पश्चिम से सीखने योग्य कुछ सबक

  • 2016-10-22 06:30:01.0
  • प्रो. एनके सिंह
पश्चिम से सीखने योग्य कुछ सबक

आज हमारे लिए यह सही समय है कि हम पश्चिम से कम से कम दो सबक सीख लें। पहला अनुशासन में रहते हुए कार्य और सामाजिक संस्कृति में सुधार और दूसरा नियमों के पालन का। दफ्तरों व कार्यालयों में समयनिष्ठा का संस्कार सख्ती से अपनाएं। गुणवत्ता और परिणाम के साथ कोई भी समझौता स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। यहां तक कि सामाजिक जीवन, जैसे कि शादी समारोह, खरीददारी या विभिन्न बैठकों के दौरान भी नियमों का पालन व शिष्टाचार झलकना चाहिए.

परंपरागत तौर पर पूर्वी देश प्राचीन और बुद्धिमता के भंडार माने जाते हैं। करीब दसवीं शताब्दी तक पूर्वी देशों के ऋषि-मुनियों व पुरातन धार्मिक ग्रंथों का पूरी दुनिया पर प्रभाव रहा। मशीनी युग और औद्योगिक क्रांति का आगमन अपने साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लेकर आया। युद्ध व शांति के दौरान प्रौद्योगिकी ने वैश्विक परिदृश्य में जड़ मूल से परिवर्तन ला दिया। इसी के साथ धीरे-धीरे पूर्व का प्रभाव मद्धिम पडऩा शुरू हो गया और इसकी अर्थव्यवस्था में भी पहले वाली धार नहीं रही। उस दौर तक पूरे विश्व में होने वाले निर्यात में तकरीबन एक तिहाई हिस्सेदारी भारत और चीन की ही हुआ करती थी, लेकिन वक्त के साथ-साथ इसमें निरंतर गिरावट आती गई। आज जबकि पश्चिम संवृद्धि व विकास के पथ पर पूर्वी देशों से कहीं आगे निकल चुका है, हम उसके अनुभवों से कई सबक ले सकते हैं। वैश्वीकरण ने अपने क्षेत्र के सीमित दायरे तक दखने की मानसिकता और पूर्वी देशों की अर्थव्यवस्था की कार्य प्रणाली को बुरी तरह से ध्वस्त करके रख दिया है। अपनी किताब 'ईस्टर्न एंड क्रॉस कल्चरल मैनेजमेंट' में मैंने पूर्वी देशों की कार्य पद्धति और सामाजिक संस्कृति में सुधार करने का समर्थन किया है। ये सुझाव विशेषकर भारतीय उपमहाद्वीप में स्थित देशों के लिए हैं, क्योंकि यहां पर तकनीक और आर्थिकी के सिद्धांत अप्रभावी सिद्ध होते रहे हैं। इन्हें अपने दृष्टिकोण में बदलाव के साथ-साथ औद्योगिक अनुशासन को अंगीकार करना होगा, जहां समय और लागत का महत्त्व बहुत ज्यादा बढ़ चुका है। एक समय था जब जापान की पहचान घटिया गुणवत्ता के उत्पादक के तौर स्थापित हो चुकी थी। सत्तर के दशक तक 'जापानी है' कहकर इसके उत्पादों का उपहास उड़ाया जाता था। दस वर्षों में ही जापान अपने उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार करते हुए सर्वश्रेष्ठ उत्पाद गुणवत्ता वाला राष्ट्र बन गया और आज लोग यहां बनने वाली वस्तुओं की गुणवत्ता के उदाहरण देते हैं। जुरान और डेमिंग दो ऐसे विशेषज्ञ थे, जो जापान में इस गुणवत्ता क्रांति को लेकर आए, लेकिन इसे विडंबना ही माना जाएगा कि अपने देश यानी अमरीका के ही लोगों ने उनके बारे में कभी नहीं सुना था। आज यहां एक नई कार्य संस्कृति विकसित करने के लिए कार्य और प्रतिबद्धता में अनुशासन अपनाने की जरूरत है। विकास पथ पर भारत को आगे बढ़ाने के लिए भी यह एक माकूल तरीका है, लेकिन इस दिशा में अभी काफी कुछ किया जाना शेष है। बेशक मोदी ने इस संदर्भ में अभियान छेड़ रखा है, लेकिन इसे अभी और स्पष्ट ढंग से परिभाषित करने और कड़ी मेहनत से इसको क्रियान्वित करने की जरूरत है। पश्चिमी देशों ने समय को 'हमेशा के लिए उपलब्ध' की अवधारणा के तौर पर कभी नहीं लिया, बल्कि उनका हमेशा से मत रहा है कि एक बार जो वक्त गुजर जाएगा, वह कभी लौट कर नहीं आएगा।

मैं कई वर्षों तक काम के सिलसिले में अमरीका और कनाडा में रह चुका हूं और इस अवधारणा को मैंने काफी नजदीक से महसूस किया है। अभी हाल ही में मैं कनाडा में महीना बिता कर आया हूं और दो ऐसे पहलुओं पर टिप्पणी करना चाहूंगा, जो हमारे लिए कई मायने रखते हैं। पहला पहलू उनके द्वारा बिना किसी समझौते के सतत रूप से नियमों के अनुपालन से जुड़ा हुआ है। यातायात नियमों को ही ले लीजिए। वहां की लगभग हर सडक़ पर सिग्नल व्यवस्था स्थापित की गई है। वहां की तंग गलियों में भी कोई नियमों को तोडऩे की जुर्रत नहीं करता। सडक़ पर चलते वक्त कोई भी चालक 'मैं पहले' का सिद्धांत लागू करने का दुस्साहस नहीं करता। यहां तक कि खरीददारी के वक्त बिल कटवाने के लिए भी कोई पंक्ति व्यवस्था का उल्लंघन नहीं करता। जब खरीदे गए सामान का भुगतान करने की बारी आती है, तो हर कोई पंक्ति में लगने के नियम का कड़ाई से पालन करता है। दूसरी ध्यान देने योग्य बात यह थी कि वहां हर कोई कूड़ा-कचरा उचित स्थान पर निपटाने के संस्कार को कड़ी निष्ठा से पालन करता है। मैं वहां घंटों तक सडक़ पर खड़ा रहा, लेकिन सांस के जरिए जरा सा भी धुआं अंदर नहीं गया और न ही धूल का कोई कण कपड़ों पर गिरा। पूरे शहर में कूड़ा निपटाने के लिए कूड़ेदानों की प्रभावी व्यवस्था की गई थी। इसमें से कुछ ठोस कचरे के निपटारे के लिए और कुछ रिसाइकिलेबल कूड़ा फेंकन के लिए रखे गए थे। सडक़ के किनारे ये कूड़ेदान एक पंक्ति में व्यस्थित ढंग से रखे गए थे और किसी भी कूड़ेदान के बाहर कूड़ा नहीं बिखरा हुआ था। किसी को भी बंद कमरे के भीतर धूम्रपान की इजाजत नहीं थी, भले वह आपका अपना ही कमरा क्यों न हो। हां, कमरे से बार खुले स्थान पर इस तरह की कोई पाबंदी नहीं थी। वहां सडक़ पर कुछ सिगरेट के बचे हुए टुकड़े देखने को मिले, तो वहां तुरंत सूचना जारी कर दी गई कि यदि किसी दुकान या दफ्तर के पास ऐसे टुकड़े देखने को मिलते हैं, तो वही संस्थान इसके लिए जिम्मेदार होगा और उससे जुर्माना भी वसूला जाएगा। इसी का नतीजा है कि वहां हर प्रतिष्ठान सुनिश्चित करता है कि उसके आसपास का क्षेत्र बिलकुल साफ हो। वहां की मुख्य नीतियों व मसलों को लेकर विवेकशील व व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया गया है। उदाहरण के तौर पर इमारतों के भीतर धूम्रपान पर प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन खुले स्थानों पर इसकी इजाजत थी। परिणामस्वरूप देखा जा सकता है कि बहुत सारे लोग खुले में धूम्रपान करते हैं और इस तरह किसी नियम का उल्लंघन भी नहीं होता। दूसरी तरफ हम आदर्शवाद में उलझकर निजी स्थानों के अलावा हर कहीं धूम्रपान पर प्रतिबंध चस्पां कर देते हैं। इसी का नतीजा है कि नियमों के उल्लंघन के कई मामले हमारे सामने आते हैं। खुले में धूम्रपान पर प्रतिबंध का कोई औचित्य नजर नहीं आता, क्योंकि वहां पर पर्याप्त मात्रा में ताजा हवा उपलब्ध होती है। हमारे लिए यह सही समय है कि हम पश्चिम से कम से कम दो सबक सीख लें। पहला अनुशासन में रहते हुए कार्य और सामाजिक संस्कृति में सुधार और दूसरा नियमों के पालन का। दफ्तरों व कार्यालयों में समयनिष्ठा का संस्कार सख्ती से अपनाएं। गुणवत्ता और परिणाम के साथ कोई भी समझौता स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।

दूसरा, यातायात नियमों के उल्लंघन के दोषियों को सख्त सजा दिए जाने के साथ शहरों में सिग्नल व्यवस्था कायम करनी होगी। यहां तक कि सामाजिक जीवन, जैसे कि शादी समारोह, खरीददारी या विभिन्न बैठकों के दौरान भी नियमों का पालन व शिष्टाचार झलकना चाहिए। दूसरा सबक यह कि देश में स्वच्छता अभियान की सफलता के लिए हरसंभव तरीका अपनाना चाहिए। कूड़े-कचरे के निपटान के लिए पर्याप्त व समुचित व्यवस्था खड़ी करनी होगी। न्यूयार्क के बाद टोरंटो उत्तरी अमरीका का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। यहां 50 फीसदी कचरे का पुनर्चक्रण किया जाता है और इस वर्ष इसका लक्ष्य 70 फीसदी तय किया गया है। यकीनन भारत के सुखद भविष्य की राह कार्य व जीवन में अनुशासन और संपूर्ण स्वच्छता से होकर ही गुजरेगी।