ऋषि दयानन्द का बलिदान सत्य की विजय व असत्य की पराजय

  • 2016-11-03 09:30:09.0
  • मनमोहन सिंह आर्य
ऋषि दयानन्द का बलिदान सत्य की विजय व असत्य की पराजय

ऋषि दयानन्द ने दीपावली के दिन लगभग सायं 6:00 बजे अपनी नश्वर देह का अजमेर की भिनाय की कोठी में त्याग किया था। देहत्याग का मुख्य कारण उन्हें जोधपुर में रात्रि को दुग्ध में विष दिया जाना और उसके बाद उनके उपचार में असावधानी तथा चिकित्सक द्वारा जानबूझकर की गई साजिश प्रतीत होती है। यदि उनकी चिकित्सा डा. अलीमर्दान के इतर किसी अन्य निष्पक्ष चिकित्सक से कराई जाती तो पूरी सम्भावना थी कि वह विष के प्रभाव से बच जाते और स्वस्थ हो जाते। चिकित्सा के नाम पर उन्हें हानिकारक ओषधियों की अधिकाधिक मात्रा दी गई जिससे लाभ के स्थान पर हानि होने से उनका पूरा शरीर विष व ओषधी के नाम पर की गई छलयुक्त चिकित्सा से मृत्यु के निकट पहुंच गया।  ऐसी स्थिति में ऋषि दयानन्द ने अपने अनुयायियों से दिन, वार व तिथि पूछ कर कार्तिक अमावस्या दीपावली को अपनी जीवन लीला समाप्त करने का निश्चय किया। यह निश्चय उन्होंने किसी को बताया नहीं परन्तु मृत्यु से पूर्व जो घटनायें घटी, उससे यह अनुमान होता है कि उन्होंने दीपावली के दिन ही अपने शरीर त्याग का निश्चय किया था। अपने लोगों के विशेष भोजन बनवाना और उनके लिए लायी गयी भोजन की थाली को प्रेमपूर्वक देख कर भोजन को लौटा देना, नाई को बुलाकर क्षौरकर्म कराना, शुद्ध वस्त्र धारण करना, अपने भक्तों व अनुयायियों से बातें करना और उन्हें पुरस्कृत करने के साथ सान्त्वना देना और फिर सबको अपने पीछे आने का निर्देश कर ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना कर अन्तिम आदर्श वाक्य 'ईश्वर तैने अच्छी लीला की, तेरी इच्छा पूर्ण हो, पूर्ण हो, अहा, तैने अच्छी लीला की।'  कहकर नश्वर देह का त्याग करना उनकी मृत्यु को आक्समिक व स्वत: होना सिद्ध नही करते अपितु यह बातें शरीर त्याग को विवेक पूर्वक निर्णय कर छोडऩे की बात को सिद्ध करते हैं। 


ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती से शिक्षा प्राप्त की थी और गुरु के निवेदन व आदेश के अनुसार सत्य सनातन यथार्थ शुद्ध व पवित्र वैदिक धर्म के प्रचार और मत-मतान्तरों की मिथ्या व असत्य मान्यताओं व सिद्धान्तों का खण्डन करने सहित समाज सुधार का कार्य किया था। वह जानते व मानते थे कि असत्य के खण्डन व सत्य के मण्डन के बिना असत्य और अविद्या का नाश और सत्य और विद्या की वृद्धि नहीं हो सकती और समाज से बुराईयां दूर नहीं की जा सकती थी। असत्य का खण्डन करने का निर्णय करते समय उन्हें इस बात का अवश्य ज्ञान था कि इसका परिणाम उनके जीवन के लिए अनिष्ट हो सकता है। वह योगी थे और उन्हें यह तथ्य भी भलीभांति विदित था कि परोपकार के लिए जीवन का त्याग करना विवेकशील मनुष्य के लिए आवश्यक होता है। उन्हें रामायण और महाभारत सहित इतर इतिहास का ज्ञान भी था जहां कर्तव्य व देश की रक्षा के लिए हमारे महापुरुष और असंख्य वीर सैनिक अपने जीवनों का बलिदान करते आये थे। अत: उन्होंने दीर्घ जीवन और कर्तव्य में से कर्तव्य का चुनाव पहले से ही कर रखा था। एक महात्मा व ऋषि होने के कारण उन्होंने अपने यौगिक बल से उनके जीवन का घात करने के जो प्रयास किये गये थे, उन्हें भी अवश्य जाना होगा परन्तु मर्यादा में रहकर उन्होंने चुप रहना ही उचित समझा, ऐसा ज्ञात होता है। अत: ऋषि दयानन्द जी का अपने कर्तव्य की वेदी पर बलिदान हुआ, यही समझ में होता है। ऋषि दयानन्द ने जब जोधपुर यात्रा की योजना स्वीकार की थी तभी उनके शुभचिन्तक अनुयायियायें ने उन्हें भावी खतरे से आगाह कर दिया था परन्तु ईश्वर व सत्य के प्रचार में पूर्ण विश्वासी दयानन्द ने उन सुझावों की उपेक्षा कर दी थी। यदि किसी कारण उनका जोधपुर जाना टल जाता तो आर्यसमाज की जो हानि उनके 58-59 वर्ष की आयु के बीच जाने से हुई, वह न होती। सत्य, देश व समाज के उपकार के लिए उन्हें जो कष्ट सहन करने पड़े, उन्हें सोचने व विचार करने पर दु:ख व पीड़ा होती है। 

महाभारत काल के बाद ऋषि दयानन्द जी ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अपने अपूर्व पुरुषार्थ और त्याग के कार्यो से देश की बिगड़ी दशा का सुधार करने के लिए न केवल योग में उच्चतम स्थिति समाधि व ईश्वर साक्षात्कार को प्राप्त किया था अपितु ईश्वरीय ज्ञान चार वेदों का यथार्थ ज्ञान भी प्राप्त किया था जो महाभारत काल के बाद किसी योगी, महात्मा व महापुरुष में देखा नहीं गया। यही कारण था कि उन्होंने देश, काल व परिस्थितियों का मूल्याकंन कर और गुरु की प्रेरणा होने पर अविद्या, अज्ञान, अन्धविश्वास, मिथ्या पूजा व सामाजिक मिथ्या मान्यताओं के सुधार करने का अपूर्व कार्य किया। मूर्तिपूजा, फलित ज्येातिष, मृतक श्राद्ध, सामाजिक भेदभाव और हानिकारक सामाजिक प्रथाओं आदि का न तो वेदों में कहीं विधान है और न ही यह तर्क व युक्ति के आधार पर उचित सिद्ध होती हैं। इन सभी मान्यताओं व परम्पराओं सहित अनेक अन्य कारणों से समाज दु:खों से पीडि़त व विदेशी दासता में जकड़ा हुआ था। भारत के आर्यों व हिन्दुओं को कैंसर के समान यह त्रिदोष, ताप व रोग लगे हुए थे परन्तु हिन्दू जाति के तत्कालीन धार्मिक नेता और उनके अनुयायी इन भयंकर रोगों से अनभिज्ञ थे। अत: किसी योग्यतम धार्मिक चिकित्सक द्वारा इन रोगों का उपचार आवश्यक था। ऋषि दयानन्द ने न केवल हिन्दू जाति के समस्त रोगों को जाना व समझा अपितु उनका उचित उपचार भी किया। उनके इन कार्यों से स्वार्थी मतवादी लोग उनपर कुपित हुए और उनका अनिष्ट वा जीवन समाप्त करने के नाना प्रकार से षडयन्त्र करने लगे। अंग्रेज अधिकारी भी स्वामी दयानन्द की देश की आर्य वा वैदिक धर्म व संस्कृति सहित स्वतन्त्रता की रक्षा के विचारों से परिचित होने के कारण अन्दर ही अन्दर उन्हें अपना शत्रु मानते थे। अत: ऐसे वातावरण में वह और अधिक जीवित शायद् नहीं रह सकते थे। देर-सबेर विरोधियों के द्वारा उनके जीवन का अन्त होना सम्भावित ही था। अत: जोधपुर में उनके विरोधियों का षडयन्त्र सफल हुआ जिसका परिणाम सन् 1883 की दीपावली के दिन 30 अक्तूबर के दिन उनके नश्वर देह का त्याग होना रहा। 

30 अक्तूबर, 1883 दीपावली के दिन ऋषि दयानन्द ने अपने देह का भले ही त्याग कर दिया परन्तु उनकी आत्मा आज भी ईश्वर के सान्निध्य में रहकर ईश्वरीय आनन्द वा मोक्ष का अनुभव कर रही है। सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, ऋग्वेदभाष्य, यजुर्वेदभाष्य,, संस्कारविधि, आर्याभिविनय और अपने अन्य ग्रन्थों के कारण आज भी वह अपने अनुयायियों के मध्य विद्यमान हैं और अपने ग्रन्थों व जीवन चरित तथा पत्रव्यवहार आदि के द्वारा उनका मार्गदर्शन करते हैं। उनके मानव सर्वहितकारी कार्यों से सारा संसार लाभान्वित हुआ है। यद्यपि मिथ्या उपासना व पूजा संसार से समाप्त तो नहीं हुई परन्तु संसार में सहस्रों, लाखों व करोड़ो लोग आज ईश्वर, जीव और प्रकृति के सत्य स्वरूप को जानकर उनके व आर्यसमाज के अनुयायी बनकर ईश्वरोपासना, यज्ञ व इतर वैदिक कर्मकाण्डों को करते हैं जो इस जीवन में सुखदायक होने के साथ उन्हें मृत्यु के बाद उन्नति व मोक्ष मार्ग का अधिकारी भी बनाते हैं। वर्तमान काल में ज्ञान विज्ञान तीव्र गति से बढ़ रहा है। इस स्थिति के प्रभाव से बहुत से मतों के लोगों ने अपने अपने जन्मना मतों के अनुसार आचरण करना भी छोड़ दिया है। अनेक मतों में अपनी कुछ व अनेक मान्यताओं को लेकर अन्तर्कलह भी देखने को मिल रही है।
उनमें शंका करने और उसका समाधान प्राप्त करने की स्वतन्त्रता नहीं है। दूसरी ओर वैदिक धर्म में सबकों शंका करने व उसका समाधान प्राप्त करने की पूरी स्वतन्त्रता है।  अत: वैदिक धर्म ही आज का सबसे अधिक तर्क व युक्तियों से पूर्ण एक वैज्ञानिक धर्म है। संसार में जितना ज्ञान और विज्ञान बढ़ेगा उतना ही वैदिक धर्म सुदृण और इतर मत जीर्णता को प्राप्त होंगे। वैदिक धर्म के पूर्ण सत्य पर आधारित होने के कारण हम आशा कर सकते हैं कि वैदिक धर्म ही संसार के सभी लोगों का भावी धर्म होगा। 

कहावत है कि इतिहास अपने आप को दोहराता है। इसका अर्थ यह भी ले सकते हैं कि महाभारत काल से पूर्व वैदिक काल में जो होता रहा है, भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति हो सकती है वा होगी। ऋषि दयानन्द का संसार से अविद्या को दूर कर ईश्वर, जीव व प्रकृति के सच्चे स्वरुप व सत्य परम्पराओं को स्थापित करने सहित अन्धविश्वास, अज्ञान, कुरीतियां, मिथ्या परम्पराओं के सुधार व उनके संशोधन में सर्वाधिक योगदान है। ऋषि दयानन्द का दीपावली के दिन अजमेर में बलिदान मिथ्या मतों की पराजय और सत्य वैदिक धर्म की विजय है। उनके विरोधी उनकी सत्य मान्यताओं का खण्डन नहीं कर सकने से पराजित हुए हैं तथा वह धर्म की वेदी पर विजेता सिद्ध होते हैं। वह जीवन में कभी किसी मत-मतान्तर व उसके अनुयायी से पराजित नहीं हुए। आज उनके बलिदान दिवस पर हम उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह ऋषि दयानन्द के स्वप्नों को साकार करने में सभी मनुष्यों के हुदयों में सत्प्रेरणा करें।