दीनदयाल उपाध्याय और भारतीय रह्वाजनीति

  • 2016-09-26 09:30:38.0
  • उगता भारत ब्यूरो
दीनदयाल उपाध्याय और भारतीय रह्वाजनीति

राकेश सिन्हा
क्या पंडित दीनदयाल उपाध्याय की महत्ता का कारण भारतीय जनता पार्टी का केंद्र में सत्तारूढ़ होना है? यह बात कई लोगों के मन में आना स्वाभाविक है क्योंकि इसके पूर्व ऐसे लोगों ने भाषणों और लेखों में छिटपुट रूप से उपाध्याय का जिक्र सुना होगा। दीनदयाल उपाध्याय पर किसी भी विमर्श में इस सवाल का जवाब अगर निहित नहीं है, तो उसकी प्रासंगिकता अपूर्ण रह जाएगी।  संघ की गतिविधियों से परे उनका सार्वजनिक जीवन मात्र सत्रह-अठारह (1950-1968) वर्षों का था। तब भारतीय राजनीति पर ही नहीं, देश के सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन पर भी कांग्रेस का प्रभाव था। दूसरी विचारधारा जो अपने उभार पर थी उसका नेतृत्व कम्युनिस्ट सोशलिस्ट पार्टियां कर रही थीं। दोनों का संयुक्त मतों का प्रतिशत सोलह फीसद के करीब 1962 के लोकसभा चुनाव में था। तीसरी श्रेणी हिंदू महासभा, राम राज्य परिषद और स्वतंत्र पार्टी जैसे दलों की थी।

इस राजनीतिक परिवेश और प्रतिद्वंद्विता के बीच दीनदयााल उपाध्याय ने जनसंघ को अलग वैचारिक पहचान दी। लेकिन उनके द्वारा वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति को स्थापित करना इससे कम महत्त्वपूर्ण नहीं था। इस प्रक्रिया में उन्होंने भारतीय समाज और राजनीति के व्यापक प्रश्नों को छूने का प्रयास किया था, जो उन्हें वर्तमान ही नहीं, पीढिय़ों के लिए भी प्रासंगिक बना देता है।
पूरी दुनिया में विचारधारा की लड़ाई में वामपंथ-दक्षिणपंथ का श्रेणीकरण (विभाजन) प्रभावी रहा है। इसने सामाजिक-आर्थिक प्रश्नों पर वैचारिक अस्पृश्यता, कट्टरता और विवेकहीन राजनीतिक संघर्ष की संस्कृति को जन्म दिया है। यह यूरोप के राजनीतिक अनुभवों और विकास की प्रक्रिया से उपजी अवधारणा थी, जिसे भारतीय राजनीति के शैक्षणिक और वैचारिक क्षेत्र में अंधभक्ति के आधार पर स्वीकार कर लिया गया था। जनसंघ की स्थापना के बाद उसे भी एक नए दक्षिणपंथी संगठन के रूप में देखा गया।

दीनदयाल उपाध्याय संभवत: पहले भारतीय राजनीतिक विचारक थे, जिन्होंने वाम-दक्षिण विभाजन को कृत्रिम और लोकतांत्रिक विकास में बाधक मान कर अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कम्युनिस्टों के आयातित विचार को अभारतीय करार दिया तो हिंदू महासभा, राम राज्य परिषद और स्वतंत्र पार्टी के जनसंघ के साथ विलय को भी खारिज कर दिया। यह विलय भी तब लगभग सोलह प्रतिशत से अधिक मतों का हकदार बन जाता। उपाध्याय के लिए राजनीतिक अस्तित्व से अधिक राजनीतिक अस्मिता महत्त्वपूर्ण थी। इसका परिचय तो उनके प्रभाव में जनसंघ ने 1953 में ही दे दिया था। राजस्थान में जागीरदारी उन्मूलन विधेयक लाया गया था। जनसंघ के पास विधानसभा में आठ विधायक थे। उनमें छह विधायक इस विधेयक के विरोधी थे। उसके सामने यह कठिन प्रश्न था। छह विधायकों को पार्टी से निकाल दिया गया। वे विचार को कर्मकांड नहीं मानते थे। इसलिए जब दलों के विलय का प्रश्न आया तो उन्होंने मौलिक वैचारिक प्रश्नों को उनके सामने रखा।
हिंदू महासभा से उन्होंने पूछा कि जिन कारणों से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उससे अलग हुए थे, क्या वे कारण समाप्त हो गए?

वह कारण था गैर-हिंदुओं के महासभा में प्रवेश का। विलय का यह प्रस्ताव स्वयमेव ही निरस्त हो गया। इसी प्रकार उन्होंने राम राज्य परिषद के 'सामाजिक यथास्थितिवाद' के सिद्धांत को जनसंघ के दृष्टिकोण के प्रतिकूल मानते हुए कहा कि 'राम राज्य परिषद करपात्रीजी की कुटिया से नहीं संचालित होकर महलों से संचालित होती है।' स्वतंत्र पार्टी के साथ जनसंघ के विलय का लंबा प्रयास चला। पर स्वतंत्र पार्टी की आर्थिक विचारधारा से उपाध्याय पूर्ण रूप से असहमत थे। उन्होंने कहा कि यह 'दलाल स्ट्रीट की पार्टी' मानी जाती है और जिन कारणों और कार्यक्रमों की बुनियाद पर इसकी स्थापना हुई वह जनसंघ की विचारधारा से मेल नहीं खाती है।

वे कम्युनिस्टों के पूर्ण राष्ट्रीयकरण और स्वतंत्र पार्टी के पूर्ण बाजारीकरण दोनों को अव्यावहारिक और वैचारिक कट्टरता मानते थे। इक्कीसवीं शताब्दी में दुनिया के चिंतक वामपंथ-दक्षिणपंथ विभाजन को भ्रमित करने वाला और अनुपयोगी मानने लगे हैं। उपाध्याय ने नया श्रेणीकरण किया था, वह था 'परिवर्तनेच्छु' और 'अपरिवर्तनेच्छु'। यानी वे जो सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के समर्थक हैं और दूसरा जो यथास्थितिवादी हैं। उन्होंने दिसंबर, 1967 में कालिकट (केरल) में जनसंघ के अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि सामाजिक-आर्थिक समानता की लड़ाई पर किसी विचारधारा का एकाधिकार नहीं है। उन्होंने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और समानतामूलक समाज का एक मजबूत वैचारिक धरातल जनसंघ को प्रदान किया था।

स्वतंत्रता के बाद सत्ता तो हस्तांतरित हुई, पर राजनीतिक संरचना और सोच अपरिवर्तित रही। उपाध्याय ने इसका कारण माना कि किसी भी प्रकार की सोच-समझ या विचार के प्रतिपादन में यूरोप केंद्रित रहने की हमारी आदत बन गई है। राजनीति को वे अपने आप में स्वायत्त नहीं मानते थे। राजनीति का जब संस्कृति, समाज और आध्यात्म से जीवंत संबंध होता है, तभी वह राजनीति उद्देश्यमूलक और संवेदनशील हो सकती है। जो प्रशासनिक और विकास की संरचना जनजातियों के लिए आवश्यक है, वही संरचना दूसरे वर्ग के लिए आवश्यक हो यह जरूरी नहीं है। गांव की विषमता और जाति की जड़ता को समाप्त करने के लिए नई भागीदारी युक्त प्रशासनिक संरचना पर उन्होंने जोर दिया। वे मूलत: व्यवस्था परिवर्तन के हिमायती थे।

राजनीतिक जीवन से बाहर रह कर आदर्श की बात करना आसान है और उसके केंद्र में रह कर आदर्श पर अडिग रहना कठिन है। राजनीति में चुनाव अग्निपरीक्षा के समान होता है, जिसमें सामाजिक यथार्थ और भविष्य के समाज की कल्पना के लिए बनाए गए आदर्शों के बीच टकराव होता है। इस संदर्भ में 1963 में चार लोकसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में उपाध्याय की भूमिका उल्लेखनीय है। विपक्ष के चार दिग्गज कांग्रेस को चुनौती दे रहे थे। ये थे राजकोट से स्वतंत्र पार्टी के मीनू मसानी, उत्तर प्रदेश में फर्रूखाबाद से समाजवादी राममनोहर लोहिया, अमरोहा से जेबी कृपलानी और जौनपुर से दीनदयाल उपाध्याय।

लोहिया 1962 के चुनाव में नेहरू के खिलाफ फूलपुर से चुनाव लड़ चुके थे। नेहरू डॉ. लोहिया और कृपलानी को संसद में आने से रोकने के लिए कटिबद्ध थे। तब दीनदयाल उपाध्याय ने नेहरू और कांग्रेस की एकाधिकार प्रवृत्ति, 'एक दल, एक नेता, एक सिद्धांत' को लोकतंत्र के लिए घातक माना। लोहिया जैसे राष्ट्रीय नेता को जाति के आधार पर अपना क्षेत्र चुनना पड़ा। इस पर क्षोभ प्रकट करते हुए वे उनके समर्थन में प्रचार करने गए। नेहरू ने कृपलानी को पराजित करने के लिए 'वोट बैंक' की राजनीति का श्रीगणेश अमरोहा से ही किया था। कांग्रेस की जिला समिति से लेकर संसदीय समिति ने रामशरण को अपना उम्मीदवार बनाया, तो नेहरू ने अंतिम समय में दलीय फैसले को नजरअंदाज करते हुए अपने कैबिनेट के सिंचाई एवं ऊर्जा मंत्री हाफिज मोहम्मद इब्राहिम को उम्मीदवार बना दिया।

उपाध्याय ने कृपलानी की जीत को जनसंघ की नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए उनका चुनाव एजेंट तक जनसंघ के नेता रमेश कुमार को बनाया। वे स्वयं राजनीति को तात्कालिक सफलता-विफलता के आईने में नहीं देखते थे। जहां जातिविहीन समाज के प्रवक्ता डॉ. लोहिया जातीय समीकरण के आधार पर फर्रूखाबाद से चुनाव लड़ रहे थे वहीं दीनदयाल उपाध्याय ने जौनपुर में अपने पक्ष के जातीय समीकरण को स्वयं ही अपना विरोधी बना लिया। क्योंकि वे सभाओं में जाति के आधार पर मतदान की निंदा करते हुए उन लोगों से चले जाने की अपील करते थे, जो जाति के आधार पर उनका समर्थन करने आते थे। साठ के दशक के सामंती और यथास्थितिवादी समाज के लिए यह व्यवहार अपच का कारण बना।

राजनीति उनके लिए न कैरियर था, न ख्याति का साधन था और न ही ताकत हासिल करने का उपकरण। वे जातिवाद मुक्त राजनीति के प्रवक्ता के रूप में चुनाव में थे। वे गरीब, किसान, मजदूर और हाशिए के लोगों के उत्थान की बात कर रहे थे और सामंती संस्कृति पर प्रहार भी कर रहे थे। जौनपुर की सीट जनसंघ के ही सांसद की मृत्यु के कारण खाली हुई थी। उन्होंने अपने आदर्शवादी यथार्थ को व्यावहारिक यथार्थ के सामने झुकने नहीं दिया। वे हार गए और संदेश दिया कि 'दीनदयाल हार गया, जनसंघ जीत गया'। वे जीतते तो जौनपुर का चुनाव उल्लेखनीय नहीं होता। वे जिन कारणों और जिस उद्देश्य से हारे उससे यह चुनाव भारतीय राजनीति के इतिहास में रेखांकित हो गया। भले ही राजनीति आज जातीय सांप्रदायिक समीकरणों के दलदल में फंसी हुई है, पर जौनपुर का चुनाव उस बीज की तरह भारतीय उपचेतना में विद्यमान है, जो राजनीति को इस दलदल से निकालने का संकल्प था।

अगर इस सिद्धांत मूल्यों के अध्येता उपाध्याय भारतीय विमर्श का हिस्सा बन पाए तो उसका कारण वे नहीं, बल्कि सर्वसमावेशी होने का ढोंग करने वाली नेहरूवादी-वामपंथी बौद्धिकता रही है, जिसने विमर्श और अध्ययन के क्षेत्रफल को संकुचित और संकीर्ण बनाने का काम किया है। मानवेंद्रनाथ राय का 'रैडिकल ह्यूमनिज्म' तो पाठ्यक्रमों का हिस्सा बना, पर अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष के आधार पर जीवन दर्शन को संपूर्णता में देखते हुए जिस एकात्म मानववाद का प्रतिपादन उपाध्याय ने किया, उसका उल्लेख भी आवश्यक नहीं समझा गया।

उपाध्याय का विचार और व्यक्तित्व की विलक्षणता को इसी से समझा जा सकता है कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी 'पोलिटिकल डायरी' का जब प्रकाशन हुआ तब उसका प्राक्कथन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता संपूर्णानंद ने लिखा था। संपूर्णानंद ने उनके विचारों में भारतीय लोकतंत्र और राजनीति में परिष्कार का बोध देखा। उनकी पोलिटिकल डायरी पढ़ कर समकालीन भारतीय राजनीति की लघुता का बोध स्वयमेव हो जाता है। क्या उनके राजनीतिक जीवन दर्शन को भारतीय लोकतंत्र और राजनीति की आलोचनात्मक समझ के दायरे से बाहर रखना अनुपयुक्त नहीं था?