लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु पर उठी शंका और आशंकाएं

  • 2016-08-25 11:00:11.0
  • रोहताश सिंह आर्य
लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु पर उठी शंका और आशंकाएं

दक्षिण भारतीय ज्योतिष के अनुसार शास्त्री जी जून 9, 1964 को भारत के प्रधानमंत्री बने। दूसरी भविष्यवाणी कुछ और ढंग की थी। दूसरी भविष्यवाणी सत्य न बने अत: ललिता देवी सदा साथ ही रहती थीं, किन्तु ताशकंद यात्रा के समय ललिता देवी साथ न रह सके एक अपवाद था, बड़े पुत्र अनिल शास्त्री अपने पिता लालबहादुर शास्त्री के साथ ताशकंद यात्रा पर जाने वाले थे, किन्तु उसकी यात्रा भी टाल दी गयी।

देश के अधिकतर नागरिक मानते हैं कि कोई षडय़ंत्र द्वारा शास्त्रीजी का अंत कर दिया गया। उनकी ऐसी कुछ शंकाओं का कारण भी है। जिन पर हमें चिंतन करना चाहिए। जैसे-

निधन के पश्चात शास्त्री का शरीर हरा रंग का हुआ तो रशियन डॉक्टरों ने कहा कि मृतदेह के जतन के लिए स्पिरिट , फोर्मालीन एवं यूरोट्रोपीन के रसायन के कारण हरा हो गया , वास्तव में शास्त्रीजी की मृत देह का हरा रंग हो जाने का कारण वह नही था, जो हमें बता दिया गया था।

दूसरी आशंका यह है कि जब लाल बहादुर शास्त्रीजी का शव भारत में लाया गया तो उनके कुछ परिजनों व शुभचिंतकों के कहने के उपरांत भी उनके शव का परीक्षण नही किया गया। ताशकंद मे भारतीय प्रतिनिधि एवं शास्त्री जी का निवास

'इन टुरिस्ट होटल' में था, जब लालबहादुर शास्त्री भारत से ताशकंद पहुंचे तो वहां इनके जाते ही अचानक उनके ठहरने के स्थान में परिवर्तन कर दिया गया।

जबकि एक देश के प्रधानमंत्री के साथ ऐसा कभी नही होता। उन्हें ताशकंद आगमन के 24 घंटे के पश्चात होटल से 500 मीटर दूर एक भवन में स्थानांतरित किया गया। लालबहादुर शास्त्री जी के ठहरने के स्थान में किये गये इस अप्रत्याशित  परिवर्तन को लेकर भारतीय सुरक्षाधिकारी ने आपत्ति जताई तो रशिया ने न सुनी।

अगली आशंका है कि लालबहादुर शास्त्री जी अपने जिस शयन कक्ष में सो रहे थे उसमें उनकी शैया के पास कॉलबेल नहीं रखी गयी, फोन दूसरे कक्ष में था जो दूर था।

रूसी लोग जानते थे कि शास्त्रीजी को पूर्व में दो बार सामान्य अटैक आ गया था तो भी कोई हृदय निष्णात पास न रखा। इतना ही नही कि उनके पास जीवन रक्षक औषधियों और जीवन रक्षक सामग्री को भी नही रखा गया था, जिससे किसी आपात स्थिति से निपटा जा सके।

आश्चर्यजनक बात तो यह है कि संयुक्त सचिव राजेश्वर प्रसाद की शोध अनुसार शास्त्री अंतकाल में पास एक पानी के जग की ओर संकेत कर रहे थे, सचिव ने समझा पानी-पीना है जब जग होठ पर लाया गया तो शास्त्री ने हाथ से धक्का लगाकर दूर किया ।

शंका कुशंका का कोई कदापि समाधान होने वाला ही नहीं-क्योंकि शव परीक्षण ही नहीं हुआ।  भारत ने कभी भी शव परीक्षण का आग्रह ही न रखा था ।