पुडिय़ा को बाजार ले जाने की चुनौती

  • 2016-10-04 12:30:15.0
  • अभिषेक कुमार
पुडिय़ा को बाजार ले जाने की चुनौती

भले ही दुनिया के कई देशों में आयुर्वेदिक दवाओं का आयात भारत से होता हो, लेकिन इनके खिलाफ एक बड़ा भारी मत यह है कि प्राचीन ग्रंथों के उल्लेखों और सिर्फ भरोसे के आधार पर उन दवाओं का कारोबार नहीं चल सकता जिनके बनाने की विधि में एकरूपता न हो और जिनके असर व दुष्प्रभाव को मापने का कोई जरिया न हो। इन स्थितियों के बावजूद हाल में स्विट्जरलैंड की सरकार ने कुछ यूरोपीय और चीन की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के साथ-साथ आयुर्वेद को भी मान्यता प्रदान कर दी है। इस मान्यता का अभिप्राय यह है कि अब न सिर्फ इन चिकित्सा पद्धतियों के तहत इलाज की वहां छूट होगी और बीमा कंपनियों से इलाज के खर्च की क्षतिपूर्ति (रिम्बर्समेंट) मिल सकेगी, बल्कि आयुर्वेद के विस्तार के लिए सरकारी पैसे की मदद भी हासिल हो सकेगी। इस मान्यता में 210 औषधीय जड़ी-बूटियों और 250 पारंपरिक आयुर्वेदिक नुस्खों को भी शामिल किया गया है और चिकित्सकों यानी वैद्यों को अपने बनाए नुस्खे आजमाने व मरीजों को बेचने की छूट हासिल होगी।

किसी यूरोपीय मुल्क में आयुर्वेद को स्वीकृति का यह एक बड़ा मामला है और शायद यही वजह है कि इसकी सफलता से उत्साहित भारत सरकार ने अब इटली और जर्मनी जैसे देशों में भी आयुर्वेद को बढ़ावा देने वाले अभियानों में गति लाने की योजना बनाई है। इन देशों में आयुर्वेदिक दवाओं की भारी मांग है, लेकिन मौजूदा कायदे-कानूनों के कारण वहां चिकित्सक इन्हें आजमाने से कतराते हैं और इन दवाओं की निर्माता कंपनियां भी अपने उत्पाद वहां भेजते समय आशंकित रहती हैं कि उनकी दवाओं में मानक संबंधी कोई दोष न निकाल दिया जाए और करोड़ों की खेप सिर्फ संदेह के आधार पर लौटा न दी जाए।

ऐसा अनगिनत बार हो चुका है जब भारतीय आयुर्वेदिक कंपनियों की दवाओं की खेप पश्चिमी मुल्कों से यह कह कर लौटाई गईं कि उनमें या तो जरूरत से ज्यादा भारी धातुएं (हैवी मेटल्स) हैं या फिर उनके निर्माण की प्रक्रियाओं में लापरवाही बरती गई है। करीब एक दशक पहले 2005 में कनाडा के एक सरकारी विभाग 'हेल्थ कनाडा' ने यह कह कर लोगों को चौंका दिया था कि उसने कई भारतीय आयुर्वेदिक कंपनियों की दवाओं में सीसा, पारा और आर्सेनिक जैसे खतरनाक तत्त्वों की मौजूदगी दर्ज की है। इनकी वजह से मरीजों में इनसे दिमागी सूजन, पक्षाघात और दूसरी गंभीर बीमारियां तक होने की बात कही गई थी और कनाडा के निवासियों को सतर्क करते हुए जारी निर्देश में कहा गया था कि वे भारतीय कंपनियों द्वारा निर्मित साफी, शिलाजीत, करेला कैप्सूल और महासुदर्शन चूर्ण आदि का हरगिज इस्तेमाल न करें।

ऐसा ही एक मामला अमेरिका में हुआ था, जब भारत से वहां भेजी गई आयुर्वेदिक दवाओं की एक खेप उनमें तय मानक से कई गुना ज्यादा भारी धातुओं की उपस्थिति के दावे के साथ लौटा दी गई थी। दस साल पहले एशियाई देश सिंगापुर तक ने भारतीय आयुर्वेदिक दवा कंपनियों द्वारा निर्मित च्यवनप्राश को उनमें मौजूद कीटनाशक तत्त्वों और हैवी मेटल्स के कारण लौटा दिया था। सिंगापुर ने तो यह दावा भी किया था कि भारतीय कंपनियों के च्यवनप्राश में पारा और सीसा (लेड) के अलावा संखिया की भी भारी मात्रा मौजूद थी।  आयुर्वेदिक दवाओं में भारी धातुओं की उपस्थिति अकारण नहीं है। प्राचीन ग्रंथों के संदर्भों के आधार पर उनमें ये तत्त्व और धातुओं की भस्म आदि आवश्यकतानुसार मिलाए ही जाते हैं। जैसे स्वर्ण या रजत भस्म को अच्छे च्यवनप्राश का प्राण माना जाता है। इसी तरह एक विशेष चट्टान से तैयार होने वाले शिलाजीत की अपनी ही उपयोगिता है।

इन सारे तत्त्वों को रोग-विशेष की चिकित्सा में जरूरी माना जाता है और इन्हें आयुर्वेद के नजरिये से तर्कसम्मत और अनिवार्य बताया जाता है। पेड़ की छाल से तैयार होने वाले ईसबगोल की अपनी महत्ता है और करेले के चूर्ण की अपनी उपयोगिता है, लेकिन इन चीजों को लेकर पश्चिमी देशों में काफी एतराज किया गया है और हमेशा पश्चिमी मानकों की बात उठाई गई है। इससे यह संदेह अवश्य रहा है कि कहीं ऐसी कार्रवाई पश्चिमी शैली की दवा बनाने वाले उद्योग के इशारे पर तो नहीं की गई। एलोपैथी चिकित्सा चूंकि बेहद महंगी है और उसके कई उत्तर-प्रभाव (साइड इफेक्ट) हैं, इसलिए पूरी दुनिया के लोग सस्ती पारंपरिक चिकित्सा को लेकर जिज्ञासु रहे हैं।

यह जिज्ञासा निश्चय ही अमेरिकी-यूरोपीय दवा कंपनियों के दबदबे को नुकसान पहुंचाती रही है, इसलिए इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि पश्चिमी दवा उद्योग के दबाव में आयुर्वेद और अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के खिलाफ एक माहौल जान-बूझ कर बनाया गया। यहां तक कि खुद विश्व स्वास्थ्य संगठन इसके दबाव में रहा और उसने यह व्यवस्था दी कि आयुर्वेद और इस जैसी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों-दवाओं-नुस्खों को मानकीकरण के बिना आजमाया न जाए। यहां तक कि कुछ वर्ष पहले जब विश्व स्वास्थ्य संगठन के तहत पारंपरिक चिकित्सा कार्यक्रम(ट्रेडिशनल मेडिसिन प्रोग्राम) चलाया गया, तब भी यह कहा गया कि पारंपरिक दवाओं व चिकित्सा प्रणालियों के सकारात्मक प्रभाव के बारे में ठोस वैज्ञानिक प्रमाण होने चाहिए तभी उनके इस्तेमाल की इजाजत दी जा सकती है।

पश्चिम की दवा लॉबी की साजिश का तथ्य अपनी जगह मौजूद है, पर इससे इनकार नहीं कि जब बात मानकों, प्रमाणन और एक व्यवस्थित प्रक्रिया की होती है तो इस मामले में होम्योपैथी, चीनी, यूनानी चिकित्सा पद्धतियों की तरह थोड़ा-बहुत अभाव आयुर्वेद में भी रहा है। अभाव इसलिए नहीं था कि दवाओं-नुस्खों को बनाने की प्रक्रिया और मरीज पर पडऩे वाले उनके असर के बारे में प्राचीन भारतीय ग्रंथों में कोई मतभेद था, बल्कि इसलिए था क्योंकि अलग-अलग वैद्य और दवा निर्माता कंपनी बाजार में जगह बनाने के लालच में दवाओं में डाली जाने वाली सामग्री की मापजोख में अंतर करने लगीं। 
साथ ही, कोई आयुर्वेदिक कंपनी लोगों को इस बारे में सचेत नहीं करती थी कि उसकी दवाओं को यदि सही ढंग से नहीं लिया गया, तो उनके भी साइड इफेक्ट हो सकते हैं। यही नहीं, देश में आयुर्वेदिक दवाओं के मानकीकरण की व्यवस्थित और साझा व्यवस्था भी लंबे समय तक नहीं थी, जबकि ये दवाएं दशकों से देश-विदेश में बेची जा रही थीं।

यही वजह है कि दो साल पहले जब आयुर्वेद को संरक्षण प्रदान करने वाले आयुष विभाग को पहली बार मंत्रालय स्तरीय जगह दी गई तो आयुर्वेद के विस्तार में आ रही बाधाओं पर ज्यादा सोच-विचार होने लगा। इस प्रक्रिया में दिल्ली में छठी विश्व आयुर्वेद कांग्रेस का आयोजन (वर्ष 2014) हुआ तो उसमें इस चिंता को स्वर देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अब आयुर्वेद की दवाओं को पहले की तरह पुडिय़ा में बांध कर लोगों तक नहीं पहुंचाया जा सकता, बल्कि इसके लिए ठीक वैसे ही इंतजाम करने होंगे जैसे एलोपैथी के संबंध में किए जाते हैं। इसी प्रक्रिया के तहत आयुष विभाग ने आयुर्वेदिक दवाओं के क्लीनिकल ट्रायल की जरूरत पर सोचना शुरू किया, क्योंकि इसके बिना दवाओं की विश्वसनीयता प्रमाणित करना आज के जमाने में लगभग असंभव है।
इधर स्विट्जरलैंड ने आयुर्वेद को जो मान्यता प्रदान की है, उसके पीछे सरकार द्वारा इस प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति को उसका वाजिब स्थान दिलाने की कोशिशों का बड़ा योगदान है। स्विट्जरलैंड ने 250 आयुर्वेदिक नुस्खों को न सिर्फ मंजूर किया है, बल्कि अपने देश में मौजूद वैद्यों को प्रैक्टिस चलाने और अपने बनाए नुस्खे बेचने की छूट प्रदान की है। 
निश्चय ही आयुर्वेदिक दवाओं के उत्पादन, गुणवत्ता, चिकित्सीय पहलू की जांच और लाइसेंस आदि के बारे में नियंत्रण तथा निगरानी का तंत्र जितना मजबूत होगा, इन दवाओं तक लोगों की पहुंच का दायरा और इनका बाजार उतना ही अधिक विस्तृत होगा। सबसे ज्यादा जरूरी है आयुर्वेदिक दवाओं का क्लीनिकल ट्रायल।

गौरतलब है कि इस वर्ष (मार्च, 2016) में आयुष विभाग ने एक अधिसूचना लाकर हर नई आयुर्वेदिक दवा को बाजार में उतारने से पहले क्लीनिकल ट्रायल जरूरी बनाने का निर्देश जारी किया था। आयुष विभाग का मत था कि इससे न केवल आयुर्वेद को लेकर कायम संदेह दूर होंगे, बल्कि इससे इन दवाओं के निर्यात का दायरा भी बढ़ सकेगा। 
फिलहाल व्यवस्था यह है कि दवा निर्माता कंपनी कोई नई दवा बनाने से पहले राज्यों के प्राधिकरण से उसका लाइसेंस लेती है, लेकिन इसके लिए क्लीनिकल ट्रायल की जरूरत नहीं होती। इससे मौजूदा नियमन व्यवस्था में एक घालमेल-सा रहता है जो पश्चिम को आयुर्वेद पर संदेह करने के लिए मजबूर करता है।

इसके अलावा खुद आयुष विभाग का मानना है कि आयुर्वेदिक दवाओं के साथ एक समस्या यह है कि एक ओर तो कुछ नुस्खे ऐसे हैं जो ड्रग्स एक्ट में सूचीबद्ध हैं और उनका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी है, लेकिन कई अन्य पेटेंटशुदा दवाएं ऐसी भी हैं जो किसी भी तरह के परीक्षण से गुजरे बिना बाजार में पहुंच जाती हैं। कई बार दवा कंपनियां अपनी साख के बल पर ऐसी प्रोपराइटरी दवाओं को बेचने और भारी मुनाफा कमाने में सफल भी हो जाती हैं, पर इन्हीं वजहों से पूरे आयुर्वेद को कठघरे में खड़ा करने का मौका पश्चिमी दवा कंपनियों को मिलता रहा है। साफ है कि हर नई दवा को पहले परीक्षण (सेफ्टी टेस्ट) से गुजारा जाए और तभी राज्यों के प्राधिकरण उन्हें मंजूर करें तभी आयुर्वेद की मान्यता का वह रास्ता खुल सकता है जिसकी उसे वास्तव में दरकार है।