धर्म

  • 2016-12-27 05:00:39.0
  • विजेंदर सिंह आर्य

धर्म

इंसान को बाड़ों में बांटकर,
धर्म पर गरूर करते हो।
धर्म तो सबको जोड़ता है,
मगर तुम तो एक दूसरे से दूर करते हो।।

धर्म का जो नाम लेकर,
कर रहे हैं क्रूरता।
ये विक्षिप्तता और बुझदिली है,
कौन कहता शूरता? ।। 1 ।।

कमजोर बशर के प्राण लेना,
ये कहां का शबाब है?
धर्म तो स्रष्टा का स्वरूप है,
और बड़ा ही नायाब है।।

ये कैसा धर्म है?
जो बढ़ाये हिंसा और फसाद को।
जो छीनता है हर्ष को,
और बांटता विषाद को ।। 2 ।।

बेगुनाहों के लबों से,
मुस्कान जो है छीनता।
हाय यही धर्म है तो
क्या होगी हृदयहीनता?

दंगों के भूकंपों को,
जो खुला निमंत्रण देता है।
ये धर्म नही दावानल है,
क्षण भर में विनाश कर देता है ।। 3 ।।

खण्डित करता एकता को,
रोके राष्ट्र के विकास को।
अरे! यह कैसा धर्म?
जो प्रेम और विश्वास को।।

तुम कहते हो धर्म इसे,
यह तो तबाही का तूफान है।
लगता सोयी हुई सुनामी है,
जिसमें बेपनाह उफान है ।। 4 ।।

है आश्चर्य की बात सखे
संप्रदाय धर्म कहलाता है।
सत्यं वद और धर्म चर,
यह वेद हमें बतलाता है।।
करूणा सत्य प्रेम से
धर्म की पहचान होती है।
धर्म ही मुस्कान लाता है,
जहां मानवता रोती है ।। 5 ।।

माना कि दीया बाती तेल,
तो जहां में अनेक हैं।
लेकिन जरा गौर से देखो,
ज्योति सबकी एक है।।

कौन कहता धर्म मंदिर में है
मस्जिद गिरजे और गुरूद्वारे में है?
वो चर्चा में नही जीवन चर्या में है,
वह अज्ञान के अंधकार में नही दिल के उजियारे में है ।। 6 ।।

आत्म-दृष्टि जिसकी जगी,
समझा वही है धर्म को।
प्यारे प्रभु से मिल गया,
और छू गया इंसानियत के मर्म को ।। 7 ।।

वसुधा कुटुम्ब हो गयी,
प्राणी मात्र प्यारा हो गया
वह फरिश्ता बन गया,
जिसका शैतान मर गया।

भेद दृष्टि मिट गयी,
और पा गया समत्व को।
निजता में जीने लगा,
माना अन्य के अस्तित्व को।। 8।।

करूणा की सूखी धारा में,
प्रेम का सैलाब आ गया।
खुशहाल मरूस्थल करने को
घनश्याम छा गया।।

कोई कहता धरती का गौरव
और कोई मसीहा मानता है।
लगते हैं विशेषण भी बौने
जो धर्म का मर्म जानता है । 9 ।

सर्वं खल्विदं ब्रह्म का,
धर्म ही उद्घोष करता है।
हारे-थके जीवन पथिक में
ये नयी ऊर्जा भरता है।।
जो धर्म की रक्षा करते हैं
उन्हें धर्म भी रक्षण देता है।
जो धर्म के हंता होते हैं,
उनका सब कुछ ले लेता है।। 10

चित्त की पवित्रता ही
धर्म का पर्याय होती है।
जो व्यक्ति के व्यक्तित्व का
एक दिव्य मोती है।।
धर्म व्यवस्थित करता है,
मानवीय व्यवहार को
चला रहा दुनिया के
यह सारे ही व्यापार को ।। 11।।

धर्म धारण कर सके
विश्व का कल्याण हो।
आचरण की शुद्घता से
मानवता का त्राण हो।।

पंच विकारों की अग्नि को,
केवल धर्म बुझाता है।
अंत:करण से पाप वृत्ति को
सदा के लिए मिटाता है । 12 ।

दिव्य गुणों की वृद्घि करता
और देता केवल्य
धर्म निसेनी स्वर्ग की
यह मारग है जाज्वल्य

शम-दम धृति क्षमा,
इसके मूलाधार हैं।
इन्हीं में तो छिपा हुआ
जिंदगी का सार है ।। 13 ।।

अहिंसा और अस्तेय भी
देते ये संदेश हैं।
धर्म को जो धारण करता,
होता वह विशेष है।।

मानवता के मूल्यों को,
यह गिरने नही देता है।
धर्म का रक्षक 'दिव्य पुरूष'
कोई पुन: जन्म ले लेता है। 14 ।

धरती पर यह फेेले हुए
मिटाता है पाप को
विष पीकर के अमृत देता
काटता संताप को

धर्म की स्थापना कर
विश्वास की रक्षा करता है।
सच पूछो तो प्रभु के
आवास की रक्षा करता है । 15 ।

धर्म तो मानवता की मुंडेर पर
एक जलता हुआ चिराग है।
यह हबादत का जेवर है
और दीवानगी की आग है।।

दीवानगी अर्थात भक्ति
आग अर्थात तड़प, अभिप्सा

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