भारत माता की जीभ उखाडऩे वाले राष्ट्रद्रोही क्यों नही?

  • 2016-09-29 11:00:36.0
  • आचार्य दिवाकर
भारत माता की जीभ उखाडऩे वाले राष्ट्रद्रोही क्यों नही?

अभी पिछले दिनों भारत माता की जय बोलने या न बोलने पर देश में एक बड़ी चर्चा चली। स्वामी रामदेव जी ने तो मंच से इस बात की चर्चा कर दी कि भारत माता की जय न बोलने वाले राष्ट्रद्रोही हैं, इनकी गर्दन भी काट दी जानी चाहिए। निश्चित रूप से राष्ट्रद्रोहियों को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए। किंंतु मैं  विश्वहिन्दू परिषद, भाजपा एवं भाजपा की सरकार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वामी रामदेव जैसी संस्थाओं और व्यक्तियों से यह पूछना चाहता हूं कि जो लोग एक ओर भारत माता की जोर जोर से जय बोलते हैं और भीतर-भीतर भारत मां की जीभ उखाड़ रहे हैं, मातृभाषा हिन्दी  का गला घोट रहे हैं और भारतीय भाषाओं के साथ भारतीय संस्कृति को भी जड़ से उखाड़ रहे हैं, उनका क्या होगा? 

मेरा संकेत गांव, गली, देहात, नगर-नगर अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूल खोलकर हिंदी एवं संस्कृत भाषा का विनाश कर रहे लोगों की ओर है। मातृभाषा की बजाए अंग्रेजी भाषा में सारे विषय पढ़ाकर उनकी मातृभाषा की जानकारी देने के बजाए उन्हें अंग्रेजी भाषा में पढऩे के लिए मजबूर कर रहे हैं। क्या यह भारत मां के नौनिहालों पर अत्याचार नही है? क्या यह राष्ट्रभाषा ंिहन्दी की जड़ उखाडऩे का काम नही है? क्या भाजपा की केन्द्र सरकार  और राष्ट्रवादी लोगों की प्रांतीय सरकारें शिक्षा माफियाओं के इस खेल से अनभिज्ञ हैं? पैसा कमाने के लालच में ये शिक्षा माफिया अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खोलकर भारतवासियों को लूट कर रहे हैं। गरीब आदमी तो अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेजने का साहस ही नही करता। मध्यमवर्ग के लोग भी शिक्षामाफियाओं द्वारा चलाये जा रहे इन पब्लिक स्कूलों की फीस के नीचे दबे जा रहे हैं, चीख रहे हैं, चिल्ला रहे हैं। बड़े-बड़े धरने-प्रदर्शन  एवं आंदोलन कर रहे हैं, पर केन्द्र सरकार और प्रांतीय संस्कारों के कानों पर जूं नही रेंग रही।
अब छात्र-छात्राओं के अभिभावकों ने अदालतों की शरण ली है। अदालतें सुन भी रही हंै। पब्लिक स्कूलों में एक-एक छात्र की शिक्षा पर इतना व्यय आता है कि इतना तो इंजीनियरिंग की पढ़ाई पर भी नही आता। 'अमर उजाला' दो साल पहले ही ये सब आंकड़े एवं अभिभावकों की कठिनाई उजागर कर चुका है। किंतु इसका कोई स्थायी हल नही निकला। शिक्षा व्यवसाय लूट का एक माध्यम बन गया है जिसमें विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं आर्यसमाज जैसी राष्ट्रवादी संस्थाओं के लोग भी संलिप्त हैं। मैं उन सभी शिक्षामाफियाओं से कहना चाहता हूं कि शिक्षा कमाई का क्षेत्र नही, दान का क्षेत्र है। शिक्षा दान की वस्तु है , यही भारत की परंपरा रही है।

मैं 1980 के दशक में एक दिन अपने मित्र श्री प्रेमपालसिंह यादव से मिलने उनके आवास गांव सुल्तानपुर दक्षिण दिल्ली गया। प्रेमपालजी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं भाजपा के दिल्ली प्रदेश के कर्मठ कार्यकत्र्ता हैं। इसी आधार पर उन्हें कासगंज संसदीय सीट से टिकट मिला और वे सांसद का चुनाव लड़े। मैं उनके आवास के सामने 'श्याम पब्लिक स्कूल' के कार्यालय में बैठा था-विद्यालय का खुलने का समय हो गया। छात्र-छात्राएं अंग्रेजी वेशभूषा, टाई शूटबूट पहन कर आने लगे। जब छात्रों ने घुसते ही गुडमॉर्निंग कहके हम लोगों का अभिवादन किया तो मुझे बड़ा दुख एवं आश्चर्य हुआ, मुझे ऐसा लगा कि मैं लंदन के किसी अंग्रेजी स्कूल में बैठा हूं। मैंने अपने मित्र से पूछा-आप तो राष्ट्रवादी भारतीय संस्कृति के संगठनों से जुड़े हैं। आपके विद्यालय में यह क्या हो रहा है? वे थोड़ी देर चुप रहे फिर बोले-यदि हम यहां वेशभूषा एवं भाषा का अंग्रेजी भाषा का परिवेश न बनायें तो कोई छात्र यहां पढऩे नही आएगा, फिर बोले आप आर्य समाज के जिला एटा के अध्यक्ष रहे हैं, आपको याद होगा-हमारे सुल्तानपुर में एक बड़ा डीएवी स्कूल है। मैं अपनी बेटी को कक्षा 9 में प्रवेश दिलाने के लिए इस आशा से लेकर गया कि इसको मातृभाषा हिंदी का अच्छा ज्ञान हो जाएगा। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि उस डीएवी स्कूल में न तो हिन्दी विषय था और न हिंदी माध्यम। 

पाठकों की जानकारी के लिए  मैं  यह बता दूं कि पूर्वोत्तर भारत में डीएवी स्कूलों की अनेक शाखाएं हैं, किंतु उनमें सब जगह अंग्रेजी माध्यम है किंतु ईसाईयों के स्कूलों में हिंदी माध्यम भी है और हिंदी विषय भी। ये राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोग जो राष्ट्रभाषा हिंदी को मिटाने में लगे हैं क्या ये राष्ट्रद्रोही नही हैं? 

भाजपा की केन्द्र सरकार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद हिंदू महासभा एवं आर्यसमाज जो संस्कृत भाषा, राष्ट्रभाषा हिंदी और भारतीय संस्कृति के बड़े पहरेदार बनते हैं-उन्हें राष्ट्रद्रोह के इस कुकृत्य को तुरंत बंद करना चाहिए नही तो 'भारत माता की जय' बोलने से क्या होगा।

मैं इस लेख के माध्यम से यह भी बता दूं कि भारत 'सोने की चिडिय़ा' था तो वह अंग्रेजियत, अंग्रेजी भाषा या विदेशी कंपनियों के कारण नही था।  इतना ही नही भारत विश्व का प्रशासक था-चक्रवर्ती शासक था, महर्षि दयानंद लिखते हैं :-'यह आर्यावर्त देश ऐसा देश है-जिसके सदृश भूगोल में दूसरा कोई देश नही है।

सृष्टि से लेके पांच सहस्र वर्षों से पूर्व समय पर्यन्त आर्यों का सार्वभौम चक्रवर्ती अर्थात भूगोल में सर्वोपरि एकमात्र राज्य था। जब रघुकुल के राजा थे तब रावण भी यहां के आधीन था। जब रामचंद्र के समय में विरूद्घ हो गया तो उसको रामचंद्र ने दण्ड देकर राज्य से नष्ट कर उसके भाई विभीषण को राज्य दिया था।''
यह विश्व गुरू भी था महर्षि मनु की आज्ञा थी-
एतद्देशस्य प्रसूतस्य सकाशाद अग्रजन्मन:।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन पृथिव्यां सर्वमानवा:।। मनु.
अर्थात इसी आर्यावत्र्त देश में उत्पन्न हुए ब्राह्मण अर्थात विद्वानों से भूगोल के सब मनुष्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, दस्यु, म्लेच्छ आदि सब अपने-अपने योग्य विद्या, चरित्रों की शिक्षा और विद्याभ्यास करें। (सत्यार्थ प्रकाश एकादश समुल्लास)
स्वतंत्रता से पूर्व महर्षि दयानंद ने वेदज्ञान की  प्रतिष्ठा और संस्कृत के विद्या के महत्व को विश्व के सामने रख दिया था और ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन-अध्यापन के लिए एक विस्तृत पाठविधि वेदशास्त्रों के आधार पर निश्चित की थी जिसमें विषय में महर्षि दयानंद लिखते हैं :-
''जितनी विद्या इस रीति से तीस या चौंतीस वर्ष में हो सकती है उतनी अन्य प्रकार से शतवर्ष में भी नही हो सकती।'' ('सत्यार्थ प्रकाश' तृतीय समुल्लास)

मैकाले के मानस पुत्र लालची एवं प्रमादी आर्य समाजियों ने महर्षि दयानंद के इन उद्घोषों पर ध्यान नही दिया है, मैकाले द्वारा चलायी जाने वाली उसी अंग्रेजियत एवं अंग्रेजी भाषा को अपना लिया। कांग्रेस पार्टी या अन्य राजनैतिक दल राष्ट्र के शासन, प्रशासन में जहां कहीं रिश्वत, भ्रष्टाचार, लूट, राष्ट्रद्रोह, छीनाझपटी स्वार्थपरता और स्वछन्दता विद्यमान है वह इसमें आकंठ डूबे हुए हैं। महंगी और भोग्यवादी अपसंस्कृति को फैलाने वाली अंग्रेजी शिक्षा के द्वारा मिले कुसंस्कारों से भ्रष्टाचार में डूबे कई मुख्यमंत्रियों की सजा हो चुकी है। कई सचिव एवं मंत्री जेल के सीखचों में बंद हैं। स्कूल कालेजों के लडक़े यदि बहिन-बेटियों के जेवर लूट रहे हैं, राजनैतिक नेता देश की लूट रहे हैं तो उसमें लार्ड मैकाले की शिक्षा मूल कारण है। गुरूकुल शिक्षा पद्घति से दो ही ऋषि निकलकर आये हैं-स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण जो अहर्निश बिना किसी स्वार्थ के राष्ट्रसेवा में लगे हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी कहीं से अच्छे संस्कार लेकर आये हैं, जिन्होंने भ्रष्टाचार पर अपने स्तर पर रोक लगा दी है। यह शिक्षा एवं संस्कारों का परिणाम है। भोगवादी शिक्षा एवं संस्कारों का नारा है 'खाओ पियो और मौज उड़ाओ' और भारतीय संस्कृति की संस्कृत और हिंदी भाषा का नारा है 'सर्वे भवन्तु सुखिन:', 'आत्मवत सर्वभूतेषु य: पश्यति स: पश्यति।' इस बात की चेतना अब विदेशों में पहुंच रही है।