कौन सुनेगा बांग्लादेशी हिंदुओं की आवाज ?

  • 2016-11-30 05:00:17.0
  • मृत्युंजय दीक्षित
कौन सुनेगा बांग्लादेशी हिंदुओं की आवाज ?

भारत की राजनीति अल्पंख्यकवाद पर टिकी हुई है। लोकसभा व विधानसभा चुनाव आते ही सभी दल अल्पसंख्यकों के हितों को पूरे जोर शोर से उठाने लग जाते हैं। अल्पंसख्यकों के मुददे उठाते समय इन सभी दलों को देशहित व समाजहित की कतई चिंता नहीं रहती है। लेकिन जब हमारे ही पड़ोसी देश बांग्लादेश वा पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू अल्पंसख्यकों पर अत्याचार होते हैं तब कोई अल्पसंख्यकवादी नेता, बुद्धिजीवी व मानवाधिकारी उनके हितों की रक्षा करने के लिए आगे नहीं आता। यह एक अजब राजनैतिक व सामाजिक नियति है। बांग्लादेश व पाकिस्तान में हिंदू समाज पर अनगिनत अत्याचार हो रहे हैं यहां तक कि उनका अस्तित्व ही वहां पर संकट में आ गया है उस समय भी भारत का कोई भी धर्मनिरपेक्ष दल व मानवाधिकारी संगठन आवाज नहीं बुलंद कर रहा हैं । क्या बांग्लादेश में रहनें वाले हिंदू इन दलों के वोटबैंक नहीं रह गये हैं। बांग्लादेश व पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं की पूरे विश्व में कोई सुनवाई नहीं हो रही है। बांग्लादेश में 2009 में बनीं शेख हसीना सरकार से वहां बसे अल्पंसख्यक हिंदुओं को बड़ी उम्मीदें थीं कि इस सरकार में उनके जीवन में एक नयी सुबह अवश्य आयेगी लेकिन अब वह उम्मीद भी जा रही है। कारण यह है कि बांग्लादेश की वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग काफी उदारवादी विचारधारा की पार्टी मानी जा रही थी। वहीं दूसरी ओर भारत में भी एक बहुत ही मजबूत नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में आ गयी है। जिसमें लोगों से आंख में आंख डालकर बात करने का साहस है। लेकिन वहां पर हालात अच्छे होने की अपेक्षा और बिगड़ ही गये हैं।


    जनमानस को भारत की वर्तमान मजबूत सरकार और शेख हसीना की सरकार के मध्य अब तक के सबसे अच्छे संबंधों की दरकार थी वह तो हो रहाहे लेकिन फिलहाल पता नहीं यह वहां बसे हिंदुओं की नियति है कि उनके हालात और बिगड़ते जा रहे हैं। विश्व हिंदू परिषद के दिवंगत नेता अशोक सिंघल  अपने मंचों से यह मुददा उठाते भी रहते थे लेकिन वर्तमान समय में विश्व हिंदू परिषद का विदेशों में दबे कुचले हिंदुओ व भारतीयों की आवाज को उठाने का  काम भी कमजोर हो गया है। आज हर संगठन व समाज के हित में काम करने वालो लोगों को सारी की सारी उम्मीदें पीएम मोदी की सरकार से ही रह गयी है। देश के समस्त जनमानस व विदेशों में बसे हिंदू नागरिकों को पूरी उम्मीद है कि उनके अच्छे दिनों की आस इसी सरकार में ही संभव है। लेकिन अभी फिलहाल  बांग्लादेश में बसा हिंदू जनमानस अपने अस्तित्व को बचाने के लिए ही जोरदार संघर्ष कर रहा है।  

अभी विगत दिनों बांग्लादेश के चर्तित व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डा. अबुल बरकत ने अपना एक शोधपत्र जारी किया है।जिसमें उन्होनेंं दावा किया है कि यदि यहां पर बसे अल्पसंख्यक हिंदुओं का यही हाल रहा तो अगले 30 वर्षों अर्थात लगभग 2047 तक वहां से हिंदुओं का सफाया हो जायेगा। यह बात कोई और नहीं अपितु एक मुस्लिम अर्थशास्त्री कह रहा है जो वास्तव में बेहद चिंता का विषय है। 
बांग्लनादेश व पाकिस्तान के हिंदुओं के अस्तित्व को बचाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद व अन्य आनुषांगिक संगठनों को भी इस विषय पर गहराई से ध्यान देने व उनके हितों की रक्षा करने का कदम उठाने के लिए अतिरिक्त अभिनव प्रयास करने चाहिये। 

    डा. बरकत के शोध के अनुसार 1964 से 2013 तक धर्म के आधार पर एक करोड़ 13 लाख से अधिक हिंदुओं ने बांग्लादेश को छोड़ दिया है। बांग्लादेश में हिंदुओं के पलायन की प्रमुख वजह धार्मिक आधार पर उत्पीडऩ और अत्याचार है।शोध के अनुसार बांग्लादेश में हर रोज 632 हिंदू पलायन कर रहा है इस हिसाब से 2 लाख 30 हजार 612 हिंदू हर साल बांग्लादेश छोड़ देते हैं। बांग्लादेश ब्यूरो ऑफ सांख्यिकी के अनुसार इस समय बांग्लादेश में कुल हिंदू आबादी लगभग  एक करोड़ व 70 लाख के आसपास है जो कि कुल आबादी का 10.7 फीसदी ही है। वर्तमान बांग्लादेश को 1947 में पूर्र्वी पाकिस्तान कहा जाता था उस समय वहां की हिंदू आबादी 28 प्रतिशत थी। जब 1971 मंा पूर्वी पाकिस्तान पाकिस्तान से अलग हुआ तब पाकिस्तानी सेना ने वहां की हिंदू जनता पर  बर्बरता की सारी सीमायें लांघ दी थीं। हिंदू समाज के साथ चुन- चुनकर अमानवीय दुव्यर्वहार किया गया था । 

 हिंदू महिलाओं के साथ अमानवीय तरीके से बलात्कार की घटनाओं को अंजाम दिया गया। हिंदुओं के धार्मिक स्थलों व संपत्ति को तहस- नहस किया गया। पाकिस्तानी सैनिकों ने इस काम को पूरी क्रूरता के साथ अंजाम दिया था। प्राप्त आंकड़ों के हिसाब से पता चलता है कि बांग्लादेश में 1947 के बाद से अब तक 30 लाख हिंदुओं की धर्म के आधार पर हत्या की जा चुकी है। इससे मुस्लिम समाज की पोल भी खुल रही है।1971 की लड़ाई के दौरान 60 फीसदी हिंदुओं की आबादी ने भारत में राजनैतिक शरण ली।1981 मे हिंदुओं की आबादी लगभग 5 करोड़ थी लेकिन अब उसमें और अधिक गिरावट आ गयी है। 

  अभी विगत 30 अक्टूबर 2016 को ही बांग्लादेश में हिंदुओं के 15 मंदिरों को ध्वस्त किया गया तथा उनके कम से कम सौ घरों व व्यापारिक प्रतिष्ठानों को तोडफ़ोड़ करके ध्वस्त किया गया। हिंसक घटनाओं में कई हिंदू घायल हुये तथा हिंदू महिलाओं के साथ एक बार फिर कटटरपंथियों ने दुराचार की शर्मनाक वारदातों को अंजाम दिया। हालांकि बाद में दबाव पढऩे पर शेख हसीना सरकार ने कुछ उपद्रवियों को गिरफ्तार भी करवाया है। बांग्लादेश में हिंदू आज भी अपने आप को सुरक्षित नहीं महसूस कर रहे। बांग्लादेश का हिंदू जनमानस घर से बाहर निकलने में डरता है। वहां पर कोई हिंदू महिला अपने परम्परागत परिधानों में बाहर घूमने के लिए नहीं निकल सकती है। बांग्लादेश में बसी हर हिंदू महिला अपने आप को हर क्षण असुरक्षित महसूस करती है। बांग्लादेश में कई हिंदू पुजारियों की निर्ममतापूर्वक हत्या हो चुकी है। 

    यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि हमारे पड़ोसी बांग्लादेश में रह रहे हिंदुओं के दर्द की पीड़ा को नहीं समझ रहा। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ,राहुल गांधी , नसये डिजाइनर नेता अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी , लालू प्रसाद यादव , उप्र में मुस्लिम वोटां के सबसे बड़े सौदागर  सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव व उनका कुनबा , बसपा सुप्रीमो मायावती अन्य सभी छोटे- बड़े सभी दलों के पास इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करने का उनकी आवाज उठाने का समय ही नहीं हैं। अभी यदि कोई नागरिक किसी दुर्घटना वश मार दिया जाता है या फिर मर जाता है तो यही दल अपनी सारी हदों को पार कर जाते हैं। अभी उप्र का दादरी कांड और हैदराबाद का रोहित वेमुला कांड व जेएनयू की घटना इन दलों की पोल खोल रही है।

बांग्लादेश की मशहूर लेखिका तसलीम नसरीन के साथ पूर्ववर्ती सरकारों ने कैसा सलूक किया था यह पूरा देश जानता है। अभी जब भेपाल जेलब्रेक की घटना के बाद आठ आतंकी मार गिराये गये तब इन सभी नेताओं ने आतंकियों के समर्थन में ही अपने आसंू बहाने प्रारम्भ कर दिये थे। आज मुस्लिम तुष्टीकरण की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति का ही परिणाम हे कि आज पूरे भारत में अवैध बांग्लादेशी नागरिकों ने डेरा जमा लिया है। यह अवैध बांग्लादेशी नागरिक भारत में अल्पंसख्यक वाद की राजनीति का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या भी देश में 70 साल से राज कर रहे लोगों की नीतियों का ही परिणाम है।

   आगामी चुनावों देश के सभी तथाकथित  धर्मनिरपेक्ष दल मुस्लिम तुष्टीकण का अंधा खेल खेलेंगे व उसी के आसपास अपनी राजनीति का चक्रव्यूह रचेंगे लेकिन बांग्लादेश का जो हिंदू नागरिक अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है उसकी बात कोई नहीं सुनेगा। कारण यह है कि यह हिंदू जनमानस उनका वोटबैंक नहीं है।