ओलंपिक का खर्च और झिझकते मेजबान

  • 2016-09-03 05:30:04.0
  • उगता भारत ब्यूरो
ओलंपिक का खर्च और झिझकते मेजबान

अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी बड़ी वित्तीय संस्था भी ओलंपिक आयोजन के बढ़ते खर्च से चिंतित है। उसका सुझाव है कि ओलंपिक आयोजन का दायित्व स्थायी तौर पर इसके जन्मदाता देश यूनान को सौंप दिया जाए और हर चार साल बाद ये खेल एथेंस में ही हों, जिससे हर बार बेवजह होने वाले अरबों डॉलर के खर्च से बचा जा सकता है।

ओलंपिक आयोजन के बेतहाशा बढ़ते खर्चों से चिंतित देश अब इसकी मेजबानी से कन्नी काटने लगे हैं। पिछले तीन दशक में खेलों के इस महाकुंभ को कराने वाले हर नगर का दीवाला पिट गया। रियो डी-जेनेरियो का उदाहरण बिल्कुल ताजा है। ब्राजील के इस तटीय नगर में ओलंपिक पर बारह अरब डॉलर (करीब आठ खरब रुपए) का खर्च आया और कमाई की पाई-पाई जोडऩे के बावजूद 4.6 अरब डॉलर (करीब तीन खरब रुपए) का घाटा हुआ है। दक्षिण अमेरिका के किसी देश ने पहली बार ओलंपिक की मेजबानी का हौसला दिखाया था, पर रियो का हश्र देख कर भविष्य में शायद ही कोई लेटिन अमेरिकी राष्ट्र यह 'दुस्साहस' कर पाए।  ब्राजील को ओलंपिक खेलों की महाशक्ति नहीं माना जाता और न ही वहां उससे जुड़े खेलों का कोई चाव है। सरकार को लगता था कि ओलंपिक के आयोजन से देश में लाखों पर्यटक आएंगे, पूरी दुनिया में ब्राजील का नाम होगा, छवि निखरेगी और कमाई भी होगी, मगर आर्थिक संकट से सारे कयास उलट गए और आखिरकार ओलंपिक आयोजन सरकार के गले की हड््डी बन गया। पैसे की किल्लत के कारण बीआरटी बस लेन, लाइट रेल प्रोजेक्ट और मेट्रो की नई लाइन बिछाने जैसी कई महत्त्वपूर्ण परियोजनाएं बीच में छोड़ दी गईं। जो पूरी हुईं भी, उनकी गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाया जा रहा है। घाटे के कारण बुजुर्गों को पेंशन और कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल पाया। ओलंपिक आयोजन पर अरबों-खरबों रुपए झोंकना जनता को फिजूलखर्ची लग रहा है।

पिछले कुछ बरस में बेतहाशा बढ़ी लागत के कारण ओलंपिक की उपयोगिता पर सवाल उठने लगे हैं। सयाने लोगों का कहना है कि अमीर देशों और भीमकाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ओलंपिक को अपने प्रचार और माल बेचने का जरिया बना लिया है। जो नगर इन खेलों की मेजबानी करते हैं, ऊपर से भले चमक जाएं, अंदर से खोखले हो जाते हैं। खेलों की बदौलत वहां अमीर तबके को तो व्यापार विस्तार का अवसर मिलता है, पर गरीबों को भारी मूल्य चुकाना पड़ता है। अनुमान है कि पिछले बीस बरस में ओलंपिक खेलों के कारण बीस लाख से ज्यादा गरीबों को विस्थापित किया जा चुका है। मेजबान नगर में उनकी बस्तियां उजाड़ कर स्टेडियम, खेल गांव, सडक़ आदि का निर्माण होता है।  ओलंपिक दुनिया का सबसे बड़ा और महंगा आयोजन है। यूनानी नगर एथेंस (1896) में आधुनिक ओलंपिक खेलों की नींव पड़ी और तब से लेकर आज तक इकतीस बार ये खेल विभिन्न नगरों को आबंटित किए जा चुके हैं। पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान तीन बार ओलंपिक नहीं हो सके।
आयोजक देशों की फेहरिस्त देखने से साफ पता चलता है कि ओलंपिक आंदोलन पर अमीर देशों का एकाधिकार है। आज तक दुनिया के महज उन्नीस देशों को इन खेलों की मेजबानी का अधिकार मिला है, जिनमें से सत्रह विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आते हैं, जबकि दो बड़े विकासशील (चीन और ब्राजील) देश हैं। सर्वाधिक सोलह बार यूरोप के देश मेजबान रहे, जबकि छह दफा उत्तरी अमेरिकी देशों (चार बार अमेरिका, एक-एक बार मेक्सिको और कनाडा), तीन बार एशियाई देशों (जापान, दक्षिण कोरिया और चीन) और दो बार ऑस्ट्रेलिया में ये खेल हो चुके हैं। आज तक किसी अफ्रीकी राष्ट्र को आयोजन का सम्मान नहीं मिल पाया है। घूम-फिर कर ये खेल अमीर देशों की झोली में आ जाते हैं। मेजबानी का खर्च देख कर गरीब तो क्या, खाते-पीते विकासशील देश भी दहल जाते हैं।
ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय ने 1968 से 2012 के बीच हुए सभी ग्रीष्मकालीन और शरदकालीन ओलंपिक खेलों पर आय-व्यय का विस्तार से अध्ययन किया और निष्कर्ष निकला कि हर बार मेजबान देश को आयोजन पर अनुमान से अधिक राशि लगानी पड़ी है। पिछले चौवालीस बरस के दौरान हुए खेलों में अनुमानित बजट से औसत 167 प्रतिशत अधिक धन खर्च हुआ। 2012 के लंदन ओलंपिक का बजट तय राशि से एक सौ बारह फीसद अधिक था। इसी प्रकार बेजिंग (2008) का खर्च चालीस, एथेंस (2004) का साठ, सिडनी (2000) का नब्बे, अटलांटा (1996) का एक सौ सैंतालीस और बार्सिलोना (1992) का चार सौ सत्रह प्रतिशत बढ़ गया। 1976 के मांट्रियल ओलंपिक में तो हद हो गई। उसका खर्च सात सौ छियानबे फीसद से अधिक आया।

ओलंपिक के आयोजन पर दो तरह का व्यय आता है। पहला और बड़ा खर्च 'कैपिटल कास्ट' है, जिसके अंतर्गत सारे निर्माण (स्टेडियम, खेल गांव, सडक़, पुल, मेट्रो आदि) कार्य आते हैं। दूसरा खर्च 'ऑपरेटिंग कास्ट' है, जो सिर्फ खेलों से संबंधित है। इसमें खिलाडिय़ों के रहने, खाने-पीने, आने-जाने का खर्च और उपकरणों की खरीद से जुड़ा व्यय शामिल है। आयोजक खर्च का हिसाब देते समय सिर्फ 'ऑपरेटिंग कास्ट' गिनाते हैं, जिस कारण जनता के सामने अधूरा सच ही आता है। फिलिप पोर्टर ने 1999 में अपने शोधपत्र 'मेगा स्पोट्र्स इनवेस्टमेंट रू ए क्रिटिक ऑफ इंपैक्ट एनालिसिस' से सिद्ध किया कि ओलंपिक खेलों के आयोजन से मेजबान देश और नगर को अक्सर नुक्सान होता है। मसलन, 1996 के ओलंपिक से मेजबान नगर अटलांटा को रत्ती भर फायदा नहीं हुआ। 

यहां तक कि शहर में पर्यटकों की संख्या भी नहीं बढ़ी। जितने पर्यटक 1995 में आए थे, उतने ही खेलों के अगले साल 1997 में आए। 2004 के मेजबान देश एथेंस को तो उल्टा नुकसान हो गया। वहां हर साल घूमने आने वाले लोगों की संख्या ओलंपिक के कारण दस प्रतिशत गिर गई। इतना ही नहीं, खेलों के लिए जो विशाल स्टेडियम बनाए गए, वे सरकार के गले की घंटी बन गए। उनके रख-रखाव पर हर साल 12.4 करोड़ डॉलर (830 करोड़ रुपए) का फालतू खर्च आने लगा। आज यूनान के आर्थिक संकट का एक बड़ा कारण एथेंस ओलंपिक की मेजबानी है। वाल स्ट्रीट जर्नल के अध्ययन के अनुसार सन 2010 में एथेंस के बाईस में से इक्कीस स्टेडियम बिल्कुल बेकार पड़े थे।

जॉन टिगलैंड के शोधपत्र के अनुसार 1994 में नार्वे के लिल्लेहमर नगर में हुए शीतकालीन ओलंपिक खेलों के लिए बने चालीस फीसद होटलों के मालिक कुछ साल बाद दिवालिया हो गए। करोड़ों डॉलर लगा कर खेलों के लिए निर्मित स्कीईंग स्थलों की बिक्री महज एक डॉलर में करनी पड़ी। रूस के सोची नगर में 2012 में हुए शीतकालीन खेलों पर पचास अरब डॉलर (करीब 33.50 खरब रुपए) व्यय हुए। यह ओलंपिक के इतिहास का सबसे महंगा आयोजन था। खेल खत्म होने के कुछ दिन बाद 'गार्डियन' ने सोची की दुर्दशा पर विस्तृत रिपोर्ट छापी। रिपोर्ट के अनुसार जो नगर कुछ दिनों पहले जगमगा रहा था, अब भुतहा बस्ती लग रहा था। दूर-दूर बने खेल स्थल उजाड़ थे। कई निर्माण जो अधूरे रह गए थे, ज्यों के त्यों पड़े थे। ओलंपिक खेल देश नहीं, नगर को आबंटित होते हैं, इसीलिए इनकी पहचान नगर के नाम से होती है।

आयोजक शहरों की सूची देख कर ओलंपिक आंदोलन पर अमीर देशों के दबदबे की तस्वीर और साफ हो जाती है। ये खेल लंदन (ब्रिटेन) और एथेंस (यूनान) में तीन-तीन बार और लास एंजिलिस (अमेरिका) और पेरिस (फ्रांस) में दो-दो बार हो चुके हैं। जापान का तोक्यो नगर 1964 के बाद 2020 के ओलंपिक की मेजबानी करेगा। 2024 के ओलंपिक आयोजन की दौड़ में जो चार नगर हैं, उनमें से तीन यूरोप (पेरिस, रोम, बुडापेस्ट) के और एक अमेरिका (लॉस एंजेलिस) का है। बुडापेस्ट को छोड़ शेष तीनों नगर पहले भी ओलंपिक का आयोजन कर चुके हैं। उनका दावा है कि आयोजन से जुड़ी अधिकतर सुविधाएं पहले से उनके पास मौजूद हैं, इसलिए वे काफी कम पैसे में खेल करा सकते हैं। पेरिस ने केवल सात अरब डॉलर और लॉस एंजेलिस ने 4.6 अरब डॉलर में आयोजन का दावा किया है। लॉस एंजेलिस को 1984 के ओलंपिक आयोजन से मुनाफा हुआ था, उसके बाद से ये खेल सदा घाटे का सौदा साबित हुए हैं। इसीलिए रोम की नवनियुक्त मेयर वर्जिनिया रागी सार्वजानिक तौर पर आयोजन प्रस्ताव का विरोध कर रही हैं। उनका कहना है कि पिछले साल घाटे के डर से ही बोस्टन जैसा शहर मेजबानी की दौड़ से हट गया था, रोम को भी यही करना चाहिए। रागी ही नहीं अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) जैसी बड़ी वित्तीय संस्था भी ओलंपिक आयोजन के बढ़ते खर्च से चिंतित है। उसका सुझाव है कि ओलंपिक आयोजन का दायित्व स्थायी तौर पर इसके जन्मदाता देश यूनान को सौंप दिया जाए और हर चार साल बाद ये खेल एथेंस में ही हों, जिससे हर बार बेवजह होने वाले अरबों डॉलर के खर्च से बचा जा सकता है।