दोहरी चुनौती और हमारी तैयारी

  • 2016-09-14 06:30:42.0
  • उगता भारत ब्यूरो
दोहरी चुनौती और हमारी तैयारी

हर्षदेव
पंद्रह वर्ष पूरे हो गए जब आतंकवाद ने खूनखराबे का अंतर्राष्ट्रीय चेहरा ओढ़ लिया था। वो अन्य दिनों की तरह ही ताजगीभरी सुबह थी, जब 11 सितम्बर, 2001 को अमेरिका के वल्र्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन मुख्यालय पर सुनियोजित हमला हुआ और 2996 बेगुनाह नागरिक जान से हाथ धो बैठे। दहशत से सारी दुनिया कांप उठी। हर तरफ पांव पसारती इस पागलपनभरी हिंसा का मुकाबला करने के लिए तब से कितने ही कदम उठाए जा चुके हैं, लेकिन समूची इनसानियत को खून से रंगने की कमर कसे बैठे संगठित लोगों के कुछ गिरोह बर्बरता और क्रूरता के नए-नए तरीकों से भय और घबराहट का माहौल बनाने का रास्ता छोडऩे को तैयार नहीं हैं। इस अभिशाप से यूरोप के साथ-साथ एशियाई देश भी त्रस्त हो उठे हैं। यह स्थिति भारत को ज्यादा चिन्ता में डालती है क्योंकि दूसरे देशों की तुलना में उसकी चुनौती दोहरी है, जबकि तैयारी मजबूत भरोसा जगाने वाली नहीं है।

दरअसल, भारत को आतंकवाद का नासूर तभी से भोगना पड़ रहा है जब दूसरे देश इससे परिचित भी न थे। पूर्वोत्तर में स्वतंत्रता के समय से ही विभिन्न कबीलाई समुदाय आतंक का सहारा लेकर भारत से अलग होने की मांग करते आ रहे हैं। मिजो नेशनल फ्रंट नेता लालडेंगा ने 20 साल तक आतंक फैलाकर परेशान किया। 1986 में उसे अलग राज्य की मंजूरी भी मिल गई, किन्तु हिंसा बदस्तूर जारी है। यही स्थिति नागालैंड की है। उसे भी पृथक राज्य बनाया गया, लेकिन आज भी वह खूनखराबे में लिप्त है। इसी तरह असम सरकार में बोडो कबीलाई संगठन शामिल हैं, फिर भी 15 अगस्त से पहले उसके उग्रवादी संगठन को कोकराझार के भरे बाजार में हमला करके 14 निरीह नागरिकों को मौत की नींद सुलाने की जरूरत पड़ गई। जाहिर है, पूर्वोत्तर में चल रहा उग्रवाद का यह नासूर देश को अभी और लंबे समय तक तकलीफ देता रहेगा। पूर्वोत्तर राज्यों के ही निकट पड़ोसी पश्चिम बंगाल के नक्सलबारी गांव से देश के लिए एक और बेहद गंभीर चुनौती ने मई, 1967 में जन्म लिया। इस गांव के नाम पर यह चुनौती नक्सलवाद के रूप में सामने आई। आज देश के लगभग 100 जिलों में उसकी दहशत फैली हुई है। इस पूरे इलाके को हम रेड कॉरीडोर या लाल गलियारे के नाम से जानते हैं। अपनी ही शासन व्यवस्था के विरुद्ध एकजुट होकर किए जा रहे इस टकराव में मुख्यत: आदिवासी और बेहद गरीब ग्रामीणजन शामिल हैं। वहां का संघर्ष मुख्यत: जमीन और जंगल से आदिवासियों तथा ग्रामीणों को विस्थापित करने के विरोध में है।  इन चुनौतियों से निपटने के उपाय चल ही रहे थे कि 1970 के दशक में विदेश में पंजाब को खालिस्तान बनाने की मांग उठाने के साथ हिंसा के एक नए चेहरे ने जन्म लिया। खालिस्तान की मांग हर थोड़े अन्तराल पर सुनाई देती रहती है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पंजाब में अब भी आतंक के विरुद्ध निरंतर चौकसी और मुस्तैदी की आवश्यकता बनी हुई है।

भारत के लिए आतंकवाद की चुनौतियां इतने तक ही सीमित नहीं रही हैं। तमिलनाडु में भी कई दशक तक श्रीलंका के आतंकवादी गुट एलटीटीई (लिट्टे) ने राज्य के तमिलों को ही हिंसा का शिकार बनाया। और तो और, कांग्रेस नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को भी 21 मई, 1991 को उसी गुट की हिंसा का शिकार होना पड़ा। आतंकवाद की उस नई चुनौती के बारे में सभी जानते हैं, जिसने हमारे पड़ोस में ही जन्म लिया और जिसकी जहरीली शाखाएं इतनी फैल गई हैं कि सारी दुनिया सांसत में है। अपने देश में इस दहशत का सबसे खूंखार और कुरूप चेहरा हम 2008 में 26/11 को मुंबई पर पाकिस्तानी षड?्यंत्र के तहत भेजे गए कसाब तथा उसके नौ दूसरे साथियों के हमले के रूप में देख चुके हैं। इस कांड में 162 बेकसूर नागरिक मारे गए थे। कश्मीर भी खुद पाकिस्तान और उसके ही पाले-पोसे मास्टरमाइंड हाफिज सईद, सलाहुद्दीन और लखवी जैसे आतंकवादी सरताजों की वजह से ही अशांति और हिंसा से कराह रहा है। दहशत फैलाने के इस काम में पाकिस्तानी सेना की कुख्यात एजेंसी आईएसआई पूरी तरह शामिल है।