फिजूल विरोध की बंद मानसिकता

  • 2016-09-09 07:30:06.0
  • पीके खुराना
फिजूल विरोध की बंद मानसिकता

आज कहीं भी कोई बांध बनने लगे, बिजलीघर बनने लगे, टेलीकॉम कंपनी का टावर लगने लगे, सडक़ बनने लगे, नहर खुदने लगे, कहीं न कहीं से कोई न विरोधी जत्था निकल ही आता है। बात-बात पर संसद ठप हो जाती है, बंद का आयोजन होता है, दुकानें और बाजार बंद करवा दिए जाते हैं, तोड़-फोड़ शुरू हो जाती है, जैसे यह किसी विदेशी की संपत्ति हो। हड़ताल करना, रेल पटरियां उखाड़ देना, या ट्रैफिक जाम कर देना नेतागिरी चमकाने का तरीका बन गया है.

हिंदोस्तान की गुलामी के दौर में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई दो धाराओं में बंटी थी। एक तरफ गर्म धारा के लोग थे, जो अंग्रेजों का कोई भी अन्याय सहने को तैयार नहीं थे और दूसरी तरफ नरम धारा के लोग थे, जो बातचीत से, अहिंसक तरीके से, शांतिपूर्ण ढंग से अंग्रेजी सरकार से लोहा ले रहे थे। नरम धारा का नेतृत्व महात्मा गांधी कर रहे थे, जिन्हें बाद में कृतज्ञ राष्ट्र ने राष्ट्रपिता कहकर सम्मानित किया। अंग्रेजी सरकार सीधे-सीधे तो कुछ भी मानने को तैयार नहीं होती थी, अत: उसे मनाने के लिए गांधी जी ने अपने हथियार ईजाद किए और उनमें प्रमुख थे सत्याग्रह, अवज्ञा आंदोलन और बंद। गांधी जी का प्रसिद्ध दांडी मार्च शासन की नीतियों से असहमति का शानदार उदाहरण है। यह एक ऐसी नीति थी, जिसमें बिना किसी हिंसा के सरकार को जनता की शक्ति का भान कराया जा सकता था। गांधी जी ने संयमित ढंग से इन हथियारों का प्रयोग किया और इन्हें तुरुप का पत्ता बना डाला। वह गुलामी का दौर था, अंग्रेज आततायी थे। उन्होंने हमारे देश पर बलात कब्जा कर रखा था। अपनी बात मनवाने के लिए उनके शासन को कुंद करना देशभक्ति थी। तब लक्ष्य प्रमुख था, रास्ता कम महत्त्वपूर्ण था।

गुलामी का दौर गुजर चुका है, पर हम बहुत से तरीकों से गुलामी की मानसिकता से बंधे हुए हैं। जनता, नेता, अधिकारी, पुलिस, कर्मचारी, सभी वर्गों का बड़ा हिस्सा गुलामी के तौर-तरीकों को छोड़ नहीं रहा है, जिससे अलग-अलग समस्याएं पैदा हो रही हैं या बढ़ रही हैं। कर्मचारी जब चाहे हड़ताल पर चले जाते हैं, पुलिस अब भी जनता से ऐसे व्यवहार करती है मानो वह अंग्रेजों की पुलिस हो और जनता गुलाम, अधिकारीगण तो खुद को अंग्रेज ही मानते हैं और वे सर्वशक्तिमान बने बैठे हैं। राजनेता भी किसी से कम नही हैं और वे भी हर तरह से जनता को बेवकूफ बनाने में ही अपनी शान मानते हैं। सत्तापक्ष और विपक्ष सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। शासन व्यवस्था पर, यहां तक कि जनहित के कामों पर भी खुले मन से विचार करने के बजाय विरोध के ऐसे-ऐसे तरीके अख्तियार करते हैं, मानो वे किसी विदेशी सरकार से निपट रहे हों।

हर भारतीय चाहता है कि भारतवर्ष उन्नति करे, एक विकसित देश बने और देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास की सारी सुविधाएं मौजूद हों। इसके लिए हमें गहन विचार की आवश्यकता है। गड़बड़ सिर्फ यह है कि हम सिर्फ विचार ही करते रह जाते हैं, उससे आगे नहीं बढ़ते। भारत में हम चर्चा करते हैं, बहस करते हैं, सम्मेलन करते हैं, सेमिनार करते हैं, खूब बातें करते हैं और इस तरह जताते हैं मानो किसी भी जनसुविधा का सुधार हमारा काम न हो, और नतीजतन बिलकुल भी कार्य नहीं करते हैं। सीके प्रह्लाद ने एक बार इन्फोसिस के चीफ मेंटर नारायणमूर्ति से कहा था-'विकासशील देश होना महज एक मानसिकता है।' इस कथन से असहमत हुआ ही नहीं जा सकता। नारायणमूर्ति कहते हैं कि सत्तर के दशक में जब वे फ्रांस गए, तो उन्होंने विकसित देश और विकासशील देश की मानसिकता का फर्क स्पष्ट देखा। फ्रांस में हर कोई इस तरह दिखाता है मानो जनसुविधाएं सुधारने पर चर्चा करना, बहस करना और उस दिशा में फटाफट काम करना उनका ही काम हो। भारत में हम इसके एकदम विपरीत काम करते हैं। हम या तो उदासीनता का प्रदर्शन करते हैं या फिर सिर्फ चर्चा करते रह जाते हैं। हमारे यहां तो प्रधानमंत्री भी भाषण करते हैं, तो वह कहते हैं-'गरीबी दूर होनी चाहिए!' मानो, भारत की गरीबी दूर करना बराक ओबामा का काम हो!

आज हमारी मानसिकता गलत है, व्याकरण गलत है। 'ऐसा होना चाहिए', 'वैसा होना चाहिए' आदि को छोडक़र हमें अब 'मैं करूंगा' पर आने की जरूरत है। हमें यह भी समझना होगा कि पुराना जमाना पुराना था, वह बीत गया। अब जमाना बदल गया है। नए दौर और नए जमाने की जरूरतें नई होती हैं, समस्याएं नई होती हैं और नई समस्याओं के समाधान पुराने नहीं हो सकते। आज कहीं भी कोई बांध बनने लगे, बिजलीघर बनने लगे, टेलीकॉम कंपनी का टावर लगने लगे, सडक़ बनने लगे, नहर खुदने लगे, कहीं न कहीं से कोई न विरोधी जत्था निकल ही आता है। बात-बात पर संसद ठप हो जाती है, बंद का आयोजन होता है, दुकानें और बाजार बंद करवा दिए जाते हैं, तोड़-फोड़ शुरू हो जाती है, जैसे यह किसी विदेशी की संपत्ति हो। हड़ताल करना, रेल पटरियां उखाड़ देना, या टै्रफिक जाम कर देना नेतागिरी चमकाने का तरीका बन गया है।

आज राजनेता देश को महज एक चुनाव क्षेत्र और जनता को सिर्फ मतदाता के रूप में ही देखते हैं। उनकी रणनीति, घोषणाएं और सारे कामकाज वोट बैंक बनाने की नीयत से संचालित होते हैं। चुनाव के बाद विपक्ष की क्या भूमिका है? सरकारी नीतियों की आलोचना करना, सदन में शोर मचाना, सदन से बहिर्गमन करना और आंदोलन करना मात्र? क्या विपक्ष के पास किसी रचनात्मक काम की कोई योजना नहीं होनी चाहिए? क्या विपक्ष जनता की समस्याओं के समाधान के लिए कोई कार्यक्रम नहीं चला सकता? क्या हर रचनात्मक कार्यक्रम चलाने के लिए सरकार में होना ही आवश्यक है? क्या यह नहीं होना चाहिए कि सरकार अपने कामकाज की अद्र्धवार्षिक अथवा वार्षिक समीक्षा करे और बताए कि चुनाव घोषणा पत्र में से कितने वादे पूरे हो गए, कितने बाकी हैं और जो बाकी हैं उनकी स्थिति क्या है?

अब हमें ज्यादा जागरूक होकर यह समझने की आवश्यकता है कि बंद, धरना, हड़ताल, तोडफ़ोड़ हमारी अर्थव्यवस्था के दुश्मन हैं, वे जनता के हित में नहीं है। किसी व्यक्ति को देश का नुकसान करके नेता बनने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। सवाल यह है कि आजादी के इतने सालों बाद भी ऐसा क्यों हो रहा है? दरअसल, जब तक एक नागरिक के रूप में हम जागरूक नहीं होंगे, अपने अधिकारों और कत्र्तव्यों की बारीकियां नहीं समझेंगे, तब तक यही होता रहेगा। मतदाता के रूप में यह हमारी जिम्मेदारी है कि चुनाव के बाद भी हम पक्ष-विपक्ष के नेताओं की लगाम खींचते रहें और उन्हें अहसास दिलाते रहें कि हम जनता हैं और हम निर्वाचक हैं। यह हमारा कत्र्तव्य है कि हम लागातार पक्ष-विपक्ष के कामकाज को लेकर जनमत तैयार करते रहें। यह एक अनवरत प्रक्रिया होनी चाहिए, जो फिलहाल नहीं है। हमें सत्ता पक्ष और विपक्ष की नीति के साथ-साथ नीयत को भी परखना होगा। लेकिन इसका तरीका तोड़-फोड़ नहीं है, हड़ताल नहीं है, रास्ता रोको नहीं है। ऐसी हर स्थिति में परेशान तो नागरिक होते हैं। सरकार का क्या जाता है और विपक्ष का भी क्या जाता है?

इसलिए यह आवश्यक है कि हम खुद जागरूक हों और अपने आसपास के लोगों को जागरूक बनाएं। हम दीपक जलाएं और उसे दीपमाला बना दें। यह हमारी जिम्मेदारी है, हम सबकी जिम्मेदारी है। इसी में देश का भला है, इसी में हम सबका भला है।