईश्वर प्रणिधान, स्वाध्याय)
3- आसान
4- प्राणायाम
5- प्रत्याहार
6- धारणा
7- ध्यान
8- समाधि
यदि यम में से सत्य पर ध्यान दें तो हमें पता चलता है कि सत्य मानना, बोलना व सत्य करना भी योग में प्रवेश करने का एक सोपान है। यदि सत्य बोलें व मानें तो धीरे धीरे हम उस स्थिति तक पहुंच जाते हैं कि हमारी वाणी भी सत्य सिद्ध होने लगती है अमोघ हो जाती है।

महर्षि श्रृंगि जी ने 84 वर्ष तक सत्य बोलने का अभ्यास किया था व महर्षि अत्रि मुनि जी ने 120 वर्ष तक। महर्षि श्रृंगि जी की वाणी अमोघ थी वह जिसको कह देते थे कि जा मृत्यु को प्राप्त हो जा तो उसे मृत्यु को प्राप्त हो जाना पड़ता था। महर्षि अत्रि मुनि जी महाराज यदि उड़ते पक्षी से कह देते थे कि यहाँ आओ तो उसको उनके निकट आना ही प?ता था।
यह होता है सत्य का प्रभाव। वेद में परमात्मा स्वत: कहते हैं -
मैं सत्यवादी को सत्य सनातन ज्ञान को देता हूँ। मैं सत्पुरुष का प्रेरक यज्ञ करने वाले को फल प्रदाता व इस संसार में जो कुछ भी है उसका बनाने व धारण करने वाला हूँ। मेरे स्थान पर मेरे सिवा और किसी को मत मानो मत जानो मत पूजो।
जब हम सत्य बोलना प्रारंभ करते हैं तो प्रारंभ में तो कष्ट होता है परन्तु धीरे धीरे वाणी अमोघ हो जाती है व सत्य बोलना सुख दायक हो जाता है।
(क्रमश:)

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