सपनों को कभी भी मरने मत दो, मंजिल अवश्य मिलेगी: आचार्य सत्यप्रकाश

  • 2016-09-25 12:00:00.0
  • श्रीनिवास आर्य
सपनों को कभी भी मरने मत दो, मंजिल अवश्य मिलेगी: आचार्य सत्यप्रकाश

व्यक्ति को सफलता का सोपान चढऩे के लिए अपना निशाना सदा अपने लक्ष्य पर गड़ाये  रखना चाहिए। सफलता से पूर्व एक बार नही कई बार असफलता का सामना करना पड़ेगा। किनारा पकडऩे से पूर्व एक बार नही-कई बार संसार रूपी नदिया का तीव्र प्रवाह आपके पैर उखाड़ेगा, पर अंतिम विजय आपके हौसले की होगी। दीपक जैसे ही जलता है वैसे ही आंधी का तीव्र झोंका उसे बुझाने के लिए सक्रिय हो उठता है। तब जैसे दीपक जलाने वाले व्यक्ति के हाथ उस समय दीपक की सुरक्षा में उसके चारों ओर लग जाते हैं, वैसे ही जब आप कोई सपना संजोते हैं तो उसकी सुरक्षा के लिए भी इस जगत के वाली के हाथ आपके चारों ओर आपका सुरक्षा चक्र बना लेते हैं, जिसे लोग ईश्वरीय अनुकंपा कहा करते हैं। ये पवित्र वचन हैं-आचार्य सत्यप्रकाश जी महाराज के। जो कि यहां 'भगत स्वीट्स' पर 'उगता भारत' की टीम के साथ विशेष बातचीत कर रहे थे।

आचार्य वर ने हमें बताया कि वह डी.यू. में इंग्लिश के प्रोफेसर रहे हैं, परंतु मन में भाव कुछ दूसरे ही थे। इसलिए वहां से मन उचट गया और उन्हेांने ईश्वर भक्ति और समाज सेवा को अपने जीवन का आदर्श बना लिया। यही कारण है कि वह आज भी अपने हजारों शिष्यों को विद्यादान करने के कार्य में लगे हैं? किसी भी प्रकार के प्रदर्शन या दिखावे से अपने आपको बचाकर चलने वाले आचार्य सत्यप्रकाश जी महाराज का कहना है कि प्रत्येक प्रकार का पद या प्रशंसा व्यक्ति के जीवन की आध्यात्मिक प्रगति को बाधित करती हैं। इसलिए मौन रहकर अपने कत्र्तव्य की पूत्र्ति करते रहना व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। सांसारिक आकर्षण से बचकर अधिक कार्य करने का यह अमोघ अस्त्र है।

पूज्यपाद आचार्यवर ने कहा कि जगत में इस समय जितना कोलाहल या अशांति है उसका मूल कारण वेद विद्या से संसार का विमुख हो जाना है। वेदादि आर्य शास्त्र संसार के मानव मात्र के लिए ही नही प्राणीमात्र के कल्याण हेतु बने हैं। इसलिए इन सद्शास्त्रों को मानवता के वैश्विक ग्रंथ मानकर आज के संसार में सर्वत्र इनकी शिक्षाओं का प्रसार होना आवश्यक है। तभी भारत को हम उसका प्राचीन गौरव और वैभव पुन: लौटा सकते हैं और उसे विश्व गुरू बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस समय विश्व को भारत के नेतृत्व और मार्गदर्शन की आवश्यकता है। जिसके लिए भारत के युवा को उठ खड़ा होना होगा।

श्री आचार्यवर का कहना है कि शिक्षा का भारतीयकरण करना समय की आवश्यकता है। परंतु भारतीयकरण का अभिप्राय किसी की मजहबी भावनाओं को ठेस पहुंचाना नही होकर भारतीय संस्कारों का विस्तारीकरण या प्रचार-प्रसार करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत में इस समय योग के प्रति लोगों की आस्था बढ़ी है, कारण कि लोगों ने एलोपैथी की भयानकता को बड़े मनोयोग से अनुभव कर लिया है। इस समय का लाभ हमें उठाना चाहिए और लोगों की भावनाओं के अनुसार ही इस उत्कृष्ट साहित्य का लेखन किया जाए साथ ही समाचार पत्रों को अपने धर्म संस्कृति और इतिहास के प्रति गंभीर बनाया जाए। जिससे कि उन्हें अपने देश को और अपने आपको समझने का अवसर मिल सके। आचार्यवर ने कहा कि 'उगता भारत' इस दिशा में जिस जागरूकता अभियान को चला रहा है उसके लिए इसका 'संपादक मंडल' साधुवाद और बधाई का पात्र है। 

उन्होंने कहा कि मैं इस समाचार पत्र के समस्त पाठकों का भी हार्दिक अभिनंदन करता हूं और उनसे अपेक्षा करता हूं कि इस  समाचार पत्र के हर अंक को पूर्ण मनोयोग से पढक़र उसकी सामग्री का अधिक से अधिक लाभ उठायें।