महिमा गान बनाम मुआवजा

  • 2016-10-01 06:00:53.0
  • महेंद्र अवधेश
महिमा गान बनाम मुआवजा

उड़ी में पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद के आत्मघाती हमले में हमारे डेढ़ दर्जन जवान शहीद हो गए। यह शहादत नई नहीं है, क्योंकि भारतीय सेना का इतिहास रहा है कि जब-जब देश को जरूरत पड़ी, हमारे जवान अपना सिर कटाने के लिए हमेशा तैयार दिखे। उड़ी की शहादत महज एक पन्ना है उस पावन इतिहास का। नापाक दामन पड़ोसी की कायराना हरकतों के चलते इससे पहले भी हमारे जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी, सिर कटाने पड़े। लेकिन यहां मकसद भारत के वीरों की शहादत का बखान करना नहीं है, बल्कि उस विडंबना पर चर्चा करना है, जो हमें गहरे तक चिंतित करती है। और, यह चिंता उस खबर से उपजी है जो बताती है कि पश्चिम बंगाल के हावड़ा निवासी उड़ी के शहीद गंगाधर दोलुई के पिता ओंकारनाथ को अपने बेटे के अंतिम संस्कार के लिए पड़ोसियों से दस हजार रुपए बतौर कर्ज लेने पड़े।ओंकारनाथ की यह बेबसी उस समय और भी दोहरी हो गई, जब राज्य सरकार ने उन्हें दो लाख रुपए की आर्थिक सहायता और परिवार के एक सदस्य को होमगार्ड की नौकरी देने की पेशकश की। ओंकारनाथ ने शहीद सैनिक के परिवार के प्रति राज्य सरकार की छद्म सहानुभूति को ठुकरा दिया। इसी तरह बिहार के भोजपुर निवासी शहीद अशोक कुमार सिंह की विधवा संगीता देवी ने राज्य सरकार द्वारा जारी पांच लाख रुपए की सहायता राशि यह कहते हुए ठुकरा दी कि उनके पति की मौत जहरीली शराब पीने से नहीं हुई है। संगीता ने सवाल उठाया कि जब पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश और झारखंड की सरकारें अपने शहीदों के परिवारों को सम्मानजनक मुआवजा-सहायता दे रही हैं, तो नीतीश सरकार कंजूसी क्यों बरत रही है। संगीता की नाराजगी के बाद बिहार सरकार ने राज्य के तीनों शहीदों के परिवारों की सहायता राशि बढ़ा कर ग्यारह लाख रुपए कर दी।


ओंकारनाथ और संगीता देवी का कदम सही था अथवा गलत, यह बहस का एक अलग विषय हो सकता है, लेकिन शहीदों के परिवारों के प्रति राज्य सरकारों का रवैया निस्संदेह चिंतनीय है। अजब विडंबना है! देश के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले सैनिकों के परिवारों को सहायता-सांत्वना के अपने वाजिब हक के लिए गुस्से का इजहार करना पड़ रहा है। शहादत का मोल कोई भी सरकार अथवा देश अदा नहीं कर सकता। ब्रितानी हुकूमत से देश को आजादी दिलाने के लिए असंख्य भारत वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी, यातनाएं सहीं और जेल काटी। उनमें से अनगिनत लोगों के परिवारों को न तो कोई मुआवजा मिला और न यथोचित सम्मान। सेना में भी कोई मुआवजा पाने के लिए शहादत नहीं देता। लेकिन हमारे जो जवान सर्दी, गर्मी और बरसात यानी हर मौसम में सीमा पर मुस्तैद रहते हैं, जरूरत पडऩे पर अपनी जान दे देते हैं, उनके परिवारों के प्रति देश और सरकार की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।

करगिल रहा हो या पठानकोट, हमारी सेना ने अनगिनत कुर्बानियां दी हैं। सिर्फ सेना नहीं, बीएसएफ और सीआरपीएफ समेत दीगर अद्र्ध सैन्य बलों ने भी समय-समय पर देश के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्र-विरोधी व समाज-विरोधी तत्त्वों के खिलाफ मोर्चा लिया है। केंद्र और सेना द्वारा ऐसे परिवारों के लिए नियमानुसार वह सब कुछ किया जाता है, जो होना चाहिए। लेकिन किसी सैनिक की शहादत के बाद उसके गृह-राज्य की सरकार का कर्तव्य बनता है कि वह संबंधित सैनिक के परिवार के प्रति सम्मान का भाव रखे। उसकी ओर से जो भी सहायता-सांत्वना सामने आए, वह स्वीकार योग्य हो।
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र व झारखंड की राज्य सरकारें अपने शहीदों के परिवारों के लिए यथोचित सहायता राशि देती रही हैं, लेकिन यह बेहद अफसोसनाक है कि अधिकतर राज्य सरकारों की मुआवजा नीति दोषपूर्ण है। पश्चिम बंगाल इसकी ताजा नजीर है, जहां की ममता बनर्जी सरकार को सहायता राशि की घोषणा करते समय तनिक लज्जा का अनुभव नहीं हुआ। बिहार सरकार ने तो फजीहत झेलने के बाद अपनी गलती सुधार ली, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से अभी तक ऐसी कोई खबर नहीं है।
गौरतलब है कि हाल में रियो ओलंपिक और पैरालंपिक में कांस्य, रजत और स्वर्ण पदकजीतने वाले भारतीय खिलाडिय़ों पर धन की जमकर बरसात हुई। केंद्र हो या राज्य सरकार, सबने खुले हाथों पैसा लुटाया। खिलाड़ी करोड़पति हो गए। 

विभिन्न राज्य सरकारों ने अपनी सरहद लांघ कर दीगर राज्यों के खिलाडिय़ों के लिए भी पुरस्कार घोषित किए और खेलों के प्रति दरियादिली दिखा कर खूब वाहवाही बटोरी। लेकिन सीमा पर विदेशी दुश्मनों और बीहड़ जंगलों में नक्सलियों से मोर्चा लेने वाले सेना और अद्र्ध सैन्य बलों के शहीदों की जान की कीमत सिर्फ पांच, दस, ग्यारह और बीस लाख रुपए! यहां उल्लेखनीय है कि शहीद जवान चाहे सेना का रहा हो अथवा दीगर सैन्य बलों का, सहायता-अनुग्रह-मुआवजा राशि के जरिये उसके परिवार के आंसू पोंछने में दिल्ली सरकार सबसे आगे रही है, जो पूरे एक करोड़ रुपए देती है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील भी की है कि देश के लिए शहीद होने वाले हर जवान के परिवार को एक करोड़ रुपए की सम्मान राशि दी जाए और इसकी शुरुआत उड़ी हमले में शहीद हुए सैनिकों के परिवारों को उक्त सम्मान राशि देने के साथ हो।

सम्मान राशि के मामले में दिल्ली के बाद नंबर आता है उत्तर प्रदेश का, जहां की अखिलेश सरकार शहीद सैनिक-जवान के परिवार के लिए बीस से पच्चीस लाख रुपए की धनराशि जारी करती रही है।
बीते सत्ताईस सितंबर को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उड़ी के शहीद संत कबीर नगर निवासी गणेश शंकर के अलावा पुलिस के सात शहीदों हापुड़ के सुरेंद्र सिंह, अलीगढ़ के अशोक कुमार, गौतम बुद्ध नगर के जितेंद्र कुमार, देवरिया के देवेंद्र चौरसिया, बागपत के सुखवीर सिंह, लखनऊ के यशपाल सिंह व गाजियाबाद के प्रमोद कुमार के परिवारीजनों को बीस-बीस लाख रुपए की सहायता राशि के चेक सौंपे। यही नहीं, राज्य सरकार ने सभी परिवारों को लोहिया आवास तथा शहीद जवान के माता-पिता को समाजवादी पेंशन देने और बच्चों की शिक्षा का जिम्मा उठाने का भी निर्णय लिया है।
दरअसल, मुआवजा किसी की मौत की भरपाई हरगिज नहीं है। बल्कि मुआवजा या सहायता राशि यह बताती है कि जो लोग अपना घर-परिवार छोड़ कर महीनों विषम परिस्थितियों में सीमा पर, जंगलों में, बीहड़ों में, रेगिस्तान में या दुर्गम पहाड़ी इलाकों में देश और समाज के दुश्मनों से दो-दो हाथ करने के लिए तत्पर रहते हैं, सरकार नामक संस्था को उनकी और उनके परिवार की सुध है, चिंता है। सरकार अपने वीरों और उनके परिवार के साथ है। सेना और अन्य अद्र्ध सैन्य बलों में लोग रोजगार की जरूरत के साथ-साथ देशसेवा की भावना से भी जाते हैं। अन्य कामों की तुलना में इसमें जोखिम अधिक रहता है।

दुर्योग से या दुर्घटनावश तो किसी भी काम के दरम्यान जान जा सकती है, पर सैनिक को हर वक्त यह जानते हुए काम करना पड़ता है कि ड्यूटी के दौरान उसकी जान भी जा सकती है। बल्कि इस सेवा में शामिल होने से पहले ही आदमी यह जानता है कि उसे अपनी जान का खतरा उठा कर काम करना होगा। सियाचिन जैसे इलाके में तो युद्ध की स्थिति न हो तब भी वहां सैनिक को भीषण हालात में रहना पड़ता है और मौसम के हाथों मारे जाने का खतरा हर वक्त मंडराता रहता है। फिर, तमाम सैनिकों को अपने घर-परिवार से दूर रहना पड़ता है। छुट्टी के दिनों में ही वे अपने परिवार के बीच कुछ वक्त बिता पाते हैं।
इस सेवा में अधिकांशत: वे लोग जाते हैं जो सुदूर गांवों, जिलों और पिछड़े इलाकों से होते हैं। जिनके सिर पर एक अदद पक्की छत तक नहीं होती। हावड़ा स्थित गंगाधर दोलुई का फूस का घर इसका उदाहरण है।

तमाम अभावों के बावजूद देशसेवा के जज्बे के चलते ही आज तक हमारी सेना को जवानों की कमी नहीं पड़ी। भर्ती शिविरों में युवकों की उमडऩे वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है, जहां कई-कई दिनों तक युवक प्रयास करते रहते हैं कि उन्हें देशसेवा का एक मौका मिल जाए। एक बिंदु की चर्चा यहां प्रासंगिक है। जिन्हें करगिल याद होगा, वे अवश्य जानते होंगे कि करगिल के बाद जब शहीद सैनिकों के परिवारों को मुआवजा राशि, जमीन, पेट्रोल पंप और गैस एजेंसियों के आवंटन जैसी सुविधाएं दी गईं, तो कई मामले ऐसे भी सामने आए जिनमें शहीद की विधवा और परिवार के बीच कलह पैदा हो गया, मामला पुलिस तक पहुंच गया। कहीं शहीद की विधवा ने बूढ़े सास-ससुर को दरकिनार कर दिया, तो कहीं परिवार वालों ने शहीद की विधवा को। कहीं नाते-रिश्तेदारों ने बहती गंगा में हाथ धो लिये।

जरूरत इस बात की है कि एक ऐसी राष्ट्रीय नीति बने, जिसमें तय हो कि शहीद सैनिकों-जवानों के परिवारों को सहायता-सांत्वना स्वरूप जो कुछ भी मिलेगा, उसमें राज्य सरकार की इतने फीसद भागीदारी होगी और केंद्र सरकार की इतने फीसद। और, यह सब विभागीय देयों-भुगतानों से इतर हो। इसके अलावा यह भी प्रावधान होना चाहिए कि शहीद की विधवा को कितना हिस्सा मिलेगा और कितना शहीद के आश्रित माता-पिता को। 

अगर ऐसा हो जाए, तो शहीद के पूरे परिवार के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी और किसी तरह के बंदरबांट की शिकायत सामने नहीं आएगी।