दाम्पत्य जीवन को मधुरतम बनाने का संकल्प लेने का दिन श्रीराम विवाह पंचमी

  • 2016-12-07 06:30:32.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

दाम्पत्य जीवन को मधुरतम बनाने का संकल्प लेने का दिन श्रीराम विवाह पंचमी

भारतीय संस्कृति में श्रीराम.सीता आदर्श दंपति के रूप में सर्वस्वीकार्य हैं। श्रीराम ने जहाँ मर्यादा का पालन करके आदर्श पति और पुरुषोत्तम पद प्राप्त किया वहीं माता सीता ने सारे संसार के समक्ष अपने पतिव्रता धर्म के पालन का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करके संसार में लोकख्याति प्राप्त की । पौराणिक मान्यता के अनुसार मार्गशीर्ष अर्थात अगहन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को भगवान श्रीराम तथा जनकपुत्री जानकी सीता का विवाह हुआ था। इसी कारण मार्गशीर्ष अर्थात अगहन मास की शुक्ल पक्ष की इस पंचमी को विवाह पंचमी कहा जाता है और सदियों से इस तिथि को विवाह पंचमी पर्व के रूप में मनाये जाने की परम्परा कायम है। तथा इस दिन भारत में विभिन्न स्थानों पर विवाह पंचमी का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं में राम और सीता की महत्ता को देखते हुए इनके सम्मान में ही विवाह पंचमी का शुभ मांगलिक त्योहार मनाया जाता है।बिहार में इसे विहार पंचमी के नाम से भी जाना जाता है । श्रीराम विवाह पंचमी अर्थात मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी बांकेबिहारी के प्रकट होने की तिथि भी है। रामायण के अनुसार त्रेता युग में सीता.राम का विवाह इसी दिन हुआ माना जाता है। मिथिलाचंल और अयोध्या तथा भारत में यह तिथि विवाह पंचमी के नाम से प्रसिद्ध है। रामायण व पुराण आदि ग्रन्थों के अनुसार राम विवाह के दिन ही राम सहित चारो भाई का विवाह हुआ था, और राम विवाह का दिन मार्गशीर्ष अर्थात अगहन माहए शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन ही सम्पन्न हुआ था । पौराणिक ग्रन्थ भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं किमार्गशीर्ष अर्थात अगहन माहए शुक्ल पक्ष की पंचमी की इस तिथि को भगवान राम ने जनक नंदिनी सीता से विवाह किया था। जिसका वर्णन श्रीरामचरितमानस में महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने बड़ी ही सुंदरता से किया है। तुलसीदास ने रामचरित मानस में कहा है श्रीराम ने विवाह द्वारा मन के तीनों विकारों कामए क्रोध और लोभ से उत्पन्न समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया गया है।मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम.सीता के शुभ विवाह के कारण ही विवाह पंचमी का दिन अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस पावन दिन सभी दंपतियों को श्रीराम.सीता से प्रेरणा लेकर अपने दांपत्य को मधुरतम बनाने का संकल्प करना चाहिए।


पौराणिक मान्यतानुसार राम एवम सीता भगवान विष्णु एवम लक्ष्मी माता के रूप थे जिन्होंने पृथ्वी लोक पर राजा दशरथ के पुत्र एवम राजा जनक की पुत्री के रूप में जन्म लिया था। वैसे पुराणों व वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार जब राजा जनक यज्ञ की भूमि तैयार करने के लिए हल से भूमि जोत रहे थे उसी समय उन्हें भूमि से एक कन्या प्राप्त हुई। जोती हुई भूमि को तथा हल की नोंक को सीता कहते हैं। इसलिए इस बालिका का नाम सीता रखा गया।वाल्मीकि रामायण के एक प्रसंग के अनुसार एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से कहीं जा रहा थाए तभी उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी उसका नाम वेदवती था। वह भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। रावण ने उसके बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा। उस तपस्विनी ने रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी इतना कहकर वह अग्नि में समा गई। उसी स्त्री ने दूसरे जन्म में सीता के रूप में जन्म लिया। रामायण की कथानुसार त्रेता युग में मिथिला नरेश जनक के राज्य में जब अकाल पड़ा तो उसके निवारण के लिए जनक ऋ षि.मुनियों के पास गए। उनके सुझाव पर जनक ने भूमि को जोतना शुरू किया। हल जोतते हुए हल का अग्र भाग किसी वस्तु से टकराया और वहीं रुक गया। जब जनक ने मिट्टी हटाकर देखा तो उन्हें एक कन्या मिली। राजा ने उसे अपनी पुत्री स्वीकार किया। नाम रखा सीता जिन्हें वैदेही और जानकी भी कहा गया। राजा जनक शिवधनुष की पूजा करते थे। सीता के कुछ बड़ी होने पर एक दिन उन्होंने देखा कि जानकी ने शिव के धनुष को हाथ में उठा लिया है। राजा जनक ने प्रतिज्ञा की कि जो शिवधनुष तोड़ेगा जानकी का विवाह उसी के साथ होगा। सीता के स्वयंवर में जब कोई धनुष को उठा भी नहीं पाया तब श्रीराम ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया और वह टूट गया। इस तरह राम और सीता का विवाह हुआ। श्रीरामचरितमानस के अनुसार महाराजा जनक ने सीता के विवाह हेतु स्वयंवर रचाया। सीता के स्वयंवर में आए सभी राजा.महाराजाओं के द्वारा भगवान शिव का धनुष नहीं उठाये जा सकने के कारण ऋ षि विश्वामित्र ने प्रभु श्रीराम से आज्ञा देते हुए कहा हे राम! उठो शिवजी का धनुष तोड़ो और जनक का संताप मिटाओ। गुरु विश्वामित्र के वचन सुनकर श्रीराम तत्पर उठे और धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए आगे बढ़ें। यह दृश्य देखकर सीता के मन में उल्लास छा गया। प्रभु की ओर देखकर सीताजी ने मन ही मन निश्चय किया कि यह शरीर इन्हीं का होकर रहेगा या तो रहेगा ही नहीं। सीता के मन की बात प्रभु श्रीराम जान गए और उन्होंने देखते ही देखते भगवान शिव का महान धनुष उठाया। इसके बाद उस पर प्रत्यंचा चढ़ाते ही एक भयंकर ध्वनि के साथ धनुष टूट गया। यह देखकर सीता के मन को संतोष हुआ। फि र सीता श्रीराम के निकट आईं। सखियों के बीच में जनक पुत्री सीता ऐसी शोभित हो रही थी जैसे बहुत.सी छवियों के बीच में महाछवि हो। तब एक सखी ने सीता से जयमाला पहनाने को कहा। उस समय उनके हाथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो डंडियों सहित दो.दो कमल चंद्रमा को डरते हुए जयमाला दे रहे हो। सखी के कहने पर सीता ने श्रीराम के गले में जयमाला पहना दी। यह दृश्य देखकर देवता फू ल बरसाने लगे। नगर और आकाश में बाजे बजने लगे। श्रीराम.सीता की जोड़ी इस प्रकार सुशोभित हो रही थी मानो सुंदरता और श्रृंगार रस एकत्र हो गए हो। पृथ्वी पाताल और स्वर्ग में यश फैल गया कि श्रीराम ने धनुष तोड़ दिया और सीताजी का वरण कर लिया। इसी के मद्देनजर प्रतिवर्ष अगहन मास की शुक्ल पंचमी को प्रमुख राम मंदिरों में विशेष उत्सव मनाया जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम.सीता के शुभ विवाह के कारण ही यह दिन अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस पावनदिन सभी को राम.सीता की आराधना करते हुए अपने सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए प्रभु से आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।
भगवान श्रीराम और सीता का विवाह पूरे रामायण की सबसे महत्वपूर्ण घटना है क्योंकि प्रकृति के नियंता को ज्ञात था कि जीवन में चौदह वर्ष का वनवास और रावण जैसे असुर का वध धैर्य के वरण के बगैर संभव नहीं है। अत: श्रीराम जानकी का विवाह मुख्य रूप से यह एक बड़े संघर्ष से पूर्व धैर्य वरण की घटना है।

पुष्प वाटिका में भगवान श्री राम और सीता जी के मिलन के पश्चात प्रकृति ने दोनों के ही मिलन का मार्ग तय कर लिया था। तुलसी रामयण में भी सीता जी को विवाह के समय युवावस्था का बताया गया है भगवान श्रीराम और सीता जी का विवाह रामायण में रावण के अंत के लिये भगवान का बढ़ाया हुआ एक पग भी है क्योंकि रावण के अंत का सृजन सीता जी के हरण की घटना से ही प्रारम्भ हो गया था। शास्त्रों के अनुसार यह वही दिन है जिस दिन भगवान श्रीराम ने सीता जी का वरण किया था। श्रीरामचरितमानस में श्रीराम के द्वारा सीता के माथे में सिन्दूर भरने की घटना को तुलसीदास ने वर्णन करते हुए कहा है कि ऐसा प्रतीत होता है मानो भगवान श्रीराम के बाहु कमल स्वरूप हथेलियों में पराग सदृश्य सिन्दूर लेकर अमृत की आस से सीता जी के चंद्र मुख को अलंकृत कर रहा है। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीराम का विधिवत पूजन और सांकेतिक रूप से या उत्सव के रूप में भगवान का विवाह सीता जी से कराया जाये तो जीवन में सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।
मान्यता यह भी है वैसे युवक.युवतियां जिनके विवाह में विलम्ब हो रहा है या वैसे विवाहित दम्पति जिनके वैवाहिक जीवन में संतान या परिवार से सम्बंधित कोई भी समस्या है वे विवाह पंचमी के दिन श्रीराम और सीता का पूजन करके श्रीराम रक्षा स्त्रोत्र का पाठ करें तो उन्हें अवश्य लाभ प्राप्त होगा। विद्वान कहते हैं विवाह पंचमी पर भगवान राम और सीता का विवाह हुआ था। विवाह केवल स्त्री और पुरुष के गृहस्थ जीवन में प्रवेश का ही प्रसंग नहीं है बल्कि यह जीवन को संपूर्णता देने का अवसर है। श्रीराम के विवाह के माध्यम से हम विवाह की महत्ता और उसके गहन अर्थों से परिचित हो सकते हैं। विवाह ऐसा संस्कार है जिसे प्रभु श्रीराम और कृष्ण ने भी अपनाया। भगवान राम ने अहंकार के प्रतीक धनुष को तोड़ा। यह इस बात का प्रतीक है कि जब दो लोग एक बंधन में बंधते हैं तो सबसे पहले उन्हें अहंकार को तोडऩा चाहिए और फिर प्रेम रूपी बंधन में बंधना चाहिए। यह प्रसंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों परिवारों और पति.पत्नी के बीच कभी अहंकार नहीं टकराना चाहिए क्योंकि अहंकार ही आपसी मनमुटाव का कारण बनता है।

श्रीराम जानकी का विवाह हिंदू धर्म में विशेष महत्व का दिन होने के कारण यह एक शुभ तिथि है और इस दिन अनेक धार्मिक आयोजन होते हैं। फि र भी हैरतनाक बात यह है कि कुछ स्थानों पर लोग इस दिन विवाह नहीं करते। विशेषत: मिथिला के लोग विवाह पंचमी के दिन अपनी बेटियों की शादी विवाह पंचमी के दिन नहीं करते। इसके पीछे यह मान्यता है कि भगवान श्रीराम और सीताजी के विवाह के बाद उन्हें वनवास हुआ और अनेक कष्ट सहन करने पड़े। सीताजी का हरण हुआ और इसके पश्चात हुए युद्ध में अनेक लोग मारे गए। स्वयं श्रीराम के भाई लक्ष्मण भी शक्तिबाण लगने से मूच्र्छित हो गए थे। युद्ध के पश्चात वे अयोध्या आए लेकिन सीता को एक बार फि र वनवास जाना पड़ा। इसलिए मिथिला सहित देश के विभिन्न स्थानों पर लोग विवाह पंचमी को अपनी कन्याओं की शादी नहीं करना चाहते। संभवत: उनके मन में सीता के कष्टों जैसी आशंका होती है। चूँकि सीता का संपूर्ण जीवन कष्टों से भरा था इसलिए इन स्थानों पर लोग रामचरित मानस का पाठ भी श्रीराम.जानकी विवाह तक ही करते हैं और वहीं से पाठ का समापन कर देते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि आगे सीताजी को कष्टों का सामना करना पड़ा अत: राम.जानकी विवाह जैसे शुभ प्रसंग के साथ ही पाठ संपूर्ण कर दिया जाता है। भृगु संहिता में विवाह पंचमी के दिन को विवाह के लिए अबूझ मुहूर्त के रूप में बताया गया है। इसके बावजूद लोग इस दिन अपनी बेटियों की शादी करना पसंद नहीं करते। इसके पीछे उनकी धारणा यह है कि इस दिन विवाह होने से की वजह से ही देवी सीता और भगवान राम को वैवाहिक जीवन का पूर्ण सुख नहीं मिला था। भगवान श्रीराम और माता जानकी का विवाह ब्राह्म विवाह कहलाता है। ऐसा कहा जाता है कि जानकी जी श्रीराम से 9 साल छोटी थीं। उन्होंने हमेशा राम का अनुसरण किया और उनसे कदम से कदम मिला कर चलीं। हमारी मर्यादा और शास्त्रों में श्रीराम और जानकी की जोड़ी को आदर्श माना गया है। लोग वर.वधू को आशीर्वाद देते समय यही कहते हैं कि सीता.राम के समान एक रह्वहो।