'राजनीति का हिन्दूकरण' और सावरकर, भाग-7

  • 2016-08-28 14:00:41.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार भारतीय गणित के अंक १, , ३........ ९ को बदलकर अंतर्राष्ट्रीयता के नाम पर 1, 2, 3........ 9 कर दिया गया है। इससे भारतीय के गणित के क्षेत्र में विश्व को देन विषय पर शोध करने की परंपरा बाधित हुई है। यदि भारतीय अंकों का विलोपीकरण न किया जाता तो हमारे विद्यार्थियों को अपने देश के विषय में जानने का और भी अधिक अवसर मिलता। यद्यपि अनुच्छेद 343 (3) में 15 वर्ष बाद अर्थात 1965 से देवनागरी अंकों के प्रयोग का निर्देश है, किंतु उसका प्रचलन आज तक नही हो पाया है। इस संबंध में संविधान के निर्देश का पालन किया जाना आवश्यक है।

न्यायालयों की भाषा और शासक वर्ग

'राजनीति के हिंदूकरण' की प्रक्रिया को लागू करने की और भी अधिक अनिवार्यता इस बात से प्राप्त हो जाती है कि मुगल काल में देश के न्यायालयों की भाषा फारसी थी, और ब्रिटिशकाल में अंग्रेजी थी। कहने का अभिप्राय है कि न्यायालयों की भाषा शासक वर्ग अपनी सुविधानुसार बनाया करता है। अब जबकि भारत स्वतंत्र है तो न्यायालयों से अंग्रेजी का वर्चस्व समाप्त होना चाहिए और उसके स्थान पर शासन की ओर से हिंदी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। संविधान की धारा

344 राजभाषा हिन्दी के उन्नयन की बात कहती है, पर हमने अपनी राजभाषा हिन्दी के उन्नयन के लिए कोई ठोस कार्य नही किया है, और देश के न्यायालयों में अंग्रेजी का वर्चस्व आज भी यथावत बना हुआ है।

जम्मू-कश्मीर और धारा 370

देश के लिए जम्मू-कश्मीर राज्य का विशेष महत्व है, यहां एक वर्ग विशेष के हितों के रक्षार्थ संविधान की धारा 370 लगाई गयी है। इस पर हम पूर्व में भी बहुत कुछ लिख चुके हैं, यहां तो मात्र इतना ही स्पष्ट करना पर्याप्त है कि इस धारा को हटाने के लिए सावरकर जी प्रारंभ से ही सक्रिय रहे थे। वह नही चाहते थे कि देश के विभाजन के लिए उन्हें कोई नई संरचना रची जाए। जबकि गांधी जी की कांग्रेस इसी धारा के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर में हिंदू हितों की बलि चढ़ाती आयी है। वहां से लाखों हिन्दू (कश्मीरी पंडित) अपना घरबार छोडक़र देश में इधर-उधर भटक रहे हैं, अपने ही घर में शरणार्थी का अपमानजनक जीवन जीने के लिए ये लोग बाध्य हैं। राजनीति का हिन्दूकरण करने का अभिप्राय संविधान में ऐसी कोई भी धारा का न होना होगा जो देश की एकता और अखण्डता के लिए किसी भी प्रकार का कोई संकट उत्पन्न कर सकती हो। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि 1947 में जो हिन्दू शरणार्थी पाकिस्तान से आकर कश्मीर में बस गये थे, उन्हें आज तक इस प्रदेश की विधानसभा के चुनाव में मतदान करने का अधिकार नही दिया गया है। न केवल लोकसभा के चुनाव में अपना मत देने का अधिकार है। इतना ही नही 1947 में जो मुस्लिम शरणार्थी जम्मू-कश्मीर छोडक़र पाकिस्तान चले गये थे, उन्हें जम्मू-कश्मीर सरकार वापस बुलाकर हिन्दू बाहुल्य जम्मू आदि क्षेत्रों में पुनर्वासित कर रही है। इस पर तुरंत प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता थी, परंतु देश विभक्ति की नीतियों पर काम करती रही, गांधीवादी कांग्रेसी सरकारों ने इस ओर कोई ध्यान नही दिया।

धारा 371 और भी अधिक खतरनाक

धारा 370 से अगली खतरनाक धारा 371 है। यह धारा ईसाई बहुल प्रदेशों नागालैंड, मिजोरम, मेघालय में कई स्थानों पर भूमि खरीदने का   अधिकार केवल ईसाई नागाओं को प्रदान करती है। यह अधिकार हिन्दुओं को नही दिया गया है। इससे इन प्रदेशों में अत्यंत प्राचीनकाल से निवास करते आये हिन्दुओं को यहां रहकर जीवन यापन करना कठिन होता जा रहा है। उनके सामने अब दो ही विकल्प हैं कि या तो वे यहां से पलायन करें या फिर धर्मांतरण करें। लोकतांत्रिक देश में संविधान के द्वारा ऐसी व्यवस्था करना व्यवस्था को   अन्यायकारी बनाता है। जबकि हिन्दूनिष्ठ राजनीति ऐसी किसी भी व्यवस्था की घोर विरोधी है। उसका मंतव्य नागरिकों के मध्य समानत: स्थापित करना है, और राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय लोगों को प्रदान करना है। कांग्रेस ने देश की एकता और अखण्डता को दांव पर रखकर संविधान की इस अन्यायकारी धारा को बनाये रखना आवश्यक समझा है। उसका दृष्टिकोण वोटों की राजनीति करना रहा है। तुष्टिकरण को उसने गांधीवाद का नाम दिया है। अत: स्पष्ट है कि इस गांधीवाद ने देश को कितना कष्ट दिया है?

भारतीय अर्थव्यवस्था

कौटिल्य का कथन है कि-

''सुखस्य मूलं धर्म:। धर्मस्य मूलं अर्थ:।'' अर्थात सुख का मूल धर्म है और धर्म का मूल अर्थ है। अर्थ की पवित्रता को धर्मानुकूल बनाने की भावना पर हमारी प्राचीन अर्थव्यवस्था को खड़ा किया गया, गांधीजी यद्यपि अर्थ की शुचिता पर बल देते थे, पर वह उसे भारत के प्राचीन अर्थतंत्र से अथवा कौटिल्य के अर्थशास्त्र से जोडक़र नही देखते थे। कौटिल्य का कहना है-''आन्वीक्षकी त्रयीवात्र्ता दण्डनीतिश्चेति विद्या''-अर्थात चारों पुरूषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करने के लिए आन्वीक्षकी, त्रयीवात्र्ता और दण्डनीति ये चारों विद्याएं आवश्यक हैं।

भारत के विषय में विद्वानों की मान्यता रही है कि-''हिन्दू धर्म व्यवस्था के पास भारत के निवासियों को निर्धन और निरक्षर बनाये रखने का कोई ब्लूप्रिंट नही है, किंतु संसार में समृद्घतम देशों में अग्रणी भारत सहस्रों वर्षों तक यदि विश्व के चक्रवर्ती सम्राटों का केन्द्र रहा तो उसका श्रेय केवल हिन्दू पद्घति की हिन्दू अर्थनीति सिद्घांतकारों को ही प्राप्त होता है, अन्य किसी को नही। हिन्दू अर्थनीति अर्थात स्वर्णयुग का भारत, विदेशी अर्थनीति अर्थात कंगाल भारत (प्लास्टिक युग का भारत) है।''

अत: राजनीति का हिन्दूकरण वास्तव में व्यवस्था का हिन्दूकरण है, जिसमें व्यक्ति को केन्द्रि करके नीतियां बनाई जाती हैं और व्यक्ति के समग्र विकास को लक्ष्यित किया जाता है।

विश्वेश्वरैया का प्रबंधन

आधुनिक औद्योगिक नीति नियामक प्रसिद्घ अभियंता विश्वेश्वरैया का कहना है कि (1) मनुष्य (2) माल (3) मुद्रा (4) मशीन (5) प्रबंधन-मैनेजमेंट (6) शक्ति और (7) मांग। इन सातों (Men, Meterial, Money, Machinery, Management, Motiv Power, Market) के समन्वित प्रयास से ही उद्योग में सफलता मिलती है।

हिन्दू राजनीति इसी आदर्श को लेकर आगे बढऩा चाहती है। हिन्दू राजनीति देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बढ़ते जाल को किसी भी दृष्टिकोण से उचित नही मानती है। विदेशी कंपनियां देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर रही हैं। उनसे देश को मुक्त करना देश के लिए आर्थिक स्वतंत्रता की नई लड़ाई लडऩे के समान है। इन कंपनियों ने देश के राजनैतिक दलों को अपने माया मोह में जकड़ सा लिया है।

देश की विदेश नीति का हिन्दूकरण

विश्व में 76 देश ईसाई होकर तथा 54 देश मुस्लिम होकर अपनी विदेश नीति को अपने ढंग से लागू करते हैं। उन्हें अपने संप्रदाय की बात अंतर्राष्ट्रीय मंचों से करने में भी कोई हिचक नही होती पर हमारी सरकारों को प्रारंभ से ही अपने आपको हिन्दू राष्ट्र कहने में संकोच रहा है। सावरकर जी का चिंतन था कि यदि ईसाई और मुस्लिम लोग अपना साम्प्रदायिक गुट विश्व में बना सकते हैं तो भारत को भी विश्व मंचों पर अपने समान विचारधारा के देशों का गुट बनाना चाहिए उनका मानना था कि भारत, नेपाल, मॉरीशस, सूरीनाम, गुयाना आदि दस देशों में हिन्दू लोग बहुलता से मिलते हैं। इन्हें साथ लेकर चलना भारत की विदेशनीति का अंग होना चाहिए। जबकि इन दस देशों के अतिरिक्त 29 बौद्घ देश हैं, जिनमें प्रमुख हैं-चीन, जापान, लंका, ब्रह्मदेश, थाईलैंड इत्यादि। इन सबको धार्मिक ऊर्जा भारत से ही मिलती है और ये देश भारत को अपने लिए तीर्थस्थल मानते हैं। सावरकर जी का मानना था कि इन देशों को साथ लेकर अंतर्राष्ट्रीय मंचों को हिलाने और अपने अनुसार चलाने के लिए भारत को अपनी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। सावरकर जी की यह नीति बड़ी ही व्यावहारिक कही जा सकती है। क्योंकि आज कल अंतर्राष्ट्रीय राजनीति सांप्रदायिक गुटबाजी का शिकार है, एक ही विचारधारा के देश साम्प्रदायिक आधार पर बड़ी तेजी से एक मंच पर आ जाते हैं, इसी नीति पर यदि भारत प्रारंभ से ही चीन के साथ चलता तो अन्य बौद्घ धर्मावलंबी देश भी यथाशीघ्र भारत के साथ आ जाते हैं और भारत की बात को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर गंभीरता से सुनना आरंभ कर देते हैं।

नेहरू जी ने प्रारंभ से ही ईसाई देश ब्रिटेन, या बाद में रूस का साथ देना आरंभ कर दिया था। उन्हें बौद्घ या किसी हिंदू देश को साथ लगाने में कुछ अधिक ही संकीर्णता दिखाई पड़ती थी। फलस्वरूप भारत को कुछ अधिक ही समस्याओं का सामना अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर करना पड़ा। गांधीजी यद्यपि महात्मा बुद्घ की हिंसा की नीति पर चलने वाले थे परंतु उन्हें बौद्घों को साथ लगाने में अधिक रूचि नही थी। हां, वह हर स्थिति में मुस्लिमों को साथ लगाने के समर्थक थे। उन्होंने अपना अलग राज्य बनाया और फिर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उसी अलग बने देश पाकिस्तान ने भारत के लिए कष्टकारी परिस्थितियों का तानाबाना बुनना आरंभ कर दिया।

सावरकर जी धार्मिक आधार पर चीन आदि देशों से संबंध बनाने के समर्थक थे, परंतु इसका अभिप्राय यह नही था कि वे बुद्घवादी अहिंसा को अपनी विदेशनीति का आधार बना लेना चाहते थे। नही, वह विदेशनीति के लिए अपनी शुद्घ हिन्दू राजनीति के प्रबल पक्षधर थे। 10 मई 1957 को 1857 की क्रांति के सौ वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर उन्होंने दिल्ली में भाषण करते हुए कहा था-''हमारे देश को पाकिस्तान व चीन से धमकियां और चुनौतियां मिलती रही हैं। ऐसे समय में हमारे सम्मुख दो आदर्श हैं। एक आदर्श है बुद्घ का, दूसरा है युद्घ का। हमें बुद्घ या युद्घ में से एक को अपनाना होगा। ये हमारी दूरदर्शिता पर निर्भर है कि हम बुद्घ की आत्मघाती नीति को अपनाएं या युद्घ की विजय प्रदायिनी वीरनीति को अपनाएं।

जब तक भारत आधुनिकतम शस्त्रास्त्रों से युक्त शक्तिशाली राष्ट्र नही बनेगा, इसकी सीमाएं खतरे में पड़ी रहेंगी। अत: राष्ट्र को सैन्य के क्षेत्र में शक्तिशाली बनाने के कार्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

बेडिय़ां तोड़ दो

'सावरकर विचारदर्शन' में सावरकर जी ने हिन्दू समाज के  उत्थान और हिन्दू राष्ट्र की मजबूती के लिए बड़ी पते की बात कही है। वह कहते हैं कि जातिभेद का उन्मूलन करने के लिए हमें सात बेडिय़ां तोडऩी हैं, ये हैं-'वेदोक्तबंदी, व्यवसायबन्दी, स्पर्शबन्दी, सिन्धुबन्दी, शुद्घिबन्दी, रोटीबन्दी और बेटीबन्दी।'

इन सात बेडिय़ों को तोडक़र सावरकर हिन्दू राष्ट्र निर्माण करने के पक्षधर थे। वह वेदादि शास्त्रों को पढऩे का सबको समान अधिकार देना चाहते थे। व्यवसाय के क्षेत्र में हर हिन्दू को कोई भी व्यवसाय चुनने का अधिकार होना चाहिए। यहां तक कि मंदिर का पुजारी भी कोई भी जाति का व्यक्ति हो सकता है। ऐसी समानता सावरकर जी चाहते थे। इसके लिए अस्पृश्यता निवारण वह अनिवार्य मानते थे। वह सिन्धुबन्दी से विदेश गमन के निषेध को मिटाना चाहते थे। वह चाहते थे कि जो हिन्दू विदेशों में बसे हैं उनसे हमारे भावनात्मक संबंध बने रहने चाहिए। वह परधर्मी बन गये लोगों की घर वापसी को सरल बनाने के पक्षधर थे। आपातकाल में मुस्लिमों का या ईसाईयों का खा लेने पर हिन्दू को जाति बहिष्कृत करने की सामाजिक बुराई को वह जड़ से उखाड़ देना चाहते थे। ऐसे बहिष्कृत लोगों को वह घर लाने के पक्षधर थे। विधर्मी से शादी कर लेने पर भी कुछ लोग निजबंधुओं को बहिष्कृत कर देते थे। सावरकर जी इसे भी अनुचित मानते थे। वह अहिन्दू को हिन्दू बनाकर विवाह कराने के समर्थक थे। निश्चय ही इन सातों बेडिय़ों का टूटना हिन्दू राजनीति के लिए बहुत ही आवश्यक हैं।