सैनिक भी बनें 'रोल मॉडल'

  • 2016-09-16 06:30:32.0
  • पीके खुराना
सैनिक भी बनें

पीके खुराना 
सांसदों और विधायकों की सुविधाओं की समीक्षा समय की आवश्यकता है। एक खिलाड़ी को मेडल मिलने पर करोड़ों मिलने लगते हैं और वह दुनिया का चहेता बन जाता है। सांसद या विधायक बनते ही व्यक्ति की आय के वैध-अवैध स्रोत बन जाते हैं और विभिन्न सुविधाएं मिलने लगती हैं, जबकि एक सैनिक कठिनतम परिस्थितियों में जीता है। सीमा की सुरक्षा बहुत जिम्मेदारी का काम तो है ही, कठिन भी है। सबसे अहम यह कि वहां दुर्घटनाओं में करियर खत्म नहीं होता, अकसर जीवन ही खत्म हो जाता है।

सोशल मीडिया एक अनियंत्रित नदी है। यह पहाड़ों से झरता पानी का ऐसा रेला है, जिसमें असीम ताकत है। सोशल मीडिया पर तरह-तरह की बातें चलती रहती हैं और उनमें बहुत सी अनर्गल भी होती हैं। उसके बावजूद सोशल मीडिया की उपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि यह जनता की आवाज है, उसकी प्रतिध्वनि है और कोई भी संस्था, सरकार अथवा समाज लंबे समय तक सोशल मीडिया पर चलने वाली बहस की उपेक्षा नहीं कर सकता। सोशल मीडिया पर खिलाडिय़ों, सैनिकों और सांसदों के प्रति समाज और सरकार के व्यवहार तथा स्थापित नियमों और परंपराओं को लेकर लगातार बहस चल रही है और समय आ गया है कि इन पर कुछ ज्यादा गहराई से विचार किया जाए और आवश्यकतानुसार नियमों-कानूनों में बदलाव किया जाए। रियो ओलंपिक में हिंदोस्तान को बेटियों ने मेडल दिलाकर गौरवान्वित किया। देश उन पर निहाल हुआ और विभिन्न सरकारों ने पुरस्कारों की झड़ी लगा दी। कल तक लगभग गुमनाम और मुश्किल से गुजारा करने वाली खिलाडिऩें एकाएक सबकी आंख का तारा बन गईं और अमीरी व सुविधाजनक जीवन के लिए खुद को तैयार करने में जुट गईं। उनका अपना जीवन भी अब हमेशा के लिए बदल गया है। यह जीवन का वह पहलू है, जहां लोग चढ़ते सूरज को सलाम करते हैं और आपको आपकी खूबियों से नहीं, सफलताओं से आंकते हैं। कहते हैं कि आप अपनी निगाह में इसलिए महत्त्वूपर्ण होते हैं कि आप सोचते हैं कि आप क्या कर सकते हैं, लेकिन दुनिया आपका कद आपकी उपलब्धियों से नापती है। इन खिलाडिय़ों ने उपलब्धियां हासिल की हैं और वे खुद को दुनिया की निगाह में 'सफल' साबित कर पाई हैं। खुशी की इस लहर के बीच हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बहुत से खिलाड़ी, जो ओलंपिक में अथवा कहीं और नाम कमा सकते थे, खेल संगठनों की राजनीति का शिकार हो जाते हैं। खेल संगठनों के सर्वेसर्वा अपनी ताकत के बल पर खिलाडिय़ों का शोषण करते हैं, मेहनत खिलाड़ी करते हैं और मलाई संगठनों के प्रबंधक खाते हैं। वे किसी भी उभरते खिलाड़ी को खेल से बाहर करके अप्रासंगिक बना सकते हैं। खेल संगठनों के नियमों की यह खामी खेलों के समुचित विकास की राह में एक बड़ी अड़चन है।

सफलता को नमन दुनिया का दस्तूर है। इसमें कुछ भी नया नहीं है। हां, असंगत अवश्य है। मेडल मिल जाने पर खिलाडिय़ों पर इतना धन बरसने लगता है और उन्हें एकाएक इतनी पब्लिसिटी मिलने लगती है, जिसे संभाल पाना हर किसी के वश की बात नहीं होती। प्रशंसा किसे बुरी लगती है, लेकिन जब प्रशंसकों का हुजूम इतना बढ़ जाए कि आप अपनी सफलता के तराने गाने वालों से ही फुर्सत न पा सकें, आपकी हर सांस खबर बनने लगे तो यह ऐसी अति है, जो खिलाडिय़ों को भविष्य की सफलताओं से वंचित कर सकती है। होना तो यह चाहिए कि मेडल मिलने पर खिलाडिय़ों को सम्मानित किया जाए, उनकी सुविधाएं बढ़ाई जाएं, उन्हें आवश्यक धन उपलब्ध करवाया जाए, लेकिन एक सीमा के बाद पुरस्कार राशि का उपयोग अन्य खिलाडिय़ों के प्रशिक्षण में लगे। मैडल जीतने वाले खिलाड़ी की शान बढ़ाने में लगने के बजाय खेल के विकास में लगे। पुरस्कारों से नवाजते समय हमें अपने नजरिये में संतुलन लाने की आवश्यकता है। फिलहाल तो खिलाड़ी मानो नदी के दो अलग-अलग किनारों पर जीने के लिए विवश हैं। एक किनारे पर कड़ी मेहनत के बावजूद गुमनामी और सुविधाओं का अभाव है, तो दूसरी ओर चमक-दमक, पैसा, सुविधा, शोहरत का रेला-पेला है। यह स्थिति न केवल हास्यास्पद है, बल्कि खेलों के विकास का रोड़ा भी है। पंचों, सरपंचों, पार्षदों, विधायकों और सांसदों का अधिकांश समय अपने मतदाताओं की समस्याएं समझने और उन्हें सुलझाने में जाता है। सांसदों का बहुत लंबा समय लोकसभा के सत्र में लग जाता है। सांसदों पर समय का दबाव इतना अधिक होता है कि सामान्यत: वे अपने व्यवसाय की ओर ध्यान नहीं दे पाते और कई बार उनका व्यवसाय चौपट होने की स्थिति तक पहुंच जाता है। सांसदों पर मतदाताओं के दबाव और समय की कमी के कारण उन्हें बहुत सी सुविधाएं दी जाती हैं। इसके अतिरिक्त चूंकि उन्हें बहुत घूमना पड़ता है और मतदाताओं के साथ संपर्क में रहने के लिए तथा उनके काम करवाने के लिए अनगिनत फोन करने पड़ते हैं, अत: भत्ते के अलावा उन्हें मुफ्त फोन तथा मुफ्त यात्रा आदि की बहुत-सी सुविधाएं देना आवश्यक हो जाता है। यही नहीं, सांसद चूंकि किसी और व्यवसाय के काबिल नहीं रह जाते और संसद की अवधि समाप्त हो जाने पर उनके पास आय का कोई और साधन नहीं रह जाता, इसलिए उनके लिए पेंशन का प्रावधान भी है। उनके वेतन और सुविधाओं पर टैक्स भी नहीं है।यही नहीं, सांसद और विधायक खुद कानून बनाते हैं, इसलिए वे जब चाहें, अपना वेतन तथा सुविधाएं बढ़ाने का कानून पास कर लेते हैं। यह सुविधा समाज के किसी भी अन्य वर्ग को उपलब्ध नहीं है। सांसदों और विधायकों की पेंशन और सुविधाओं को लेकर सोशल मीडिया में बहुत सवाल उठ रहे हैं और उनको मिलने वाली सुविधाओं और अन्य नागरिकों, खासकर सैनिकों को मिलने वाली सुविधाओं की तुलना हो रही है, जो न तो अनुचित है और न ही अप्रासंगिक। लोकतंत्र में यह तुलना स्वाभाविक है और सांसद तथा विधायक भी मतदाताओं के प्रति जवाबदेह हैं। सांसदों को अत्यंत सस्ता भोजन, ढेर सारी सुविधाएं जनमानस के लिए असुविधा का कारण है, खासकर इसलिए भी कि कानून बनाने वाले ये लोग न केवल अत्यंत सुविधाभोगी हो गए हैं, बल्कि भ्रष्टाचार की हालत यह है कि विधायक अथवा सांसद बनते ही उनका बैंक बैलेंस बेतहाशा बढऩे लग जाता है। सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए न्यूनतम शिक्षा होना आवश्यक है और एक न्यूनतम समयावधि तक सरकारी सेवा में रहने के बाद ही वह पेंशन का अधिकारी हो पाता है। सांसदों और विधायकों को मिलने वाली सुविधाओं की समीक्षा आज समय की आवश्यकता है। एक खिलाड़ी को मेडल मिलने पर करोड़ों मिलने लगते हैं और वह दुनिया का चहेता बन जाता है। सांसद अथवा विधायक बनते ही व्यक्ति की आय के वैध और अवैध स्रोत बन जाते हैं और तरह-तरह की सुविधाएं मिलने लगती हैं, जबकि एक सैनिक कठिनतम परिस्थितियों में जीता है और सदैव सिर पर कफन बांधे रहता है। सीमा की सुरक्षा बहुत जिम्मेदारी का काम तो है ही, कठिन भी है और सबसे बड़ी बात है कि वहां दुर्घटनाओं में करियर खत्म नहीं होता, अकसर जीवन ही खत्म हो जाता है। इसके बावजूद सैनिकों को मिलने वाली सुविधाएं, मृत्यु-पश्चात भी, नगण्य हैं और उन्हें मीडिया का वह फोकस नहीं मिलता, जो मेडल जीत चुके खिलाडिय़ों अथवा सांसदों या विधायकों को मिलता है। आखिर इस तरह के विरोधाभास क्यों हैं? पूर्व सैनिक वर्षों से एक पद, एक पेंशन के लिए संघर्ष कर रहे थे और उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। वोट की राजनीति का दबाव न होता, तो उनका यह संघर्ष न जाने कितने और समय तक चलता रहता। सोशल मीडिया जनमत की प्रतिध्वनि है और यह स्पष्ट है कि जनता चाहती है कि खिलाडिय़ों, सांसदों और विधायकों तथा सैनिकों को मिलने वाली सुविधाओं की तर्कसंगत समीक्षा हो।