उ.प्र. में भाजपा प्रत्याशियों का चुनाव पूरी ईमानदारी से होना चाहिए

  • 2016-12-30 11:30:50.0
  • मनोज शास्त्री

उ.प्र. में भाजपा प्रत्याशियों का चुनाव पूरी ईमानदारी से होना चाहिए

उ.प्र. विधानसभा चुनाव जितना नजदीक आ रहे हैं उतनी ही उन लोगों के दिलों की धडक़नें बढ़ती जा रही हैं जो भाजपा से विधानसभा का टिकट प्राप्त करने हेतु रात-दिन मेहनत कर रहे हैं। परंतु सबसे ज्यादा ब्लडप्रेशर उन दलबदलू नेताओं का बढ़ रहा है जो लोग सत्तालोलुप हैं और प्रदेश में भाजपा के बढ़ते हुए जनाधार को देखकर दूसरी पार्टियों को छोडक़र भाजपा में केवल इसी आस से जुड़े हैं कि उन्हें भाजपा से विधानसभा का टिकट मिल जायेगा। इनमें से कुछ लोग तो ऐसे हैं जो कल तक न केवल भाजपा के घोर विरोधी थे वरन् भाजपा के प्रत्याशियों को हराने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर भी लगाने को तैयार रहते थे, यानि जो लोग कल तक ''भाजपा हराओ'' का नारा दे रहे थे वो आज ''भाजपा जिताओ'' की बात कर रहे हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो कि कथित रूप से यह कहते घूम रहे हैं कि अगर हमें भाजपा से प्रत्याशी नहीं बनाया गया तो हम भाजपा को जीतने भी नहीं देंगे, इसलिए हमें टिकट मिलना चाहिए। यानि दूसरे शब्दों में ''या तो गुड़ दे, नहीं तो चल प्रधान के पास''। वहीं कुछ लोग इस बात को लेकर बेहद उत्साहित नजर आ रहे हैं कि भाजपा की ''टिकट बांटो समिति'' में एक जाति विशेष के लोगों का ख़ासा दबदबा है। इसलिए उस जाति के लोगों को लगता है कि उनका टिकट कोई काट ही नहीं सकता। वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पैसे और ताक़त के बलबूते पर टिकट कब्ज़ाने में लगे हैं। उनका मानना है कि ''बाप बड़ा न भईया, सबसे बड़ा रूपैया''। परंतु जिन लोगों ने अपने ख़ून-पसीने से दिन-रात एक करके पार्टी को एक नई पहचान दी है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी पार्टी का दामन नहीं छोड़ा। जिन्होंने अपने शरीर पर लाठियां खायीं किंतु पार्टी की वफ़ादारी पर आंच नहीं आने दी। यही वह लोग हैं जिन्होंने कीचड़ में कमल खिलाया। ये वही लोग हैं जिन्होंने मोदी जी को घर-घर पहुंचाया, जिन्होंने पार्टी के सुख के लिए अपने दु:खों की भी चिंता नहीं की। इन्होंने पार्टी के बुरे से बुरे दिनों में भी उसके अच्छे दिनों की आशा का दीप जलाये रखा। किंतु आज जब पार्टी के अच्छे दिन आ गये तो वो लोग मलाई चाटने में सबसे आगे खड़े हो गये जो कल तक भाजपा को गालियां बकने में अपनी शान समझते थे, और उन लोगों को पीछे की ओर धकेल दिया जिन्होंने पार्टी के लिए कुर्बानियां दीं। 


ऐसे ही कुछ उपेक्षित पार्टी कार्यकर्ता बीते सप्ताह सोमवार को पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के 11-अशोका रोड, नई दिल्ली स्थित कार्यालय पर पहुंचे जहां प्रिंट मीडिया और इलैक्ट्रोनिक मीडिया के करीब 100-150 पत्रकार एकत्रित हुए थे। जो कि एक प्रेस कांफ्रेस में भाग लेने आये हुए थे जिसे अमित शाह संबोधित करने वाले थे। यहां यह बताना आवश्यक है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह प्रत्येक माह के पहले और तीसरे सोमवार को पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलते हैं और उनकी शिकायतों और सुझावों को सुनते हैं। प्रेस कांफ्रेस के समाप्त होते ही अमित शाह उठकर जैसे ही गेट की ओर मुड़े तभी तीन लोगों ने उनका रास्ता रोक लिया। ये तीनों लोग भाजपा के बेहद कर्मठ और जुझारू कार्यकर्ता थे। इनमें से एक ने अमित शाह के पांव भी छुए, हालांकि पांव छूने वाला यह व्यक्ति उम्र में अमित शाह से काफी बड़ा था। अमित शाह ने इन्हें एक कमरे में बैठाकर बातचीत की जिसमें इन लोगों ने पार्टी में चल रही आपाधापी और चमचागिरी के साथ-साथ पार्टी के प्रति ईमानदार और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा पर तीव्र रोष प्रकट किया। उन्होंने हाल ही में 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए होने वाली टिकटों की बंदरबांट को रोकने पर भी अपने सुझाव अमित शाह के समक्ष रखे। जो सुझाव अमित शाह को दिये गये उनमें मुख्य सुझाव निम्न हैं-
1.पार्टी संगठन में पदाधिकारियों को टिकट न दिया जाये बल्कि उनके अपने पद से त्यागपत्र देने के पश्चात ही उन्हें टिकट देने पर विचार किया जाये। 
2.सभी संभावित प्रत्याशियों का साक्षात्कार लिया जाये। जिसमें उनसे उनकी शैक्षिक योग्यता, उनका व्यवसाय, उनकी आर्थिक व सामाजिक स्थिति, उनकी पार्टी के प्रति निष्ठा, उनका राजनीतिक अनुभव एवं उनकी साफ-सुथरी छवि पर विशेष ध्यान दिया जाये। साथ ही इस साक्षात्कार के लिए एक कमेटी गठित की जाये जिसमें प्रदेश अध्यक्ष, संबधित क्षेत्रिय अध्यक्ष, संबंधित जिला अध्यक्ष एवं संबंधित क्षेत्र का सांसद सहित स्वयं अमित शाह उपस्थित रहें। एक बार में अधिकतम 5 जिलों के उम्मीदवारों को साक्षात्कार के लिए बुलाया जाये।
3.प्रदेश में संगठन मंत्री पद पर चुनाव होने तक कोई भी नई नियुक्ति न की जाये।
4.टिकट वितरण के लिए संभावित उम्मीदवारों की सूची में पार्टी के उपेक्षित कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी जाये। 

अमित शाह ने इन सुझावों को बहुत ग़ौर से सुना, साथ ही उन लोगों से कहा कि वो इन सुझावों को एक कागज पर लिखकर दें ताकि उनपर गंभीरता से विचार-विमर्श किया जा सके। उन्होंने इन लोगों को यह भी आश्वासन दिया कि ''उ.प्र. के चुनावों पर मेरी बहुत पैनी नजऱ है और एक-एक टिकट बेहद सोच-विचार और हर पहलू पर गंभीर विचार-विमर्श के पश्चात ही दिया जायेगा। किसी भी प्रकार की कोई कोताही नहीं बरती जायेगी।'' वहां उपस्थित कुछ लोगों ने यह भी बताया कि अमित शाह यूपी में होने वाले हर राजनीतिक उलटफेर पर स्वयं निगाह रखे हुए हैं। साथ ही उत्तर प्रदेश के प्रत्येक सांसद को यह जि़म्मेदारी सौंपी गयी है कि उसे अपने संसदीय क्षेत्र की कम से कम तीन विधानसभाओं सीट पर पार्टी को विजय दिलवाने का पूर्ण प्रयास करना ही है। या दूसरे शब्दों में कहें तो हर सांसद को अपने क्षेत्र से न्यूनतम तीन विधानसभा सीटें जितवानी हैं। ऐसे में यह स्पष्ट हो जाता है कि इस बार टिकट वितरण में सांसद की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण होगी। पूरे उत्तर प्रदेश में 6 क्षेत्रीय कार्यालय हैं और प्रदेश प्रभारी ओम माथुर तथा प्रदेश संगठन मंत्री सुनील बंसल हैं। इसके अतिरिक्त रामलाल (राष्ट्रीय संगठन मंत्री), शिवप्रकाश (राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री), आदि सहित कई लोग हैं जिनके हाथों से होकर संभावित प्रत्याशियों की सूची अमित शाह के हाथों में पहुंचेगी। जिसपर उनकी अंतिम मोहर लगेगी। इसके अतिरिक्त पार्टी और आर.एस.एस के सर्वे सहित खुद अमित शाह के निर्देशन में बनी सांसदों की एक टीम भी प्रदेश में कार्यरत है जिसकी अंतिम रिपोर्ट अभी जानी शेष है। हालांकि वहां उपस्थित पार्टी के कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और अनुभवी लोगों का यह भी कहना था कि इस बार पार्टी का पूरा ध्यान उ.प्र. चुनावों को जीतने पर है और सही मायनों में देखा जाये तो पार्टी और अमित शाह दोनों के लिए विधानसभा चुनाव 2017 सीता की अग्निपरीक्षा की तरह है। जानकारों का यह भी मानना है कि इस बार अमित शाह और उनकी टीम के लिए ''करो या मरो''' की स्थिति है, क्योंकि यह चुनाव केवल 2017 ही नहीं बल्कि 2019 के लोकसभा चुनावों में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा।