दूसरी तरफ के कश्मीर की हकीकत

  • 2016-08-15 05:30:23.0
  • संजीव पांडेय
दूसरी तरफ के कश्मीर की हकीकत

कश्मीर में प्रांतीय असेंबली है, लेकिन इस्लामाबाद में बनाए गए कश्मीरी मामलों के विभाग के माध्यम से वहां आइएसआइ की हुकूमत चलती है। इस विभाग के सचिव का आदेश ही अंतिम होता है। हालांकि पीओके की जनता कहीं ज्यादा नाराज न हो इसलिए एक मुखौटा  सरकार कायम रखी जाती है।

जम्मू-कश्मीर में आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद पाकिस्तान ने हंगामा खड़ा कर रखा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के भी सुर एकाएक बदल गए। घरेलू राजनीति से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पाकिस्तान ने हायतौबा मचा रखी है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के इस्लामाबाद दौरे के दौरान तो वहां के चरमपंथी हंगामा करते रहे लेकिन पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में लोगों के साथ किए जा रहे जुल्म पर चुप हैं। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों ने यहां जिस तरह से लोकतंत्र का गला घोंटा उसका परिणाम हाल ही में दिखा था। पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर के विधानसभा चुनावों में सेना ने जम कर धांधली करवाई। इसके विरोध में स्थानीय राजनीतिक दल मुसलिम कॉन्फ्रेंस के लोग सडक़ों पर उतर आए।

भारत के जम्मू-कश्मीर में जहां स्थानीय लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया में खुलकर भाग लेते रहे हैं, वहीं पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में हालात इससे उलट हैं। बहुत चालाकी से पाकिस्तानी सेना और वहां की खुफिया एजेंसियों ने पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में कश्मीरी प्रभुत्व वाले स्थानीय दलों का खात्मा कर दिया है। यहां पर गैर-कश्मीरी राष्ट्रीय राजनीतिक दल स्थापित हो चुके हैं, जो सेना के इशारे पर काम कर रहे हैं। हाल ही में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हुए चुनाव में नवाज शरीफ की पार्टी मुसलिम लीग ने बहुमत प्राप्त किया। मुसलिम लीग को इकतीस सीटें मिलीं जबकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को तीन और ऑल जम्मू-कश्मीर मुसलिम कॉन्फ्रेंस को तीन सीटें मिलीं।

इस चुनाव में भारी धांधली हुई। धांधली के विरोध में स्थानीय लोग सडक़ों पर उतर आए। उनका आरोप था कि चुनाव में मुसलिम लीग को जिताने के लिए आइएसआइ ने धांधली करवाई। विरोध करने वालों को सेना और पुलिस ने जम कर पीटा। खुद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने स्वीकार किया था कि कश्मीर में चुनावों में धांधली हो रही है। पीपुल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो और आसिफ अली जरदारी ने आरोप लगाया था कि पाकिस्तान के दूसरे राज्यों के लोगों को कश्मीर के इलाके में बसाया जा रहा है। उन्हें मतदाता बनाया जा रहा है। खुफिया एजेंसियों ने फर्जी मतदाताओं के माध्यम से धांधली करवाने की योजना बनाई है।

कहने को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में प्रांतीय असेंबली है, लेकिन इस्लामाबाद में बनाए गए कश्मीरी मामलों के विभाग के माध्यम से वहां आइएसआइ की हुकूमत चलती है। इस विभाग के सचिव का आदेश ही अंतिम होता है। हालांकि पाक प्रशासित कश्मीर में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति हैं, एक हाईकोर्ट भी है। लेकिन यहां के प्रधानमंत्री इस्लामाबाद स्थित कश्मीर अफेयर्स विभाग का हर निर्देश मानने को बाध्य हैं। कश्मीर अफेयर्स का सचिव पीओके के प्रधानमंत्री से ज्यादा शक्तिशाली होता है। हालांकि पीओके की जनता कहीं ज्यादा नाराज न हो इसलिए एक मुखौटा सरकार कायम रखी जाती है। इस मुखौटा सरकार पर भी कब्जा खुफिया एजेंसियों का होता है। 2011 में हुए चुनाव में पीओके में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने सत्ता हासिल की थी। लेकिन वास्तविक सत्ता आइएसआइ के पास ही थी।

पीओके में मानवाधिकारों का लगातार उल्लंघन होता रहा है। स्थानीय कश्मीरी साफ-सुथरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मांग करते हैं तो पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी उनकी हत्या करवा देती है। उन्हें जेल भेज दिया जाता है। 2013 में रावलपिंडी के अंदर जाने-माने कश्मीरी नेता और ऑल पार्टी नेशनल एलांयस के चेयमरैन सरदार आरिफ शाहीद की हत्या कर दी गई। हत्या के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियां थीं। विदेशों में सक्रिय कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने जब इस मामले की न्यायिक जांच की मांग की तो यह मांग ठुकरा दी गई। लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले कश्मीरी नेताओं पर पाकिस्तानी सरकार लगातार आतंकवाद निरोधक कानून का इस्तेमाल करती रही है। कई कश्मीरी नेताओं को इस कानून के सहारे जेल भेज दिया गया।

पेशावर में स्कूल पर तालिबान के हमले के बाद आतंकियों से निपटने के लिए बनाई गई फौजी अदालत का इस्तेमाल कश्मीरी नेताओं के खिलाफ हो रहा है। गिलगित-बलतिस्तान में मानवाधिकारों के लिए आंदोलन चलाने वाले बाबा जान को चालीस साल की सजा पाकिस्तान के आतंकवाद निरोधक न्यायालय ने सुनाई है। इसके अलावा बड़े पैमाने पर कश्मीरी राजनीतिक कार्यकर्ता पाकिस्तानी एजेंसियों के इशारे पर जेल में हैं। पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान सरकार के जुल्म के खिलाफ स्थानीय कश्मीरियों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई बार आवाज उठाई है। जून 2016 में जेनेवा में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के बत्तीसवें अधिवेशन में कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने आइएसआइ के हाथों हो रहे मानवाधिकार हनन पर रोक लगाने की मांग की। पीओके से निर्वासित सरदार शौकत अली कश्मीरी ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि पाकिस्तानी सेना कश्मीरी जनता पर जुल्म कर रही है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में प्रेस की आजादी, अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। वहां पर बिना कारण बताए कश्मीरियों को गिरफ्तार किया जा रहा है। उन्हें खुफिया एजेंसियां हिरासत में लेकर यातना दे रही हैं। जो कश्मीरी पाकिस्तान में कश्मीर के अधिग्रहण का विरोध करते हैं उन्हें यातना दी जाती है।

पाकिस्तान अपने कब्जे वाले कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करता रहा है। पीओके में चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर के नाम पर पर्यावरण का भारी नुकसान किया जा रहा है। विवादित क्षेत्र में चीन निवेश कर रहा है। यहां चीनी आबादी बसाई जा रही है। आधारभूत संरचना के निर्माण के नाम पर यहां बड़े पैमाने पर तोड़-फोड़ रही है। काराकोरम हाइवे को उन्नत बनाने (अपग्रेडेशन) के नाम पर पांच सुरंग-मार्ग (टनल) बनाए जा रहे हैं। इससे कश्मीर के पर्यावरण का भारी नुकसान होगा। नए टनल पाकिस्तान-चीन आर्थिक कॉरिडोर का हिस्सा हैं। 

स्थानीय कश्मीरियों में पर्यावरण के हो रहे इस नुकसान से भारी रोष है। उन्होंने कई जगहों पर विरोध-प्रदर्शन भी किया है। यही नहीं, निवेश के नाम पर आई चीनी कंपनियां स्थानीय लोगों को रोजगार देने के बजाय चीनी आबादी को यहां लाकर बसा रही हैं। 

एक अनुमान के अनुसार, पीओके में बीस हजार से ज्यादा चीनी कामगार मौजूद हैं। पीओके में जगह-जगह चीनी बस्तियां नजर आती हैं। यहां पर मंदारिन भाषा में लिखे साइनबोर्ड बताते हैं कि चीन अपनी बस्तियां पाक कब्जे वाले कश्मीर में बसा रहा है। स्थानीय कश्मीरियों को डर है कि लंबी योजना के तहत चीन निवेश की सुरक्षा के नाम पर इन बस्तियों को स्थायी रूप से यहां बसा देगा। स्थानीय लोगों के लगातार विरोध के बावजूद चीन इस इलाके में कई जलविद्युत परियोजनाएं शुरू करने जा रहा है। इसमें कोहाला डैम प्रोजेक्ट मुख्य है, जिससे 1100 मेगावाट बिजली उत्पादन करने की योजना है। इसके अलावा नीलम झेलम और चकोठी हटिया हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट का निर्माण भी चीन ही कर रहा है। हालांकि इस परियोजना से वहां के पर्यावरण को भारी खतरा है। स्थानीय लोग इस परियोजना का विरोध भी कर रहे हैं।

भारतीय कश्मीर में स्थानीय लोग अपनी सरकार चुनते हैं वह दिल्ली से निर्देश नहीं लेती। यही नहीं, भारत के जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को शासन करने का लगातार मौका मिला है। इसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस से लेकर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी तक शामिल हैं। कश्मीरियों को हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक न्याय पाने का अधिकार है। लेकिन पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर की जनता के पास न्यायिक अधिकार तो ना के बराबर हैं। पीओके को 1974 के अंतरिम संविधान से चलाया जा रहा है। यहां की चुनी हुई सरकार के पास नाममात्र के ही अधिकार होते हैं। यहां की जनता को न्यायिक अधिकार भी न के बराबर है। पीओके में कहने को हाइकोर्ट है, लेकिन उसे पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जाने वाले मानवाधिकार हनन के मामले सुनने का अधिकार नहीं है। पीओके के बाशिंदों को पाकिस्तानी सेना के हाथों होने वाले मानवाधिकार हनन के खिलाफ पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का अधिकार भी नहीं है।
भारतीय कश्मीर में चुनी हुई राज्य सरकार को जहां प्रशासनिक फैसले लेने का अधिकार है वहीं पाक अधिकृत कश्मीर में अधिकारियों की नियुक्ति के आदेश भी इस्लामाबाद से आते हैं। कुछ यही हाल गिलगित-बलतिस्तान की जनता का है। गिलगित-बलतिस्तान के लोगों को स्थानीय राजनीतिक दल बनाने की अनुमति नहीं है। कहने को तो 2009 में वहां की प्रांतीय विधानसभा का गठन कर दिया गया। लेकिन इसके पास कानून बनाने की शक्ति नहीं है। गिलगित-बलतिस्तान प्रांतीय विधानसभा ने आज तक कोई कानून पारित नहीं किया। इसके बदले गिलगित-बलतिस्तान प्रांतीय विधानसभा ने कई प्रस्ताव पारित कर इस्लामाबाद स्थित कश्मीर एवं गिलगित-बलतिस्तान अफेयर्स विभाग को भेजा। लेकिन इन प्रस्तावों पर आज तक कोई जवाब नहीं आया।

गिलगित-बलतिस्तान के स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद पाकिस्तान चीन को यहां की जमीन सौंपता जा रहा है। सबसे पहले 1963 में स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद पांच हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका पाकिस्तान ने चीन को सौंप दिया था। 

अब इस इलाके में चीन और भी निर्माण-कार्य कर रहा है। इस इलाके में बड़े पैमाने पर चीनी, अफगानी और पाकिस्तानी नागरिक बसाए जा रहे हैं, ताकि स्थानीय आबादी अल्पसंख्यक हो जाए। स्थानीय जनता को न्यायिक अधिकार भी नहीं है। न तो उनके लिए कोई हाईकोर्ट है न ही उन्हें किसी मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार है। स्थानीय कोर्ट जरूर है, जहां पर राजनीतिक और धार्मिक संबंधों के आधार पर न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति होती है।