सेना की परंपरा का प्रश्न और नये सेनाध्यक्ष की नियुक्ति

  • 2016-12-29 11:30:43.0
  • उगता भारत ब्यूरो

सेना की परंपरा का प्रश्न और नये सेनाध्यक्ष की नियुक्ति

अरुणेंद्र नाथ वर्मा
पुरानी कहावत है कि लीक छोड़ कर चलने वाला शायर या सिंह या सपूत होता है। लेकिन सुचारुरूप से चल रही व्यवस्था और परंपरा को छोड़ कर विवादास्पद निर्णय लेना अपने आप में एक लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता। बिना पर्याप्त औचित्य के, परंपरा को भंग करने वाले निर्णय प्रभावित लोगों को अक्सर उद्वेलित ही करते हैं। भारत जितना विशाल देश है, उसकी थल सेना भी उतनी ही विशाल है। लगभग ग्यारह लाख सैनिकों की संख्या के साथ दुनिया की सबसे बड़ी स्थायी सेना कही जाने वाली भारतीय थल सेना के अध्यक्ष के पद पर किसी की नियुक्ति में इतने विशाल सैनिक समुदाय की ही नहीं, बल्कि पूरे सवा सौ करोड़ देशवासियों की दिलचस्पी स्वाभाविक है। अगले थल सेनाध्यक्ष के पद पर लेफ्टिनेंट जनरल विपिन रावत की नियुक्ति घोषित करने में जिस तरह वरिष्ठता क्रम में उनसे ऊपर दो लेफ्टिनेंट जनरलों की अनदेखी की गई है और वरिष्ठता क्रम से सेनाध्यक्ष पद पर नियुक्ति की परंपरा तोड़ी गई है वह सारे देश का ध्यान आकर्षित करेगी। प्रश्न जरूर उठेंगे कि सरकार को वरिष्ठता क्रम में ले. जन. रावत से ऊपर रहे ले. जन. प्रवीन बक्शी और ले. जन. पीएम हैरीज में आखिर कौन-सी ऐसी कमी दिखाई दी कि उसे सेनाध्यक्ष के पद पर चुनाव करने की बनी-बनाई विवाद-मुक्त परिपाटी को त्यागना पड़ा?

यह भी ध्यान रहे कि वरिष्ठता क्रम से सेनाध्यक्षों के चुनाव की परंपरा थल सेना के इतिहास में केवल दो बार भंग की गई है। पहली बार ऐसा हुआ था 1972 में, जब द्वितीय विश्वयुद्ध में विक्टोरियाक्रॉस के सर्वोच्च शौर्य पुरस्कार से सम्मानित ले. जन. पीएस भगत को जनरल मानेकशॉ के बाद थल सेनाध्यक्ष के पद पर पहुंचने से रोकने के लिए उनसे कनिष्ठ रहे जन. जी.जी. बेवूर को एक साल का सेवा-विस्तार दे दिया गया था। ले.जन. भगत को सेनाध्यक्ष के पद तक पहुंचने के मार्ग में बड़ी सफाई के साथ विघ्न उत्पन्न कर दिया गया। लेकिन 1971 में बांग्लादेश में अपूर्व विजय प्राप्त करने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी का रुतबा इतना बढ़ चुका था कि इस परंपरा हनन पर सेना में या देश में विशेष प्रतिक्रिया नहीं हुई।
लेकिन जब 1983 में तत्कालीन उप थलसेनाध्यक्ष ले.जन. एसके सिन्हा को वरीयता क्रम में स्वाभाविक रूप से थलसेनाध्यक्ष पद ग्रहण करने के मार्ग में उन्हीं श्रीमती गांधी ने रोड़ा अटकाया और उनकी वरीयता की अनदेखी करके जन. एएस वैद्य को थलसेनाध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया तो इस बार उनके निर्णय की खुलकर आलोचना हुई थी। ले. जन. सिन्हा ने अपने स्वाभिमान पर चोट नहीं आने दी और अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। वे एक बहुत योग्य और लोकप्रिय उपसेनाध्यक्ष रहे थे जिनकी योग्यता और निष्ठा में किसी प्रकार का संदेह किसी को नहीं था। अत: उनकी अनदेखी करके उन्हें पदत्याग करने को मजबूर करने को श्रीमती गांधी के निरंकुश व्यवहार का उदाहरण माना गया था और देश भर में इसकी तीखी आलोचना हुई थी।

मजेदार बात यह कि परंपरा भंग करके सेनाध्यक्ष का पद वरीयता क्रम में स्वाभाविक उत्तराधिकारी को न देने के उनके निर्णय की सबसे कटु आलोचना भारतीय जनता पार्टी की तरफ से हुई थी। भाजपा ने सत्ता में आने के बाद ले. जन. सिन्हा को राज्यपाल और राजदूत के पदों पर नियुक्त करके बाद में उनकी एक तरह से क्षतिपूर्ति की थी। हालांकि इसमें संदेह नहीं कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल और नेपाल में राजदूत के पदों पर कार्य करते हुए सिन्हा साहब ने अपनी प्रतिभा और कार्यनिष्ठा का समुचित परिचय दिया। पर प्रश्न यह उठता है कि उसी भाजपा की एक अन्य सरकार को वरीयता के सिद्धांत को तिलांजलि देने की अब क्या आवश्यकता आ पड़ी! ऐसा नहीं कि वरीयता-क्रम का भंग आज के दौर में पहली बार हो रहा है। सत्रह अप्रैल 2014 को नौसेनाध्यक्ष के पद पर जब वाइस एडमिरल राजीव धवन की नियुक्ति की गई, तब भी वाइस एडमिरल शेखर सिन्हा को वरीयता-क्रम में उनसे ऊपर रहते हुए भी दरकिनार कर दिया गया था। पर उस निर्णय के पीछे पर्याप्त कारण थे। तब भारतीय नौसेना के कई युद्धपोतों में एक के बाद विनाशकारी दुर्घटनाएं हुई थीं और उसके लिए मर्यादापूर्ण जिम्मेदारी लेते हुए तत्कालीन नौसेनाध्यक्ष एडमिरल डीके जोशी ने त्यागपत्र दे दिया था। उनके बाद वरीयता-क्रम में दूसरे नंबर पर रहे वाइस एडमिरल शेखर सिन्हा के कार्यक्षेत्र वाले नौपोतों में ही ऐसी सर्वाधिक दुर्घटनाएं हुई थीं, अत: एडमिरल जोशी के त्यागपत्र को उनके लिए पदोन्नति का तोहफा तो नहीं बनाया जा सकता था। इसीलिए इस बार परंपरा से हट कर वरिष्ठता की अनदेखी पर कोई तीखी प्रतिक्रया नहीं हुई।
लेकिन अभी किस सिद्धांत और मानदंड की स्थापना करने के लिए ले. जन. प्रवीन बक्शी और ले. जन. पीएम हैरीज की अनदेखी करके उनसे कनिष्ठ ले.जे. विपिन रावत को थलसेनाध्यक्ष बनाया गया है इसे समझना मुश्किल है। वरिष्ठता-क्रम में पदोन्नति के लिए प्रथम प्रत्याशी ले.जन. बक्शी सेना की पूर्वी कमान के अध्यक्ष थे और वरिष्ठता में उनके बाद ले. जन. हैरीज दक्षिणी कमान के।
ले. जन. विपिन रावत उपसेनाध्यक्ष के पद पर थे। ध्यान रहे कि ये तीनों पद मर्यादा और उत्तरदायित्व में समकक्ष हैं। यदि कहा जाए कि सेना की उत्तरी कमान उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण कमान है और उसके सेनापति को ही थलसेनाध्यक्ष बनाया जाना चाहिए, तो फिर जन. सुहाग और जन. वीके सिंह भी बक्शी की तरह ही पूर्वी कमान के सेनापति रहे थे। तब यह प्रश्न क्यों नहीं उठा? बल्कि बक्शी तो उत्तरी कमान में चीफ ऑफ स्टाफ के पद पर आसीन रह चुके हैं जो उस क्षेत्र की सब गतिविधियों के लिए जिम्मेदार होता है और उस सेना कमांडर का दाहिना हाथ होता है। उनके अनुभव को कम कैसे आंका जा सकता है?

एक चर्चा यह भी है कि ले.जन. बक्शी को चीफ ऑफ डिफेन्स स्टाफ का पद देकर उनकी वरिष्ठता का सम्मान करने का इरादा सरकार का हो सकता है, जो शीघ्र ही मालूम हो जाएगा। मान लिया कि ऐसा ही होगा। पर उस स्थिति में तो ले.जन. पीएम हैरीज का नंबर आता थलसेनाध्यक्ष पद पाने का। उनकी अनदेखी के लिए क्या तर्क हैं सरकार के पास? कहने की आवश्यकता नहीं कि उनके बारे में सरकार के निर्णय से ढेर सारी गलतफहमियां पैदा हो सकती हैं, जो न हों तो सेना के मनोबल के लिए अच्छा ही होगा।
सारी स्थिति पर नजर डालने के बाद यही समझ में आता है कि राजनीतिक और अनावश्यक सरकारी हस्तक्षेप सेना के मनोबल पर बुरा असर डालते हैं। यदि कोई विशेष महत्त्वपूर्ण कारण न हो तो सेना अपनी परंपराओं को अक्षुण्ण रखने में ही विश्वास रखती है। वरिष्ठता और पदक्रम सेना की संरचना और सोच में सदियों से कूट-कूट कर भरे गए हैं। उनका अपना महत्त्व है। इन परंपराओं को भंग करने से अनावश्यक उद्वेलन ही पैदा होता है। जब आर्थिक-सामाजिक रूप से सारे देश को हिला देने वाले एक निर्णय को देश की जनता से कितना समर्थन मिला है इसके बारे में पहले ही से अटकलें चल रही हों, तभी एक और विवादास्पद फैसला लेने के पहले सरकार ने अवश्य बहुत सोचा-समझा होगा। लेकिन उसकी मंशा यदि सेना और सारे देशवासियों को ठीक से समझ में न आए तो ऐसे फैसले लेने के लिए फिलहाल तो बहुत उचित समय नहीं है।