डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की दृष्टि ही देगी समाधान

  • 2016-08-08 08:30:47.0
  • डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की दृष्टि ही देगी समाधान

डा. मुखर्जी शायद उसी समय समझ गए थे कि यदि भारत की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करनी है और शासन को भारतीय मूल्यों के अनुसार ढालना है, तो नेहरू की पश्चिमोन्मुखी कांग्रेस के मुकाबले भारतोन्मुखी शक्तियों को संगठित करना होगा। 1952 में डा. मुखर्जी ने इसी लंबी योजना को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनसंघ का गठन किया था। जनसंघ के गठन के तुरंत बाद ही मुखर्जी से जम्मू कश्मीर के लोग मिले। नेहरू जो प्रयोग पूर्वी बंगाल में कर रहे थे, लगभग वैसे ही प्रयोग वह जम्मू-कश्मीर में भी कर रहे थे। अलबत्ता जम्मू-कश्मीर में वह और भी दो कदम आगे बढ़े हुए थे।

पूर्वी बंगाल के भारत से अलग होते ही मुस्लिम लीग ने वहां की सरकार से मिलकर हिंदुओं को खदेडऩा शुरू कर दिया था। उनकी संपत्ति को लूटना शुरू कर दिया और लड़कियों का अपहरण शुरू हो गया। पूर्वी पाकिस्तान, जो उन दिनों पूर्वी बंगाल भी कहलाता था, के हिंदुओं के सामने एक ही विकल्प था कि वे या तो इस्लाम स्वीकार कर लें या फिर अपनी मातृभूमि छोड़ दें। पूर्वी बंगाल में मानों एक बार फिर से मुगल वंश का शासन आ गया हो। डा. मुखर्जी उन दिनों नेहरू के मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री थे। महात्मा गांधी के आग्रह पर सत्ता हस्तांतरण के समय शुद्ध कांग्रेसी सरकार न बनाकर दिल्ली में राष्ट्रीय सरकार का गठन किया गया था। उसी कारण से डा. मुखर्जी मंत्री बने थे। मुखर्जी ने नेहरू से आग्रह किया कि भारत सरकार पाकिस्तान से बंगाली हिंदुओं का नरसंहार और मतांतरण बंद करने के लिए कहे। यदि पाकिस्तान बंगाली हिंदुओं को अपने यहां से खदेडऩा बंद नहीं करता

, तो पूर्वी बंगाल से निष्कासित लोगों की संख्या के अनुपात से वहां की जमीन पुन: भारत में शामिल की जाए, परंतु पश्चिमी अवधारणाओं के समर्थक नेहरू के लिए शायद मतांतरण कोई विषय ही नहीं था। उनकी चलती, तो वह शायद पूर्वी बंगाल के सभी हिंदुओं को मतांतरित होकर प्राण रक्षा की सलाह भी दे देते। नेहरू ने पूर्वी बंगाल के हिंदुओं की रक्षा करने के बजाय पाकिस्तान के उस समय के प्रधानमंत्री पर ही भरोसा करना ज्यादा ठीक समझा।

नेहरू की इसी शुतुरमुर्गी नीति से आहत होकर मुखर्जी ने मंत्रिपरिषद से त्यागपत्र दे दिया था। डा. मुखर्जी शायद उसी समय समझ गए थे कि यदि भारत की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करनी है और शासन को भारतीय मूल्यों के अनुसार ढालना है, तो नेहरू की पश्चिमोन्मुखी कांग्रेस के मुकाबले भारतोन्मुखी शक्तियों को संगठित करना होगा। 1952 में डा. मुखर्जी ने इसी लंबी योजना को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनसंघ का गठन किया था। जनसंघ के गठन के तुरंत बाद ही मुखर्जी से जम्मू कश्मीर के लोग मिले। नेहरू जो प्रयोग पूर्वी बंगाल में कर रहे थे, लगभग वैसे ही प्रयोग वह जम्मू-कश्मीर में भी कर रहे थे। अलबत्ता जम्मू-कश्मीर में वह और भी दो कदम आगे बढ़े हुए थे।

उनके मित्र शेख अब्दुल्ला भारत के भीतर एक शुद्ध स्वायत्त प्रांत स्थापित करना चाहते थे। एक ऐसा राज्य, जिसकी सुरक्षा भारत सरकार करे, बाकी सब मामलों में वह स्वतंत्र हो। शेख अब्दुल्ला के पास इसका तर्क यह था कि जम्मू-कश्मीर रियासत मुस्लिम बहुल रियासत है। इस लिहाज से वह पाकिस्तान में शामिल होनी चाहिए, लेकिन यह मुस्लिम बहुल रियासत भारत में शामिल हो रही है, इसलिए इसका इतना अधिकार तो बनता ही है कि वह सुरक्षा के अतिरिक्त बाकी सब मामलों में स्वतंत्र रहे। जाहिर था शेख अब्दुल्ला भारत में शामिल होने की कीमत वसूल रहे थे, जबकि नेहरू और शेख दोनों अच्छी तरह जानते थे कि विभाजन के बाद भी पाकिस्तान में रहने वाले मुसलमानों से ज्यादा मुसलमान हिंदोस्तान में रहते हैं। और भी, जम्मू-कश्मीर रियासत के भारत में शामिल होने से शेख अब्दुल्ला का कोई ताल्लुक नहीं था। भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के अनुसार भारत में शामिल होने का अधिकार और निर्णय महाराजा हरि सिंह का था और उन्हीं ने अपने इस अधिकार का प्रयोग करते हुए रियासत को भारत की संघीय संवैधानिक व्यवस्था में शामिल तरने का निर्णय लिया था। वैसे भी शेख मोहम्मद अब्दुल्ला पाकिस्तान नहीं जा सकते थे। जिन्ना के पाकिस्तान में उनका क्या हश्र हो सकता था, इसे वह अच्छी तरह जानते थे। इसलिए उन्होंने रियासत के भारत में शामिल होने का समर्थन किया।

नेहरू ने महाराजा हरि सिंह से शासन छीन कर बिना किसी लोकतांत्रिक तरीके से शेख अब्दुल्ला को पूरी जम्मू-कश्मीर रियासत का प्रधानमंत्री बना दिया। यह लोकतांत्रिक भारत में नेहरू का पहला तानाशाही प्रयोग था। जम्मू और लद्दाख के लोगों, जिनमें हिंदू, सिख और बौद्ध बहुमत में थे, ने रियासत को भारत गणतंत्र के भीतर एक अलग गणतंत्र बनाने का विरोध ही नहीं किया, बल्कि इसके विरोध में जबरदस्त आंदोलन भी चलाया, जिसमें शेख अब्दुल्ला की मिलीशिया ने पंद्रह लोगों को मौत के घाट उतार दिया। नेहरू शेख अब्दुल्ला की जिद के साथ इतना आगे बढ़े कि उन्होंने कश्मीर घाटी के हिंदुओं को भी यह सलाह देनी शुरू कर दी कि यदि घाटी में रहना है तो शेख अब्दुल्ला की कान्फ्रेंस में ही शामिल हो जाओ। उधर शेख अब्दुल्ला इस्लाम को आधार बना कर नेहरू से अपनी कीमत वसूल रहे थे। भारत के संविधान में अनुच्छेद-370 इसी कीमत वसूलने से निकला है। इस अनुच्छेद ने जम्मू-कश्मीर की जनता को उन तमाम अधिकारों से महरूम कर दिया, जो देश के दूसरे नागरिकों को मिले हुए थे।

शेख अब्दुल्ला जानते थे कि यदि जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को भी वे सभी अधिकार मिल गए जो दूसरे नागरिकों को मिले हुए हैं, तब न तो वह स्वयं रियासत के नए नवाब बन सकेंगे और न ही उनकी राज्य को स्वायत्तता के नाम पर राज्य को आजाद रख पाने की महत्त्वकांक्षा पूरी हो सकेगी। तब प्रदेश की सत्ता असली जनप्रतिनिधियों के हाथों में आ जाएगी। इसलिए उन्होंने अनुच्छेद-370 की आड़ में जम्मू-कश्मीर के लिए अलग संविधान, अलग झंडा, अलग राज्य गीत, अलग प्रधानमंत्री और अलग प्रधान या सदर-ए-रियासत का ताना-बाना बुनना शुरू कर दिया। ताज्जुब तो तब हुआ, जब नेहरू भी इस षड्यंत्र में शेख अब्दुल्ला के साथ खड़े दिखाई दिए। तब जम्मू-कश्मीर के लोगों ने प्रजा परिषद के नेतृत्व में राज्यव्यापी आंदोलन छेड़ दिया। पूरे प्रदेश में एक ही नारा गूंज रहा था। एक देश में दो प्रधान, दो विधान, दो निशान। नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे। भारतीय जनसंघ ने इस आंदोलन का देश भर में समर्थन किया।

डा श्यामाप्रसाद मुखर्जी इस विषय पर शेख अब्दुल्ला से बात करने के लिए स्वयं श्रीनगर की ओर बढ़ चले, लेकिन शेख अब्दुल्ला ने उन्हें 11 मई, 1953 को जम्मू में दाखिल होते ही गिरफ़्तार कर लिया। यदि शेख अब्दुल्ला उनसे इस विषय पर बात नहीं करना चाहते थे, तो वह उन्हें जम्मू-कश्मीर के प्रवेश द्वार पर ही रोक सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। पहले उन्हें राज्य के भीतर प्रवेश करने दिया गया। एक बार वह अंदर आ गए, तब जम्मू कश्मीर की पुलिस ने उन्हें बंदी बना लिया। यह सारा षड्यंत्र क्यों किया गया? उसका कारण स्पष्ट था। जम्मू-कश्मीर की कैद में होने से वह भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को दी गई सुरक्षा से महरूम हो गए, क्योंकि अनुच्छेद-370 के कारण भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकार व सर्वोच्च न्यायालय की सुरक्षा जम्मू-कश्मीर में उपलब्ध नहीं थी। उन्हें श्रीनगर की जेल में कैद कर दिया गया। मौला चंद्र शर्मा ने नेहरू को कहा भी कि मुखर्जी भारी शरीर के हैं और उन्हें हार्ट की समस्या भी है। उन्हें श्रीनगर मत भेजिए, जम्मू में ही नजरबंद कर दें। नेहरू ने रहस्यमय उत्तर दिया। वहां ठंड है। वहीं प्रसन्न रहेंगे। कैद इतनी सख्त थी कि उनको उनके रिश्तेदारों से भी नहीं मिलने दिया जा रहा था।

उनके पुत्र को भी उनसे मिलने नहीं दिया गया, लेकिन मुखर्जी को ज्यादा दिन शेख अब्दुल्ला की जेल में नहीं रहना पड़ा। 23 जून को जम्मू-कश्मीर सरकार ने सारे देश को बताया कि रात को संसद सदस्य और भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अस्पताल में मौत हो गई थी। राष्ट्रीय एकता की कीमत डा. मुखर्जी ने अपनी जान देकर चुकाई, लेकिन बहुत पहले तीन जनवरी, 1946 को उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था, 'मेरी इच्छा है कि जब भी मेरा अंत आए, तो मैं कर्मक्षेत्र में निरंतर सत्य के लिए संघर्ष करता हुआ मरूं।' उनकी यह इच्छा तो पूरी हुई परंतु उनकी जान लेने वाली शक्तियों के षड्यंत्र का तरीका क्या था, यह अभी तक रहस्य की परतों में दबा पड़ा है। पुड्डुचेरी की श्री मां ने केवल इतना ही कहा, 'उन्होंने उसे मार डाला।'