हाशिए पर विकास मॉडल की मूलभूत बहस का औचित्य

  • 2016-10-10 12:30:54.0
  • डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
हाशिए पर विकास मॉडल की मूलभूत बहस का औचित्य

भारत में विकास का लक्षण है ज्यादा से ज्यादा भौतिक सुविधाओं की लालसा पर ज्यादा से ज्यादा नियंत्रण रखना। उतना भोग करना, जितना इस शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए पर्याप्त है। भारत में विकास का लक्षण है ऐसा वातावरण और पर्यावरण बनाना, जिसमें किसी को रोग न हो। पश्चिम में इस प्रकार का वातावरण बनाने के प्रयासों को पिछड़ापन कहा जाता है। पश्चिम में बीमार के अस्पताल में आ जाने पर उसका सर्वोत्तम इलाज ही विकास कहलाता है। भारत में विकास का अर्थ है कि व्यक्ति को अस्पताल में जाने की जरूरत ही न पड़े।

जब यहां अंग्रेज शासक बनकर आए थे, तो उनका यही कहना था कि भारत विकास की दौड़ में बहुत पिछड़ गया है। यहां के लोग अद्र्धविकसित हैं। इसलिए इसको विकसित करना उनका कत्र्तव्य है। अंग्रेजों के चले जाने के बाद और यूनियन जैक का तारा अस्त हो जाने के बाद यही काम अमरीका ने संभाल लिया। विकास की भारतीय और पश्चिमी अवधारणा में स्पष्ट तौर पर अंतर है और यह अंतर काफी गहरा है। विकास की भारतीय दृष्टि अंतर्मुखी है और पश्चिम की बहिर्मुखी है। मानव विकास की तमाम यात्राएं, चाहे वे पूर्वी दर्शन की यात्रा हो या फिर पश्चिमी दर्शन की, यह मानकर चलती हैं कि मनुष्य के विकास की कहानी पशु के विकास से प्रारंभ होती हैं, क्योंकि भारतीय चिंतकों ने भी मनुष्य को मूलत: पशु स्वीकार किया है। पश्चिम में जब जीव विज्ञान का विकास हुआ, तो वहां तो मनुष्य का वर्गीकरण पशुओं के साथ ही हुआ। इसका स्पष्ट अर्थ यह हुआ कि विकास का अर्थ पशुता से प्रारंभ की गई उर्धवमुखी यात्रा है। यहां तक तो शायद मतभेद की गुंजाइश नहीं है, परंतु उसके बाद मतभेद की गुंजाइश के आधार बढ़ते जाते हैं। पश्चिम की दृष्टि में (अब तक की उसकी तमाम गतिविधियों, क्रियाकलापों और कर्मों को देखकर) विकास का भाव इस पशु को ज्यादा से ज्यादा भौतिक सुविधाएं प्रदान करने का है। उसे सजधज कर रहना है। उसके लिए बढिय़ा मकान होने चाहिए, उसके लिए अन्य सभी सुविधाएं होनी चाहिएं, जिससे उसे कम से कम श्रम करना पड़े। उसके पास जितनी ज्यादा चीजों का अंबार है, वह उतना ही ज्यादा विकसित है। नए-नए यंत्र, नए-नए उपकरण उसकी पहुंच में होने चाहिएं। जाहिर है कि इसी दृष्टि से इन उपकरणों का उत्पादन भी होना चाहिए। अपरिमित उत्पादन और उसका अपरिमित भोग आधुनिक दृष्टि से पश्चिम इसी को विकास का मानदंड मानता है।

उत्पादन और भोग में केवल वस्तुएं ही सम्मिलित नहीं हैं, बल्कि विविध प्रकार की सेवाएं भी शामिल हैं। ज्यादा से ज्यादा सेवाओं का अधिग्रहण और उपभोग पश्चिम के किसी व्यक्ति को विकसित बनाता है। यदि इसको सूत्र रूप में कहना हो, तो भौतिक विकास ही पश्चिम की दृष्टि में विकास है। भौतिक विकास तभी संभव है, यदि मानवीय इच्छाएं, इंद्रियां और महत्त्वकांक्षाएं अनियंत्रित हो जाएं। अत: विकास के लिए यह भी जरूरी है कि अतृप्त इच्छाएं ज्यादा से ज्यादा भोग की कामना करती रहें। यह विकास का भौतिक पक्ष है। पश्चिम के व्यक्ति को जिस देश में यह दिखाई नहीं देता, उसकी दृष्टि में वह देश अविकसित है, और उसके रहने वाले लोग पिछड़े हुए। एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। जिस समय इस देश में अंग्रेज शासक बन कर आए, उस समय यह देश आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न देश था। प्रो. धर्मपाल ने इसे आंकड़ों से स्थापित किया है। परंतु इन सब के बावजूद अंग्रेजी शासकों, विद्वानों और चिंतकों ने भारत को अविकसित और पिछड़ा हुआ देश माना। इसका अर्थ यह लिया जा सकता है कि उन्हें यहां के लोगों में भौतिक वस्तुओं के प्रति अपरिमित लालसा नजर नहीं आई होगी। जाहिर है इस एक ही कसौटी पर भारत अविकसित ठहरा दिया गया  और इसको विकसित करने के उन्होंने अनेक प्रयास किए। हमारे विद्वान अभी तक भी यह स्वीकार करते हैं कि भारत के विकास में अंग्रेजी शासन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

भारत में विकास की अवधारणा इसके विपरीत है। यहां विकास का लक्षण है ज्यादा से ज्यादा भौतिक सुविधाओं की लालसा पर ज्यादा से ज्यादा नियंत्रण रखना। उतना भोग करना, जितना इस शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए पर्याप्त है। भारत में विकास का लक्षण है ऐसा वातावरण और पर्यावरण बनाना, जिसमें किसी को रोग न हो। पश्चिम में इस प्रकार का वातावरण बनाने के प्रयासों को पिछड़ापन कहा जाता है। पश्चिम में बीमार के अस्पताल में आ जाने पर उसका सर्वोत्तम इलाज ही विकास कहलाता है। भारत में विकास का अर्थ है कि व्यक्ति को अस्पताल में जाने की जरूरत ही न पड़े। विकास को लेकर दोनों अवधारणाओं का यह स्पष्ट अंतर है। लेकिन ऐसा मानना पड़ेगा कि पिछली लगभग दो शताब्दियों से कम से कम भारत सरकार और उसके विशेषज्ञों ने विकास के पश्चिमी मानदंडों को स्वीकार किया है।

विकास की अवधारणा को लेकर यह लड़ाई देश की स्वतंत्रता के उषाकाल में ही प्रारंभ हो गई थी। आजादी से कुछ अरसा पहले पंडित जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी में भविष्य के भारत में विकास के मॉडल को लेकर गहरा विवाद छिड़ गया था। महात्मा गांधी भारत का विकास हिंद स्वराज के मॉडल पर करना चाहते थे। यह मॉडल अपनी आत्मा, प्रकृति और स्वभाव में भारतीय मॉडल कहा जा सकता है। जवाहर लाल नेहरू ने उसे सिरे से अस्वीकार ही नहीं किया, बल्कि गांधी जी के लिए लगभग अपमानजनक शब्दों का भी प्रयोग किया। नेहरू ने गांधी जी को लिखा था कि बीस साल पहले जब मैंने हिंद स्वराज पढ़ा था, तब भी मुझे वह अप्रासंगिक ही लगा था। अब आज 1947 में तो वह रद्दी की टोकरी में फेंकने के योग्य है। नेहरू जी का भाव कुछ-कुछ इस प्रकार का था कि उनकी दृष्टि में इस विषय पर महात्मा गांधी से बात करना भी समय की बर्बादी होगी। गांधी जी विकास के लिए गांव को इकाई के रूप में स्वीकारते थे, जबकि नेहरू ने लिखा-गांव के लोग तो बौद्धिक दृष्टि से पिछड़े हुए होते हैं। यहां पंडित नेहरू और पश्चिम के विशेषज्ञ लगभग एक ही भाषा बोलते हुए नजर आते हैं। यह जरूर आश्चर्यचकित करता है कि नेहरू ने पूरी ईमानदारी से गांधी के विकास के मॉडल को नकार दिया, लेकिन गांधी इसके बावजूद नेहरू को नकारने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।

आज भी भारत विकास के उसी मॉडल पर चला हुआ है, जो पश्चिम का मॉडल है, पंडित नेहरू का मॉडल है। विकास का यह मॉडल प्रकृति से लडऩे का मॉडल है।  

प्रकृति को पराजित करने का मॉडल है। उसी का प्रभाव है कि ओजोन परत में छेद हो रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, तापमान बढ़ रहा है, नई बीमारियां आ रही हैं। लेकिन इसके बावजूद भारत तो आंखें मूंदकर विकास के मामले में अमरीका का पिछलग्गू बना हुआ है। भारत को ऊर्जा की आवश्यकता है। अमरीका उसके लिए हमें अपने रियेक्टर बेच रहा है और साथ ही परमाणु संधि से विकलांग बना रहा है। हम अपनी जल ऊर्जा को छोडक़र परमाणु ऊर्जा के पीछे भाग रहे हैं। भीमकाय अमरीकी व्यावसायिक कंपनियां इस देश में आ रही हैं। कच्चा माल विदेश में जा रहा है। किसान को मालिक से मजदूर बनाया जा रहा है। कभी अंग्रेजों ने पुलिस के बल पर नील की खेती करवाई थी। हजारों किसान मारे थे और भुखमरी का शिकार हो गए थे। विकास के तमाम दावों के बावजूद इस मॉडल में विकसित हुआ। मनुष्य मूलत: वहीं खड़ा हुआ है, जहां शिकारी युग का मनुष्य खड़ा था। पश्चिम में विकास के दो सिद्धांत, जो सर्वाधिक प्रचलित हैं, वे साम्यवादी सिद्धांत और पूंजीवादी सिद्धांत के नाम से जाने जाते हैं। ऊपर से देखने पर लगता है कि शायद इन दोनों मॉडलों में गहरा अंतर है, लेकिन दोनों भौतिक दर्शन के सिद्धांत हैं। अबाध उत्पादन के सिद्धांत पर आधारित हैं। फर्क केवल इतना है कि पूंजीवाद में उत्पादन के साधनों पर कब्जा चंद व्यक्तियों का है, जबकि साम्यवाद में यही कब्जा राज्य का है। विकास की भारतीय परिकल्पना पुरुषार्थ चतुष्टय पर आधारित है। भौतिक कामनाओं का निषेध नहीं है, परंतु उस पर धर्म का नियंत्रण है। अंतिम लक्ष्य तो मोक्ष है ही। इसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के नाम से जाना गया है।