आपसी सहयोग में हैं असीम संभावनाएं

  • 2016-10-05 09:30:06.0
  • डा. भरत झुनझुनवाला
आपसी सहयोग में हैं असीम संभावनाएं

भारत-पाक गतिरोध के चलते सदस्य देशों ने सार्क को दरकिनार करते हुए द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों को संपन्न करना शुरू कर दिया है। इस दृष्टिकोण को अपनाते हुए श्रीलंका के व्यापार मंत्री ने हाल में कहा, 'श्रीलंका का प्रयास है कि पाकिस्तान तथा भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौतों को और गहरा बनाया जाए। दूसरे क्षेत्रीय देशों जैसे चीन, सिंगापुर के साथ भी द्विपक्षीय समझौतों को संपन्न करने के प्रयास किए जा रहे हैं।' सार्क को छोडक़र सीधे द्विपक्षीय समझौते करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन यानी सार्क के आठ सदस्य देश हैं-भारत, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, पाकिस्तान और श्रीलंका। इस संगठन के कार्यों में भारत एवं पाकिस्तान के बीच कश्मीर विवाद रोड़ा बना हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा अफगानिस्तान, बांग्लादेश व भूटान ने पाकिस्तान में आयोजित होने वाले सार्क शिखर सम्मेलन में भाग न लेने का निर्णय लिया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र संघ के भाषण में कश्मीर को ही मुख्य मुद्दा बनाया था। इस विवाद के चलते सार्क को लकवा मार गया है। सार्क का उद्देश्य है कि क्षेत्र के देशों के बीच आपसी व्यापार एवं समन्वय को बढ़ाकर एक-दूसरे की समृद्धि एवं खुशहाली में सहयोग हो, परंतु कश्मीर विवाद के कारण पूरी व्यवस्था भटक जा रही है। इस गतिरोध के चलते सदस्य देशों ने सार्क को दरकिनार करते हुए द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों को संपन्न करना शुरू कर दिया है। इस दृष्टिकोण को अपनाते हुए श्रीलंका के व्यापार मंत्री ने हाल में कहा, 'श्रीलंका का प्रयास है कि पाकिस्तान तथा भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौतों को और गहरा बनाया जाए। दूसरे क्षेत्रीय देशों जैसे चीन, सिंगापुर के साथ भी द्विपक्षीय समझौतों को संपन्न करने के प्रयास किए जा रहे हैं।'

सार्क को छोडक़र अब सीधे द्विपक्षीय समझौते करने के प्रयास किए जा रहे हैं। भूटान में भी मांग उठ रही है कि चीन के साथ व्यापार बढ़ाया जाए। नेपाल का दृष्टिकोण बदलता रहता है। पूर्व प्रधानमंत्री ओली का स्पष्ट झुकाव चीन की ओर था। वर्तमान प्रधानमंत्री प्रचंड की दृष्टि चीन तथा भारत के बीच समभाव की है। सार्क देश दो बड़े गुटों के बीच लटके हुए हैं। एक तरफ पाकिस्तान-चीन का गठबंधन है, तो दूसरी तरफ भारत। भौगोलिक दृष्टि से दक्षिण एशिया में पाकिस्तान की तुलना में भारत भारी पड़ता है। पाकिस्तान के अतिरिक्त हमारी सरहद नेपाल, भूटान, बांग्लादेश से जुड़ी है। श्रीलंका एवं मालदीव समुद्री मार्ग से हमारे ज्यादा नजदीक हैं। हमारे सामने चुनौती है कि अपनी भौगोलिक स्थिति को भुनाते हुए सार्क देशों को अपने से जोड़ लें, जिससे इस क्षेत्र का विकास कश्मीर विवाद से ग्रास न कर लिया जाए। इस दिशा में हमें पाकिस्तान को छोडक़र शेष देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौता करना चाहिए। एक संभावना है कि हम 'बंगाल की खाड़ी मुक्त व्यापार क्षेत्र' बनाएं। इस मुक्त व्यापार क्षेत्र में नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, मालदीव एवं श्रीलंका को जोड़ा जा सकता है।

म्यांमार, लाओस तथा दूसरे पूर्वी एशिया के देशों को भी जोड़ा जा सकता है। दूसरी संभावना है कि हम 'हिंद महासागर मुक्त व्यापार क्षेत्र' बनाएं। इसमें ऊपर बताए देशों के साथ अफगानिस्तान तथा ईरान को जोड़ा जा सकता है। खबर है कि भारत सरकार द्वारा बीबीआईएन यानी भूटान, बांग्लादेश, इंडिया तथा नेपाल के बीच मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। यह प्रयास सही दिशा में है, परंतु इनमें भूटान तथा नेपाल छोटे देश हैं। व्यावहारिक स्तर पर यह भारत एवं बांग्लादेश के बीच मुक्त व्यापार क्षेत्र रह जाता है। इससे बहुत आगे सोचने की जरूरत है। भारत को सभी विकासशील देशों के बीच मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने की पहल करनी चाहिए यानी भौगोलिक आधार के स्थान पर आर्थिक आधार को पकडऩा चाहिए। कारण कि सभी विकासशील देशों के आर्थिक हितों का विकसित देशों से दो विषयों पर सीधा गतिरोध है। पहला विषय पेटेंट कानून का है। आज विश्व के अधिकतर पेटेंट विकसित देश की कंपनियों के पास हैं। उनके द्वारा पेटेंट कानूनों की आड़ में तमाम माल को महंगा बेचा जा रहा है, जैसे जीवनदायिनी दवाओं को। विकासशील देशों के हित में है कि पेटेंट कानून को ढीला कर दिया जाए। डब्ल्यूटीओ की दोहा वार्ता में इस मंतव्य को स्वीकार किया गया था, परंतु बाद में इसे निरस्त कर दिया गया। इसके विपरीत विकसित देशों के हित में है कि इसे और सख्त बनाया जाए, जिससे वे अपने माल को और महंगा बेच सकें।

विकसित एवं विकासशील देशों के बीच दूसरा गतिरोध कृषि उत्पादों के व्यापार का है। 1995 में डब्ल्यूटीओ संधि पर हस्ताक्षर होते समय विकसित देशों ने आश्वासन दिया था कि कृषि उत्पादों पर 10 वर्षों के भीतर समझौता कर लिया जाएगा, लेकिन इस मुद्दे पर तनिक भी प्रगति नहीं हुई। विकासशील देशों के लिए यह महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। हमारे कृषि उत्पादों के लिए विकसित देशों के बाजारों को खोल दिया जाए तो हमारे करोड़ों किसान लाभान्वित होंगे। लेकिन विकसित देश इसमें रोड़ा अटकाए हुए हैं, चूंकि अपनी खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए वे अपनी जरूरत के कृषि पदार्थों का उत्पादन स्वयं करना चाहते हैं। इस प्रकार डब्ल्यूटीओ का वर्तमान ढांचा विकासशील देशों के हितों के विपरीत है। यही कारण है कि 20 वर्षों में वैश्विक आर्थिक समानता स्थापित करने में प्रगति नहीं हुई है। आज भी विकसित देशों के 25 प्रतिशत लोगों के पास विश्व की 75 प्रतिशत आय है। वैश्विक आय के इस अन्यायपूर्ण बंटवारे को डब्ल्यूटीओ की परिधि में दूर नहीं किया जा सकता है। विश्व अर्थव्यवस्था की मूलभूत विसंगति को दूर करने के लिए जरूरी है कि सभी विकासशील देश एकजुट होकर विकसित देशों का सामना करें। अत: हमें 'विकासशील देश मुक्त व्यापार क्षेत्र' बनाने का प्रयास करना चाहिए। इस दिशा में वर्तमान गुटनिरपेक्ष आंदोलन सहायक हो सकता है। इस आंदोलन की शुरुआत पचास के दशक में हुई थी।

तब दुनिया के दो केंद्र अमरीका और रूस थे। भारत के नेहरू, मिस्त्र के नासर तथा यूगोस्लाविया के टीटो ने विकासशील देशों के लिए इन दोनों गुटों के बीच का रास्ता बनाने के लिए इस आंदोलन का गठन किया था।

आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। आज दुनिया का एकमात्र ध्रुव अमरीका रह गया है, जो विकसित देशों की अगुवाई कर रहा है। विकसित देशों के इस समूह के सामने विकासशील देशों का कोई एकजुट संगठन विद्यमान नहीं है। रूस की स्थिति विकासशील देशों सरीखी ही हो गई है। अत: हमें गुटनिरपेक्ष आंदोलन को पुनर्जीवित कर इसे नया आकार देना चाहिए। रूस तथा चीन के साथ सहयोग करके विकसित देशों में आपसी व्यापार बढ़ाना चाहिए। सभी विकासशील देश आपस में तकनीकों का आदान-प्रदान करें, तो विकसित देशों पर हमारी निर्भरता कम हो जाएगी। पेटेंट कानूनों से हो रहा हमारा नुकसान कम हो जाएगा। इस परिप्रेक्ष्य में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रति भारत की उदासीनता दुखदाई है। अमरीकी बरगद के विशाल वृक्ष के नीचे हमारा पौधा बड़ा नहीं हो सकेगा। बरगद की ट्रीमिंग करके सैकड़ों छोटे पौधों को बढऩे का अवसर प्रदान करना चाहिए। 

अपने क्षुद्र स्वार्थ की सिद्धि के लिए विकासशील देशों के हितों को दरकिनार करते हुए अमरीका से नहीं जुडऩा चाहिए। देखा जाता है कि ट्रेड यूनियनों के दुष्ट नेता मालिक के साथ मिलकर श्रमिकों के हितों को बेच देते हैं। इसी प्रकार भारत को अमरीका के साथ मिलकर विकासशील देशों के हितों को नहीं बेचना चाहिए।