सडक़ पर समान अधिकार का सवाल

  • 2016-10-11 06:30:56.0
  • उगता भारत ब्यूरो
सडक़ पर समान अधिकार का सवाल

राजेंद्र रवि
बिहार की राजधानी पटना में 25 सितंबर 2016 को 'सडक़ पर समता, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय' पर बहु-आयामी कार्यक्रम का आयोजन हुआ। पटना के विभिन्न मंचों की ओर से अभी तक के होते रहे आयोजनों से यह अलहदा किस्म की पहल थी। इसका आयोजन दिल्ली के एक समूह 'इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड सस्टेनेबिलिटी' (आइडीएस) ने किया था। कार्यक्रम की शुरुआत 'शहर में गतिशीलता की झलक' के सवाल को दर्शाते हुए एक प्रदर्शनी से की गई। इसमें पथ-पथिकों, साइकिल चालकों और साइकिल रिक्शा से जुड़े भारतीय समाज और सडक़ पर इसकी पूर्व में उपस्थिति, वर्तमान की चुनौतियों और भविष्य की उड़ान को दर्शाया गया था। गांधी की साइकिल चलाते हुए और उनकी पैदल यात्रा की तस्वीरें मुख्य रूप से लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही थीं; वहीं रिक्शे से जुड़े कई पैनल लगे थे जो उनके इतिहास, वर्तमान और भविष्य की ओर इशारा कर रहे थे। आयोजकों ने विभिन्न देशों की सडक़ों पर हो रहे परिवर्तन और बहसों को उन स्थानों के चित्रों के माध्यम से लोगों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की थी। लगभग तीस पैनलों की श्रृंखला में लगाई गई बहुत ही सुसंगठित प्रदर्शनी, करीने से अपनी बात बिहार के अलग-अलग शहरों से आए प्रतिभागियों से कह रही थी। इस प्रदर्शनी की खास बात यह थी कि इसकी हर बात हमारे इतिहास को उकेरती थी और मन को भी।

आइडीएस ने पटना की सडक़ों पर चल रहे साइकिल रिक्शे के योगदान और अभी की चुनौतियों पर एक व्यापक अध्ययन किया है। इसकी मुकम्मल रपट भी इस समारोह में जारी की गई। यह रपट पटना शहर के विभिन्न इलाकों के साइकिल रिक्शा चालकों, मिस्त्रियों, मालिकों और सवारियों के साथ इंटरव्यू और सामाजिक सरोकारों से जुड़े समूहों, व्यक्तियों, बुद्धिजीवियों के साथ बातचीत के आधार पर तैयार की गई है। इस रपट में रिक्शा और सडक़-परिवहन की नीतियों पर भी प्रकाश डाला गया है। इसमें आकड़ों का बहुत ही सटीक विश्लेषण किया गया है। कुछ रिक्शा चालकों, मिस्त्रियों और मालिकों की बातें भी कायदे से प्रस्तुत की गई हैं जो उनके योगदान और परेशानियों को दर्शाती हैं।

इस अध्ययन के आधार पर इन्होंने अनुशंसा की है कि ''सभी वाहनों-मोटरवाहनों और गैर-मोटर वाहनों, दोनों को एक संयुक्त परिवहन-व्यवस्था के दायरे में रखते हुए उस पर लोकतांत्रिक ढंग से परिचालन की प्रणाली बनाई जाए और भेदभावपूर्ण रवैए को समाप्त किया जाए। साइकिल रिक्शा से जुड़े तमाम कायदे-कानूनों की समीक्षा और बदलाव आज की स्थानीय और वैश्विक जरूरतों और संदर्भो में की जानी चाहिए, क्योंकि आज विश्व में रिक्शे के प्रति नजरिये में व्यापक बदलाव आ रहा है। सभी चौड़ी सडक़ों पर साइकिल रिक्शा लेन और संकरी सडक़ों तथा सार्वजनिक परिसरों को गैर-मोटर वाहनों के प्रवेश के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए। रिक्शा चालकों के लिए रैनबसेरा, सस्ती दर पर पौष्टिक आहार, मुफ्त स्वास्थ्य जांच और दवा की सुविधा सरकार की ओर से की जानी चाहिए। शहर में सडक़ों के ढांचागत विकास और विस्तार में गैर-मोटर वाहनों की अनुकूलता की प्राथमिकता कानूनन अनिवार्य बनाया जाए। 'एकल साइकिल रिक्शा मालिक पद्धति' और 'बहुसंख्यक रिक्शा पद्धति' दोनों को कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए और 'पड़ोसी साइकिल रिक्शा नेटवर्क' योजना बनाई और लागू की जानी चाहिए। साइकिल रिक्शा परिवहन के प्रोत्साहन के लिए रिक्शा निर्माताओं, रिक्शा मालिकों और मिस्त्रियों व चालकों को बैंक लोन, व्यवसाय के लिए भूमि आवंटन तथा विभिन्न करों से छूट मिलनी चाहिए। 

आज के समय में साइकिल रिक्शे का संदर्भ बहुत व्यापक हो गया है, इससे न सिर्फ हमारे स्थानीय कारीगरों को रोजगार और बढ़ावा मिलेगा बल्कि इससे जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से भी राहत मिलेगी। इसलिए इनकी डिजाइन को समाज के अनुकूल किया जाए। इसे वैज्ञानिक प्रगति का लाभ दिया जाए। इसके लिए जरूरी है कि हमारे राजनीतिज्ञ, योजनाकार, नौकरशाह, वैज्ञानिक, शहरी विकास के नीति नियंता और समाज परिवर्तनकर्मी इस मसले में रुचि लें और पहल करें।'' इस रिपोर्ट का लोकार्पण बिहार के परिवहन मंत्री चंद्रिका राय, पटना के महापौर अफजल इमाम, दिल्ली आइआइटी की परिवहन विशेषज्ञ गीतम तिवारी, अन्विता अरोड़ा, मुंबई से शहरी मामलों के रणनीतिकार राजेंद्र भिसे, बिहार के पूर्व मंत्री रामदेव यादव के सान्निध्य में सामूहिक रूप से किया गया, जिसमें काफी तादाद में रिक्शा समूह से जुड़े लोग भी शामिल थे। इस अध्ययन और समारोह के बारे में आयोजकों ने बताया कि पटना में अध्ययन से पूर्व इन्होंने राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र के चौबीस शहरों में ऐसा ही अध्ययन किया, जिसके आधार पर साइकिल रिक्शा की खातिर एक मुकम्मल नीति बनाने के लिए एक अभियान चलाया गया। परिणामस्वरूप 2006 में जब केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय शहरी परिवहन नीति बनाई तब उसमें साइकिल रिक्शा, साइकिल और पद-पथिकों के सवाल को भी शामिल किया। उस नीति में साफ-साफ कहा गया है कि सरकार लोगों की गतिशीलता को बढ़ाएगी, न कि मोटरवाहनों को।

पटना शहर ऐतिहासिक शहरों में से एक है। साइकिल रिक्शा यहां की हर सडक़ पर विराजमान रहा है और लोगों की जिंदगी में भी। पटना रेलवे स्टेशन के गेट पर पहले रिक्शों का ही साम्राज्य था, लेकिन अब उन्हें वहां से बेदखल कर दिया गया है। आज पटना प्रदूषित शहरों की सूची में अग्रणी है। इसकी एक वजह मोटरवाहनों की बढ़ती संख्या है, जो वायु और ध्वनि प्रदूषण तो बढ़ा ही रही है, सडक़-दुर्घटना और सामाजिक तनाव को भी बढ़ा रही है।

 रिक्शा प्रदूषण-रहित वाहन है और लगभग आठ दशकों से पटना के शहरी समाज से इसका सरोकार रहा है, पर अब धीरे-धीरे दरकिनार होता जा रहा है। सडक़ों से इसके अधिकार छिनते चले जा रहे हैं। सामाजिक-राजनीतिक तौर पर इसके पक्ष में उठती आवाजें बंद हो गई हैं। लगता है, साइकिल रिक्शे की सडक़ से बेदखली के मामले में सारी विचारधाराओं के लोगों के बीच गठजोड़ बन गया है।
यही वजह है कि जिन सडक़ों पर समता, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की गूंज उठा करती थी और ये नारे लगते थे 'सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है', 'कमाने वाला खाएगा, लूटने वाला जाएगा, नया जमाना आएगा', उससे उलट आज यहां की हर धारा का राजनैतिक नेतृत्व यह कहता है कि सडक़ों पर कारों को चलने की जगह नहीं है तो रिक्शे को कैसे जगह मिलेगी। वे यह भी कहते हुए गुरेज नहीं करते कि आधुनिकता की दौड़ में रिक्शे के लिए कहां जगह है! इस बात को कुछ दूसरी तरह से परख कर देखें। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, पटना में कारों की संख्या चार प्रतिशत है, मगर यही कारें पटना की सडक़ों पर राज करती हैं। शहर के सौ प्रतिशत लोग किसी न किसी हद तक पैदल चलते हैं जिनमें कार वाले लोग भी शामिल हैं। लेकिन पैदल राहगीरों के लिए कहीं भी सुरक्षित चलने के रास्ते नहीं हैं। बड़ी संख्या में नागरिक साइकिल से चलते हैं। सरकार भी साइकिल बांटती है और इसे बढ़ावा देती है! लेकिन वे सब अपनी जान जोखिम में डाल कर सडक़ पर चलते हैं। साइकिल रिक्शा आम आदमी से लेकर खास आदमी की सवारी है, लेकिन इसकी हालत बदतर ही होती जा रही है। ऐसे में जो लोग समाज और राजनीति में समता, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की बात करते हैं, वे सडक़ पर समान अधिकार की बात नहीं करेंगे तो कौन करेगा? मगर वही चुप हैं तो इसका मतलब क्या लगाया जाए! गीतम तिवारी ने कहा कि विकसित देशों में एक हजार में नौ सौ नब्बे लोगों के पास कारें हैं और उनकी जिंदगी कारों से आने-जाने में ही गुजर जाती है। शारीरिक श्रम नहीं करने की वजह से वे मोटापा, ब्लड प्रेशर और हृदय रोग के शिकार हो रहे हैं। डॉक्टर इन्हें शारीरिक श्रम करने को कहते हैं। 

ये लोग जिम में जाकर साइकिल चलाते हैं और रैंप पर दौड़ लगाते हैं। क्या हम भी उसी ओर नहीं बढ़ रहे हैं? अगर हमें इससे बचना है तो 'एक्टिव ट्रांसपोर्ट' को अपनाना होगा, जो हमारे समाज में है और हमारी जरूरतभी है, वह है पैदल यात्रा, साइकिलिंग और साइकिल रिक्शा।

आज साइकिल रिक्शा यूरोप और अमेरिका में आ रहा है और हम उसे हटा रहे हैं, यह आधुनिकता नहीं है। अन्विता अरोड़ा ने कहा कि जिस समाज में सबसे कमजोर लोग सुरक्षित नहीं हैं वह समाज तरक्की नहीं कर सकता। जिस सडक़ पर एक बूढ़ी औरत और छोटी बच्ची आराम से आ-जा सकती हैं, वही सडक़ सबसे आधुनिक है। 

राजेंद्र्र भिसे ने बताया कि रिक्शे की कोई जनगणना नहीं होती, तो फिर इसके लिए योजना कैसे बनेगी! योजना के लिए सबसे पहले संख्या जानना जरूरी है ताकि बजट में उसके लिए प्रावधान किया जा सके। परिचर्चा में शामिल रिक्शा समूह के लोगों ने शहर की सडक़ों से हो रही रिक्शे की बेदखली और गैरबराबरी का मुद््दा उठाया और कार्यक्रम की सराहना की। बिहार के परिवहन मंत्री चंद्रिका राय ने कहा कि हम यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेंगे कि इनका हक सुरक्षित रहे। महापौर अफजल इमाम ने कहा कि इनके लिए बनाए गए रैनबसेरों से अवैध कब्जा हटाया जाएगा और आप कोई नीति-मसविदा तैयार करते हैं तो हम इसे आगे बढ़ाएंगे। यह आयोजन एक नई दिशा और चिंतन की ओर बढऩे की एक छोटी पहल है। उम्मीद है कि जब बात निकली है तो दूर तलक जाएगी और सडक़ पर समता, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के सपने को साकार करने में मददगार बनेगी।