आर्य जगत के सुप्रसिद्घ विद्वान डॉ.धर्मवीर का लघु जीवन चरित्र

  • 2016-10-11 08:00:00.0
  • अमन आर्य
आर्य जगत के सुप्रसिद्घ विद्वान डॉ.धर्मवीर का लघु जीवन चरित्र

प्रस्तुति: ज्ञानप्रकाश वैदिक
महर्षि देव दयानंद के अनन्य भक्त, वैदिक विद्वान, गम्भीर अनुसन्धाता, ओजस्वी वक्ता, उपदेशक, लेखक, बहुमुखी प्रतिभा के धनी तथा महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित परोपकारिणी सभा ,अजमेर के यशस्वी प्रधान तथा मंत्री पदों के निर्वहन कर्त्ता पं. धर्मवीर जी का जन्म महाराष्ट्र प्रदेश के उद्गीर क्षेत्र में आर्य समाज से सम्बद्ध पिता श्री भीमसेन आर्य और माता श्री के गृह में दिनांक 20 अगस्त 1946 ईसवी को हुआ। आपने प्रारम्भिक शिक्षा अपने जन्म क्षेत्र में प्राप्त की। तत्पश्चात् आर्य समाज के तपोनिष्ट एवं कर्मठ संन्यासी स्वामी ओमानंद सरस्वती(पूर्वनाम आचार्य भगवान देव ) के श्री चरणो में अध्ययनार्थ गुरूकुल महाविद्यालय झज्जर में ईसवी सन् 1956 में प्रविष्ट हुए। आप एक मेधावी कुशाग्र बुद्धि छात्र होने के कारण अध्ययन में अग्रणी रहे । आपने गुरूकुल झज्जर, गुरूकुल काँगड़ी (हरिद्वार) आदि से आचार्य,एम.ए.तथा आयुर्वेदाचार्य की उपाधि प्राप्त की । आपने पंजाब विश्व विद्यालय की दयानंद शोधपीठ से ऋषि दयानंद के जीवनपरक महाकाव्यों का समीक्षात्मक अध्ययनविषय पर शोध करते हुए पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।आपने ईसवी सन् 1974 में दयानंद कॉलेज अजमेर के संस्कृत विभाग में प्राध्यापक और अध्यक्ष के रूप में कार्य किया । आप प्रभावशाली वक्ता, प्रचारक, चिन्तक, दार्शनिक तथा तार्किक थे । आपकी सहधर्मिणी श्रीमती ज्योत्स्ना आर्या तथा आपकी पुत्रियाँ आपने सामाजिक कार्यों में पूर्णरूप से सहयोगी रही और आपका पूरा परिवार पारस्परिक व्यवहार में संस्कृत भाषा का प्रयोग ही किया करता था। आपने वैदिक धर्म, अध्यात्म आदि प्रचारार्थ भारत वर्ष के प्राय: सभी प्रान्तों में यात्रा की है और विदेशों में हॉलेण्ड, सिंगापुर, नेपाल आदि स्थानों पर वैदिक धर्म का प्रचार किया है।प्रचार के साथ साथ आप जिज्ञासु छात्रों को वैदिक साहित्य का अध्यापन भी पूरी निष्ठा से कराते रहते थे । आप महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित परोपकारिणी सभा से ईसवी सन् 1974 में जुड़ें और प्रधान तथा मंत्री आदि पदों का निर्वहन करके सभा के उद्देश्यों तथा कार्यों को आपने एक सच्चे ऋषिभक्त के रूप में पूरा किया है। आपने परोपकारिणी सभा के अधीन अनेक प्रकल्प और योजनाएं संचालित की है, जिनमें गुरूकुल स्थापना, साधना आश्रम की स्थापना, गौशाला की स्थापना आदि प्रमुख हैं। आपने लेखन के माध्यम से अवर्णिय कार्य किया है।आप परोपकारिणी सभा के मुखपत्र परोपकारी पाक्षिक के अनेक वर्षों से अवैतनिक सम्पादक रहे थे। परोपकारी पत्रिका आर्य समाज की विशिष्ट एवं मानक पत्रिका है। इसके गम्भीर तथा समसामयिक सम्पादकीय आपकी अद्भुत प्रतिभा के प्रमाण थे। आपकी लेखनी से समाज को नई उर्जा मिलती थी।

आपके सम्पादकत्व में परोपकारी में योगविद्या विषयक अनेक लेख प्रकाशित होते रहते थे। आपने सत्यार्थ प्रकाश क्या है नामक पुस्तक के साथ-साथ अन्य लेखन भी किया ।आपके मार्ग दर्शन में ऋ षि उद्यान में साधना आश्रम का संचालन हो रहा है, जिसमें साधकगण साधनारत हैं । वर्ष में कई बार यहाँ  योग शिविरों का आयोजन होता है, जिसमें आर्यसमाज के उच्चकोटी के योगविशेषज्ञ/ योगगुरू/ योगप्रशिक्षक जिज्ञासु साधकों को योग का क्रियात्मिक प्रशिक्षण देते हैं और आप स्वयं भी योगविषय पर व्याख्यान देने के साथ-साथ योगदर्शन का अध्यापन करते थे । आपकी प्रेरणा से आर्य युवकों तथा युवतियों ने योग साधना के मार्ग का अनुकरण किया है। आप द्वारा वैदिक तथा दार्शनिक विषयों पर दूरदर्शन, यु-ट्यूब पर उपलब्द है एवं प्रतिदिन ऋषि मिशन के माध्यम से  फेसबुक और वॉट्सप पर भी व्याख्यान प्रस्तुत किए जाते है जिनमें योग अध्यात्म भी एक अंग है। आपके  व्यक्तिगत जीवन में योगाभ्यास के रूप में आसन प्राणायाम और ध्यान अनिवार्य रूप से समाहित थे। आपने विद्यार्थी काल में स्वामी ओमानंद सरस्वती से प्राणायाम आदि का ज्ञान प्राप्त किया था यहां ध्यातव्य है कि स्वामी ओमानंद सरस्वती ने आर्य समाज के महान् योगी स्वामी आत्मानंद सरस्वती (पंडित मुक्ति राम उपाध्याय) से योग साधना का ज्ञान प्राप्त किया था और योग दर्शन के प्रकांड शास्त्रीय विद्वान तथा साधक स्वामी आर्य मुन्नी से योग दर्शन का विशेष अध्ययन किया था  डॉ धर्मवीर आचार्यको ऐसे महान् योग साधक स्वामी ओमानंद सरस्वती से प्रणायाम आदि का विशेष ज्ञान मिला था । डॉ धर्मवीर जी को अपने जीवन में अनेक साधकों का सानिध्य मिला, जिनमे स्वामी सत्यपति परिव्राजक (रोजड़) स्वामी दिव्यानंद सरस्वती (हरिद्वार) स्वामी आत्मानंद सरस्वती, स्वामी ब्रह्म मुनिआदि प्रमुख हैं । इनके साथ ही आपको पौराणिक संन्यासी महात्मा आनंद चैतन्य (बिजनौर) की योग साधना को भी निकट से देखने व जानने का विशेष अवसर प्राप्त हुआ था डॉ.धर्मवीर जीने परोपकारिणी सभा द्वारा प्रकाशित अनेक ग्रंथों का संपादन,निरीक्षण और प्रबंधन किया, था अत: इस प्रक्रिया में जितना भी योग विषयक साहित्य प्रकाशित हुआ था उसमें आपका अनुभवी योगदान रहा था  इसके साथ ही स्वामी दयानंद सरस्वती जी का समस्त साहित्य परोपकारिणी सभा के द्वारा प्रकाशित हुआ है । उसमें आप की महत्वपूर्ण भूमिका रही है स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा अपने  ग्रंथों में अनेक स्थानों पर योग विषयक बिंदुओं की व्याख्या प्रस्तुत की गई है, जिसे  आपको अनेक बार पढऩे और संपादित करने का विशेष अवसर प्राप्त हुआ था। इसके अतिरिक्त ऋषि मेले के अवसर पर अजमेर में आयोजित वेद गोष्ठियों में विद्वानों द्वारा प्रस्तुत योग निबंधों को आपके संपादकत्व में पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया गया है । अनेक कार्यक्रमों में उनके प्रेरणाप्रद उपदेशों को  सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है । 
नमन आचार्यवर