'राजनीति का हिन्दूकरण' और सावरकर, भाग-6

  • 2016-08-27 13:45:14.0
  • राकेश कुमार आर्य

सावरकर जी कहते हैं-''वे कौन हैं जिन्हें परमेश्वर ने भरत खण्ड को स्वदेश कहकर पुकारने  का सौभाग्य प्रदान किया है? वे कौन हैं जिन्हें सर्वशक्तिमान ने इस भारतभूमि को अपनी मातृभूमि मानने के अधिकार से गौरवान्वित किया है और जो इस भूमि के अमृतमय स्तन्य का दिव्यपान कर इसे 'ऐ मां!' कहकर पुकारने में धन्यता अनुभव करते हैं?

यह कृतार्थता, धन्यता और गौरव हमें प्राप्त है-केवल हमें। भारतखण्ड को स्वदेश कहने का सौभाग्य प्राप्त कर हम भारतीय गौरवान्वित हैं।''

'राजनीति के हिंदूकरण' के माध्यम से स्वदेशी भावना को हमारे भीतर कूट-कूटकर भरने के लिए सावरकर जी आजीवन सक्रिय रहे। उन्होंने कहा था कि यह (भारत) भूमि वशिष्ठ, नामदेव आदि ऋषियों द्वारा अभिमंत्रित जल से पवित्र की गयी है। महर्षि व्यास की वाणी और कृष्ण की गीता का ज्ञान इसकी उत्कट गंध है। रामायण हमारा क्षीर सागर है। दमयंती, सावित्री, गार्गी और सीता इस भूमि के उदर से उत्पन्न हुई। कणाद

, कपिल, भास्कर, आर्यभट्ट, वराहमिहिर इत्यादि अन्वेषक, गौतम, महावीर, शंकर, रामानुज, नानक, दयानंद, विवेकानंद सरीखे धर्मवेत्ता इस धरती की यशगाथा से दिग्विजयी धर्मसम्राट बन गये। चित्तौड़ के प्रताप, बुंदेला के छत्रसाल, बंगाल के प्रतापादित्य, रामगढ़ के शिवा, पूना के पेशवा, पानीपत का रक्षा मैदान, सिंहगढ़ की खड़ी चट्टान, ज्ञानेश्वर की लेखनी, बिठोवा भक्त रामदास योद्घा हों या तत्ववेत्ता, शास्त्रविद् अथवा कवि, देशभक्त और राजनीति के धुरंधर सभी मिलकर जिसका स्तोत्र गा रहे हैं, उस महान भूमि का वंदन है, शत-शत अभिनंदन है।

इस प्रकार की उत्कृष्ट भाषण शैली और लेखन शैली में वीर सावरकर जी हमारा मार्गदर्शन कर स्वदेशी के माध्यम से 'राजनीति का हिंदूकरण' कर रहे थे।

गांधी जी का स्वदेशी अभियान

गांधीजी भी स्वदेशी के समर्थक थे। वह भी चाहते थे कि देश के लोग अपने देश के बने सामान का प्रयोग करें। अपने देश के प्राचीन गौरव को प्राप्त करें, और देशप्रेम की भावना को अपनाकर राष्ट्रीय एकता के प्रति समर्पित हों। गांधीजी देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के पूर्णत: आत्मनिर्भर बनने के भी समर्थक थे। गांधीजी का 'स्वदेशी आंदोलन' एक आध्यात्मिक आंदोलन था जिसके माध्यम से वह सभी जीवधारियों में आध्यात्मिक एकता स्थापित करना चाहते थे। उनका यह चिंतन अच्छा था। गांधीजी आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में 'स्वदेशी' को बढ़ावा देते रहे, पर इस सबके उपरांत भी उनका स्वदेशी अभियान या स्वराज्य की परिकल्पना देश में राजनीति के हिंदूकरण की समर्थक नही थी। यही कारण है कि गांधीजी के भाषणों में या लेखन में भारत में अपनी स्वदेशी और स्वराज्य की परिकल्पना को साकार रूप देने के लिए उनकी स्पष्टता और उत्कृष्टता का सहारा नही लिया-जितनी स्पष्टता या उत्कृष्टता को सावरकर जी ने अपनाया। सावरकर जी सीधे 'जयहिंदू राष्ट्र' कहते थे और ऐसा कहने में उन्हें गौरव की अनुभूति होती थी। पर गांधीजी कभी 'जयहिंदू राष्ट्र' नही कह पाये थे।

नेहरूजी का दोगलापन

गांधीजी अपने ही सिद्घांतों और नीतियों पर अस्पष्ट रहे उनके दोगलेपन को उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी पंडित नेहरू ने और भी अधिक गंदला कर दिया। गांधीजी जहां जातिविहीन, शोषणविहीन और वर्गविहीन समाज की संरचना को लेकर कुछ करना चाहते थे-उनके उत्तराधिकारी नेहरूजी ने उनके इस विचार को और भी अस्पष्ट कर दिया या फिर इसे भाषणों में तो अपनाया पर वास्तव में इसके विपरीत ही आचरण करते रहे। उन्हें 'राजनीति के हिंदूकरण' से घोर घृणा थी, क्योंकि नेहरूजी अपने आपको 'दुर्घटनावश बना हिंदू' मानते थे। इसलिए उन्होंने सावरकर जी की बात को तो छोडि़ए अपने आदर्श गांधीजी के 'हिन्दुत्व' को भी मानने से इंकार कर दिया।

'इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका' कहती है-''सिद्घांतत: हिंदुत्व समस्त विश्वासों, श्रद्घारूपों और उपासना विधियों को समाविष्ट करता है, इसी कारण हिंदुत्व सभ्यता भी है और धार्मिक मान्यताओं का एक विराट संपुंजन भी है।''

किसने बंटवाया देश

हमारे शत्रु लेखकों या संस्थानों की हमारे विषय में ऐसी अच्छी सोच हो सकती है, परंतु दुर्भाग्य की बात रही है कि गांधीजी या उनके प्रिय शिष्य नेहरूजी की अपने विषय में ऐसी सोच नही थी। इन लोगों ने धर्म को देश से अलग करके देखने के लिए देशवासियों को प्रेरित किया। फलस्वरूप धर्म के आधार पर देश बंट गया। अपने धर्म (संप्रदाय) के प्रति समर्पित लोग देश बंटवा गये और अपने धर्म से विमुख होकर पीठ फेरकर खड़े होकर तत्कालीन नेताओं ने धर्म के आधार पर देश के बंटवारे को मान्यता दे दी। उसके उपरांत भी हमें हमारे नेता आज तक यही उपदेश देते आ रहे हैं कि राजनीति और धर्म का कोई मेल नही है। अब इन्हें कौन समझाये कि राजनीति और धर्म का मेल करके ईसाई लोग विश्व में अपने मत के 76 देश बनाने में और मुस्लिम 54 देश बनाने में सफल हो गये। जिनके पास एक भी देश नही था-वे आज विश्व में 76 और 54 देशों के स्वामी बन गये और जिनके पास संपूर्ण भूमंडल था वे आज सिमटकर एक देश में कैदकर दिये गये हैं।

ऐसे में गांधीजी के शिष्य नेहरूजी का राजनीति और धर्म को अलग-अलग करके देखने का प्रवचन देशघाती सिद्घ हुआ। दुख की बात है कि हिंदू इस प्रवचन को अपने लिए 'ब्रह्मवाक्य' मानकर कार्य करते रहे। पर आज तो देश जागरण का समय है, अतीत की भूलों के प्रक्षालन का समय है-इसलिए सही दिशा में ठोस कार्य किया जाना अपेक्षित है।

 'हमें देशभक्ति चाहिए देश विभक्ति नही।'

यह स्थिति भी चिंतनीय है कि देश में देशभक्त बढ़ रहे हैं और देश घट रहा है। ऐसे में 'हमें देशभक्ति चाहिए देश विभक्ति नही।' राजनीति का हिंदूकरण करके हम इस स्थिति को सहज रूप में प्राप्त कर सकते हैं।

राजनीति के हिंदूकरण से घृणा करने वालों ने और देश विभक्ति में विश्वास करने वालों ने देश को बांटने और तोडऩे का क्रम निरंतर अपनाये रखा है। सन 1911 ई. तक श्रीलंका भारत का भाग था, सन 1935 तक बर्मा भी भारत का अंग था। 1947 ई. तक एक तिहाई भाग धरती पाकिस्तान को, चार माह बाद एक तिहाई कश्मीर फिर पाकिस्तान को, सन 1950 में तिब्बत चीन को, सन 1954 में बेरूवाड़ी पूर्वी पाकिस्तान को, सन 1962 में 65 हजार वर्गमील भूमि चीन को, सन 1972 में कच्चा टीबू द्वीप श्रीलंका को, सन 1984 में अरूणांचल का बड़ा क्षेत्र चीन को, सन 1993 में तीन बीघा क्षेत्र बांग्लादेश को भूदान में दिया। 'राजनीति का हिंदूकरण' देश की इस दर्दनाक विभक्ति के प्रति हमारे भीतर आक्रोश उत्पन्न करता और हमारे नेतृत्व के प्रति देश में नकारात्मक परिवेश बनाता, पर हमें तो धर्मनिरपेक्षता की अफीम देकर सुला दिया गया और हमारे नेता लग गये देश की 'शल्य चिकित्सा' करने में। यह लोग देश के अंग काटते रहे और गिद्घों के सामने फेंकते रहे। किसी ने कुछ नही कहा, क्योंकि देश की चेतनाशक्ति (राजनीति का हिंदूकरण) को सुन्न कर उसे 'शून्य' में धकेल दिया गया था।

देशभक्ति को पुरस्कार दो और देशभक्ति का तिरस्कार करो

'राजनीति का हिंदूकरण' हमारे देशवासियों को बताता है कि देशभक्ति को पुरस्कार दो और देशभक्ति का तिरस्कार करो। गांधीजी 'देशभक्ति' के समर्थक हों या न हों पर वे सदा देशविभक्ति के कार्यों में संलिप्त रहने वालों की 'जी हुजूरी' में लगे रहे और देश बंटवाते रहे। वह संकट से सावधान रहकर भी सही समय पर आंख बंद कर लेते थे, जबकि सावरकर संकट के प्रति चौकन्ने रहते थे और समय आने पर अपनी सामथ्र्य भर उसका प्रतिरोध भी करते थे। देशविभक्ति की प्रक्रिया को रोकने के लिए उन्होंने राजनीति के हिंदूकरण की बात कही और इसमें भी एक बात और जोड़ दी कि हिंदुओं का (भारत के प्रति समर्पित हर देशवासी का) सैनिकीकरण भी किया जाए।

भारत उपमहाद्वीप नही

अंग्रेजों ने भारत को एक उपमहाद्वीप के रूप में पढ़ाया और समझाया। उसका अभिप्राय था कि भारत एक महाद्वीप होने के कारण विभिन्न देशों से बना है। जिसका अभिप्राय है कि यदि ये देश समय आने पर अलग भी होना चाहें तो हो सकते हैं।

इस गहरे षडय़ंत्र को असफल करने के लिए सावरकर जी उन व्यक्तियों में से थे जिन्होंने 'भारत को एक राष्ट्र' मानने का उद्घोष किया, और इसे एक उपमहाद्वीप मानने से इंकार कर दिया। जबकि गांधीजी और नेहरूजी इसे आजीवन एक उपमहाद्वीप ही मानते रहे। वे दोनों ही ना तो 'देशभक्ति' मेें लगी शक्तियों के मंतव्य को समझ पाये और ना ही एक देश और एक उपमहाद्वीप के मध्य कोई अंतर ही कर पाये। 'हिंदूनिष्ठ राजनीति' इस अंतर को समझती है और इसे समाप्त करने के लिए देश के संविधान में भी अपेक्षित संशोधन करने की पक्षधर है।

संविधान में परिवर्तन की आवश्यकता

'हिन्दूनिष्ठ राजनीति' की मांग है कि संविधान में भारत के स्थान पर 'हिंदू राष्ट्र' शब्द का प्रयोग किया जाए। क्योंकि हमारे वेदों में भी 34 स्थानों पर राष्ट्र शब्द का उल्लेख किया गया है। जब राष्ट्र ही नही रहेगा तो राष्ट्रीयता और राष्ट्रभक्ति की भावना देश की भावी पीढिय़ों में कैसे जागृत की जा सकेगी? गांधीजी वेद की राष्ट्रीयता को संभवत: समझ ही नही पाये, यदि वह वेद की राष्ट्रीयता को समझ गये होते तो उनकी अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य आदि की नीतियों का वही धर्म होता जो इस देश को कभी ना तो बंटने देता और ना ही यहां राष्ट्रघाती लोगों को सिर उठाने देता।

गांधीवादियों ने देश में राष्ट्रवाद को हिंदुत्वनिष्ठ राजनीति का पर्याय मानकर इसे भी उपेक्षित करने का प्रयास किया है। यही कारण है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 1 से लेकर 50 तक जहां अधिकारों का वर्णन है वहां राष्ट्र कही नही है। अनुच्छेद 51 में जहां नागरिकों के कत्र्तव्यों का उल्लेख किया गया है वहां राष्ट्र और राष्ट्रीयता की आवश्यकता स्वीकार की गयी है। जबकि उचित तो यही होता कि ये शब्द संविधान की प्रारंभिक धाराओं में ही-स्पष्ट करके रखे जाते। इस देश की मूल संस्कृति जिसे संविधान में 'सामासिक संस्कृति' के नाम से अभिहित किया गया है-को प्रोत्साहित करके हेतु वैदिक धर्म की शिक्षा को अनिवार्य करने का प्राविधान संविधान की प्रारंभिक धाराओं में ही होना अपेक्षित था। पर इस प्राविधान को ना करके संविधान के अनुच्छेद 28 (1) में प्राविधानित किया गया है कि राज्य विधि से पूर्णत: पोषित किसी शिक्षा संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नही दी जाएगी। जबकि यही अधिकार 'अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण' के नाम पर धारा 29 में ईसाई व मुस्लिम आदि अल्पसंख्यक संस्थाओं को अपनी धार्मिक (साम्प्रदायिक) शिक्षा देने का अधिकार दिया गया है।

व्यापक सुधारों की संभावना है

'हिंदूनिष्ठ राजनीति' में शिक्षकों के कल्याण के लिए उनकी नियुक्ति का अधिकार 'हिंदू प्रबंध मण्डल' को दिया जाना अपेक्षित है। हिंदुओं के धर्मांतरण को पूर्णत: गैरकानूनी घोषित किया जाना चाहिए क्योंकि ंिहंदुओं का धर्मांतरण देश 'विभक्तिकारी शक्तियों' को बल प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त देश में 'समान नागरिक संहिता' को लागू कराये जाए। 10 मई 1995 को सर्वोच्च न्यायालय ने देश में समान नागरिक संहिता लागू करने हेतु प्रधानमंत्री को निर्देश दिया था। न्यायालय का मानना था कि यह संहिता देश के सभी सम्प्रदायों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।

राजनीति के हिंदूकरण में देश के संविधान के अनुच्छेद 48 के अनुसार पूर्ण गोहत्या बंदी को लागू कराना अनिवार्य है। अनुच्छेद 120, में हिंदी को राजभाषा बनाया जाना अपेक्षित है। भारत की संसद में संविधान के अनुच्छेद 331 के अनुसार देश का राष्ट्रपति दो एंग्लो भारतीय समुदाय के लोगों को लोकसभा में मनोनीत कर सकता है।

यह व्यवस्था उचित नही है। इसी प्रकार अनुच्छेद 333 की वह व्यवस्था भी अनुचित है-जिससे किसी प्रांत का राज्यपाल एंग्लो भारतीय समुदाय के लोगों को नामित करने की शक्ति रखता है। मेघालय, मिजोरम आदि ईसाई बहुल प्रांतों में यदि कोई हिंदू चुनकर विधानसभा में न जा सके तो वहां के राज्यपाल को ऐसी परिस्थिति में किसी हिंदू को राज्य विधानसभा के लिए नामित करने की शक्ति नही है। इतना ही नही अंग्रेजों ने अपने समुदाय के लोगों के लिए नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था अनुच्छेद 336 (1) 336 (2) में की। अनुच्छेद 337 में उन्हेांने अपने लिए शैक्षिक अनुदान लेने की व्यवस्था करायी। सावरकरजी ऐसी व्यवस्थाओं को 'देशविभक्ति' का प्रयास मानते थे और गांधी जी या नेहरू जी इनके समर्थक थे। समय ने सिद्घ कर दिया है कि सावरकर जी का चिंतन ही देश के अनुकूल और ठीक था।

क्रमश: