यह महबूबा मुफ्ती की श्रद्धांजलि तो नहीं!

  • 2016-08-19 11:00:30.0
  • डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
यह महबूबा मुफ्ती की श्रद्धांजलि तो नहीं!

महबूबा मुफ्ती को बुरहान वानी को लेकर चिंता तो हो गई, लेकिन वह उन लोगों के चेहरे से पर्दा क्यों नहीं उठातीं, जो विदेशी पैसे से पल रही तंजीमों के दादा हैं और गरीब लोगों को डरा-धमकाकर प्रदर्शन के लिए लाते हैं और बाद में उनमें से कुछ की लाशों पर अपनी राजनीति करते हैं। कश्मीर उन चंद लोगों का नहीं है, जो विदेशी इशारों पर नाचते हुए अपनी रणनीति में आम जनता को ईंधन की तरह इस्तेमाल करते हैं। महबूबा मुफ्ती को मजबूरी में उन ईंधन बन रहे कश्मीरियों की चिंता करनी चाहिए, न कि बुरहान वानी कीज्

अपनी पार्टी पीडीपी के कार्यकर्ताओं को पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने संबोधित किया। आठ जुलाई को हिजबुल मुजाहिदीन के तथाकथित कमांडर बुरहान बानी के सुरक्षा बलों से मुठभेड़ में मारे जाने के बाद पीडीपी की पहली बैठक थी, जिसमें पार्टी के सभी महत्त्वपूर्ण कार्यकर्ता मौजूद थे। बुरहान की मौत के बाद कश्मीर घाटी

, खासकर दक्षिणी कश्मीर में जो हिंसा हुई है, उसी की छाया में यह बैठक हो रही थी। इस हिंसा में पचास के लगभग लोग मारे गए और पांच हजार के आसपास घायल हुए। घायल होने वालों में सुरक्षा बलों के जवान भी काफी संख्या में हैं। यद्यपि अब घाटी में शांति दिखाई देती है, लेकिन गिने-चुने इलाकों में अभी भी कफ्र्यू लगा हुआ है। जिस क्षेत्र में इस समय कृत्रिम अराजकता फैली हुई है, उसी क्षेत्र से महबूबा की पार्टी को ताकत मिलती है। इसलिए यह संबोधन बहुत तनावपूर्ण स्थितियों में किया गया।

जहां तक नेशनल कान्फ्रेंस और सोनिया कांग्रेस का सवाल है, उन्होंने अपने-अपने तरीके से बुरहान वानी को श्रद्धांजलि देने और उसे शहीद बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पाकिस्तान सरकार ने तो आधिकारिक तौर पर बुरहान वानी को शहीद घोषित किया और उसकी मौत को लेकर कई दिन मुंह लटकाए रखा। लेकिन अब सूबे की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अपनी पार्टी को एक नई सूचना देकर सभी को चौंका दिया। उनका कहना है कि सुरक्षा बलों को पता ही नहीं था कि उस घर में बुरहान वानी है। यदि उनको इस बात का थोड़ा सा भी पता होता, तो वे उसे कभी न मारते। सुरक्षा बलों को तो केवल इतना ही पता था कि उस घर में तीन आतंकी छिपे हुए हैं, इसलिए उन्होंने धावा बोल दिया। इसलिए बुरहान वानी की मौत सही जानकारी व सही सूचना के अभाव में हो गई। महबूबा मुफ्ती का वानी की मौत पर यह भी कहना है कि राज्य सरकार को भी इस बात की सूचना नहीं थी।

महबूबा मुफ्ती के इस रहस्योद्घाटन से दो-तीन प्रश्न पैदा होते हैं। महबूबा की बात यदि सच्ची मान ली जाए तो इसका अर्थ यह हुआ कि सुरक्षा बलों को हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादियों को तो मारना चाहिए, लेकिन यदि उनका कमांडर दिखाई पड़ जाए तो उसे हाथ नहीं लगाना चाहिए। महबूबा के हिसाब से तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए था। आखिर कमांडर रैंक का एक आदमी सुरक्षा बलों के हाथों साधारण आतंकी की तरह मारा गया, यह कितना दुखद है। मुफ्ती के कहने से यह भाव भी निकलता है कि यदि राज्य सरकार को बुरहान वानी के बारे में इल्म होता, तो वह तो उसे किसी भी कीमत पर मारने न देती। पाकिस्तान बुरहान वानी को नायक बनाए, यह बात समझ आती है, लेकिन महबूबा मुफ्ती वानी की लाश को नायकत्व का कफन क्यों ओढ़ाना चाहती हैं? आतंकवादियों से बातचीत की जानी चाहिए, ऐसी चर्चा जो कश्मीर घाटी में चलाई जा रही है, कहीं उसका अर्थ यह तो नहीं कि अब सुरक्षा बल आतंकवादियों से लडऩे की बजाय उनके स्वागत सत्कार की तैयारी में लग जाएं?

महबूबा मुफ्ती ने वानी को लेकर जो प्रवचन दिया है, वह हुर्रियत कान्फ्रेंस के गिलानी या फिर यासीन मलिक कहता तो किसी को आश्चर्य न होता, लेकिन सूबे की मुख्यमंत्री ऐसा कहेंगी, तो जान हथेली पर रख कर आतंकवादियों से जूझने वाले सुरक्षा बलों में निराशा ही आएगी। जम्मू-कश्मीर का दुर्भाग्य भी यही है कि नेशनल कान्फ्रेंस या पीडीपी जीतते तो उन आम कश्मीरियों के मतों से हैं, जो रियासत में अमन-चैन चाहते हैं, लेकिन जीतने के बाद उनको चिंता आतंकवादियों की होने लगती है और वे उन्हीं की सुरक्षा की चिंता करने लगते हैं। जो निर्दोष लोग पुलिस की गोलियों का शिकार हो गए, उनके प्रति निश्चय ही सहानुभूति होनी चाहिए, लेकिन सहानुभूति के नाम पर आतंकवादियों का ही पक्ष लेना शुरू कर दिया जाए, यह निंदनीय है।

कुछ चुनिंदा लोगों को छोड़ दिया जाए तो कश्मीर में आम नागरिक अमन चाहते हैं और भारत की मुख्यधारा में शामिल होने की इच्छा रखते हैं। यही लोग वहां होने वाले प्रत्येक चुनाव में तमाम धमकियों को दरकिनार का मतदान की प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं और विकास की प्रक्रिया को खुद तक पहुंचते हुए देखना चाहते हैं। तथाकथित असंतुष्ट तो हर बार चुनावों का बहिष्कार करते हैं। इस रहस्य को समझे जाने की आवश्यकता है कि जो लोग मतदान प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेते, मतदान को बाधित करने के लिए खून खराबा करने पर उतारू रहते हैं, उन्हें घाटी के राजनीतिक दल लोगों की आवाज कैसे मान लेते हैं। तवज्जो तो उन्हीं आवाजों को दी जानी चाहिए, जो जान की परवाह किए बिना कश्मीर में लोकतंत्र के पर्व में शिरकत करती हैं।

दरअसल कश्मीर घाटी के राजनीतिक दलों को वहां के अवाम के मौन बहुमत के साथ खड़ा होना चाहिए, न कि मु_ी भर आतंकवादियों के साथ, जिन्हें यकीनन पाकिस्तान का साथ मिला हुआ है। सरकार को शिनाख्त तो उन लोगों की करनी चाहिए, जो आतंक का व्यापार करने के लिए करोड़ों रुपए हवाला के माध्यम से प्राप्त करते हैं। इन लोगों की रोजी-रोटी तभी तक चलेगी और हैसियत तभी तक बनी रहेगी, जब तक कश्मीर में खून खराबा होता रहेगा। रक्त की आंच पर अपनी रोटी सेंकने वाले लोगों को इतनी तरजीह राजनीतिक दलों के बारे में भी कई तरह के संदेहों को जन्म देती है। यह दीगर है कि पाक से भारत घुसने वाले आतंकियों को भी स्थानीय लोगों का सहयोग मिलता रहा है। हाल ही में कुपवाड़ा में जिंदा पकड़े गए आतंकी बहादुर अली ने भी कबूल किया है कि वह और उसके साथी स्थानीय लोगों की मदद से भारत में घुसे थे। ऐसे दलालों की पहचान से घाटी का मनोविज्ञान भी बदलेगा और शांति प्रक्रिया में पहल भी होगी।

यदि सरकार उन गिनती के राजनीतिज्ञों की पहचान कर ले और उनके नाम सार्वजनिक कर दे, जो करोड़ों रुपए का बजट डकार जाते हैं, तो आम जनता का सरकार के प्रति विश्वास भी बढ़ेगा। महबूबा मुफ्ती को बुरहान वानी को लेकर चिंता तो हो गई, लेकिन वह उन लोगों के चेहरे से पर्दा क्यों नहीं उठातीं, जो विदेशी पैसे से पल रही तंजीमों के दादा हैं और गरीब लोगों को डरा धमका कर प्रदर्शन के लिए लाते हैं और बाद में उनमें से कुछ की लाशों पर अपनी राजनीति करते हैं। कश्मीर उन चंद लोगों का नहीं है, जो विदेशी इशारों पर नाचते हुए अपनी रणनीति में आम जनता को ईंधन की तरह इस्तेमाल करते हैं। महबूबा मुफ्ती को मजबूरी में उन ईंधन बन रहे कश्मीरियों की चिंता करनी चाहिए, न कि बुरहान वानी की।