जयललिता को संघर्ष ने बनाया जन-जन की अम्मा

  • 2016-12-09 06:30:35.0
  • उगता भारत ब्यूरो

जयललिता को संघर्ष ने बनाया जन-जन की अम्मा

रमेश ठाकुर
जयललिता के साथ ही राजनीति के एक दुर्लभ अध्याय का मार्मिक व दुखद अंत हो गया। जयललिता अपने पीछे राजनीति का एक वृहद दर्शन शास्त्र छोड़ कर विदा हुई हैं। धूर्तता, मक्कारी और भ्रष्ट्राचार में लिप्त बदबूदार भारतीय राजनीति में भी जिस तरह अपनी वैचारिक सुगंध छोड़ कर जयललिता गई हैं वह स्वार्थी राजनितज्ञों के लिए सीख हो सकती हैं। चलचित्र दुनिया छोड़ राजनीति में आकर करोड़ो लोगों की उम्मीद बनना यह सब उनके व्यक्तित्व में ही संभव था। उनके निधन की खबर के बाद हताशा व हजारों का बिलखना द्योतक है। यह उनके जननेता होने का प्रमाण है। सभी के दिलों पे राज करने वाली अलौकिक अम्मा के जादुई व्यक्तित्व का असर उनके चाहने वालों के हृदय में ताउम्र रहेगा। अम्मा अपनी जिंदगी के लिए पिछले ढाई माह से लड़ रही थी, आखिर में पांच दिसंबर की रात में मौत से हार गईं। और इस नश्वर दुनिया से विदा ले ली। शाही जीवन जीने की शौकीन जयललिता का बचपन तो आराम से गुजरा था, लेकिन राजनीति में उनका पदार्पण संघर्ष से भरा रहा। सन् 1987 को मधुर गोपालन रामचंद्रन यानी एमजीआर की मौत के बाद पूरी तरह से एआईएडीएमके पर नियंत्रण हासिल करना हो या व्यक्तिगत जीवन। नेता प्रतिपक्ष की भूमिका हो या मुख्यमंत्री के रूप में शासन। वह हमेशा से सख्त तेवर वाली महिला नजर आईं। वह बहुत ही जिद्दी थी। विधानसभा में फटी हुई साड़ी और अपमान के आंशु लेकर जयललिता ने कसम खाई की तमिलनाडु विधानसभा में तभी लौटूंगी जब मुख्यमंत्री बनूंगी, और हुआ भी ऐसा ही। दूसरे नेताओं को भी ऐसी बहुमुखी प्रतिभा की धनी और लोकप्रिय जननेत्री से कुछ सीखना चाहिए। तमिलनाडु की सडक़ों पर रोते-बिलखते आम नागरिकों को देखकर पता चलता है कि जे. जयललिता के रूप में उन लोगों ने अपना कोई बेहद करीबी खो दिया है। अम्मा सचमुच ही जनता की अपनी नेता थीं और मजबूत नेतृत्व की मिसाल भी। प्रदेश की जनता पर मजबूत पकड़ बनाने के साथ जयललिता पहली बार 1991 में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं। अम्मा उस समय प्रदेश की सबसे कम आयु की मुख्यमंत्री थीं। हालांकि 1996 में हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। लेकिन तब तक जयललिता एक मजबूत राजनीतिक हस्ती बन चुकी थीं। लोगों का अटूट विश्वास उन पर था। अगले चुनाव में वह भारी बहुमत के साथ कब्जा किया। बेसहारा, दीनदुखी व अन्याय के खिलाफ उनकी लड़ाई हमेशा जारी रही है। अम्मा की जब दोबारा सरकार बनीं जनहित के लिए कई कठोर फैसले लिए। पूरे राज्य में लॉटरी प्रतिबंधित कर दी। प्रतिबंध के खिलाफ कई कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। अम्मा ने उन सभी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। खेती करने के लिए सालों से दी जाने वाली किसानों की मुफ्त बिजली पर रोक लगा दी। राशन की दुकानों में चावल की कीमत बढ़ा दी। सार्वजनिक परिवहन मसलन बस-टैऊक्सी का किराया बढ़ा दिया और मंदिरों में जानवरों की बलि पर रोक लगा दी। अम्मा सिर्फ एक नाम है। लेकिन काम अनगिनत ! शिक्षा, फिल्म, वकालत और राजनीति सभी जगह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन। राजनीति के दंगल में उनके दामन पर भ्रष्टाचार के दाग भी लगे।
जेल भी हुई जिससे समर्थक बेहद निराश हुए। लेकिन साथ नहीं छोड़ा। उनकी लोकप्रियता वैसी की वैसी ही रही। भ्रष्टाचार का धब्बा उन्हें उनकी उचाईयों पर रहते हुए भी नीचा नहीं दिखा सका। राजनीति करने वालों को इनके जीवन से बहुत कुछ मिल सकता है। देश की सशक्त महिला नेतृत्व की मिशाल थीं जयललित। उनका प्रभावी व्यक्तित्व और चेहरे की सदा मुस्कान एक खास पहचान बनी रही। उन्होंने अपने शांत व शालीन स्वाभाव और लोकहितकारी नीतियों के बदौलत तमिलनाडु में लोकप्रियता का जो कीर्तिमान स्थापित किया है वह कोई और नेता नहीं कर सकता। यह कहा जाना अतिश्योक्ति नही होगी की वह देश की एक प्रभावी महिला राजनेता थी और राजनीति में विपरीत परिस्थितियों में भी अपने चेहरे पर मुस्कान कायम रखती थी। उनका यूं चले जाना निश्चित तौर पर भारतीय राजनीति के लिए अपूर्णीय क्षति रहेगी। इस अद्भुत महिला का राजनीतिक सफर कई कारणों से अनोखा कहा जाएगा। पढ़ाई-लिखाई में गहरी रुचि रखने वाली जयललिता ने करियर की शुरुआत रंगमंच से शुरू हुई। महज साढ़े पंद्रह साल की आयु से ही फिल्मों में अभिनय शुरू कर दिया था। फिल्मों में इन्हें बेहताशा प्रसिद्वि मिलीं। मैसूर में जन्मीं जयललिता को राजनीति विरासत में नहीं मिली। उनका जन्म मैसूर के संपन्न परिवार में हुआ। लेकिन दो साल की उम्र में ही पिता का साथ छूट गया। स्कूल में पढ़ते समय ही मां ने उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए मना लिया था। और कन्नड़ फिल्मों में मुख्य अभिनेत्री बनने लगी। इसके बाद वह तमिल फिल्मों में छा गईं। दक्षिण भारतीय फिल्मों में स्कर्ट पहनने वाली वह पहली अभिनेत्री थीं। इज्जत नाम से बनी एक हिंदी फिल्म में भी इन्होंने अभिनेता धमेंद्र के साथ काम किया था। मुश्किल और कठोर फैसलों के लिए मशहूर जयललिता को तमिलनाडु में आयरन लेडी भी कहा जाता है। उनका पूरा जीवन संर्घष से भरा रहा। फिल्मी करियर से लेकर राजनीति तक उन पर कई तरह के आरोप भी लगते रहे, लेकिन वह किसी की परवाह किए बिना अनले अग्रस पथ पर चलती रही है। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। उन्होंने आलोचनाओं की कभी परवाह नहीं की। जयललिता एक कामयाब वकील बनना चाहती थीं, लेकिन किस्मत ने उन्हें पहले फिल्मों में पहुंचाया और फिर राजनीति में धकेल दिया। दोनों ही क्षेत्रों में उनका सफर आसान नहीं रहा था। जयललिता 140 फिल्में करने, 8 बार विधानसभा का चुनाव लडऩे और एक बार राज्यसभा के लिए मनोनीत होने के अलावा पांच बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी थी। इतना लंबा ये सफर इतना आसान नही था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और जीत कर दिखा दिया। विनम्र श्रृधाजंलि।