सीमा पर उभरती नई आशा

  • 2017-03-01 04:30:09.0
  • कुलदीप नैयर

सीमा पर उभरती नई आशा

मौजूदा संदर्भों में भारत को अपना अगला कदम उठाने से पहले देखो और इंतजार करो की नीति का अनुसरण करना चाहिए। इजरायल ने भी कमोबेश ऐसी ही इच्छा जताई है। भारत-पाक के लिए फिलहाल यही उचित होगा कि वे संवाद के टेबल पर आकर महत्त्वपूर्ण मसलों को गहन मंथन के जरिए सुलझा लें। पाकिस्तान को भी चाहिए कि कुछ वक्त के लिए कश्मीर के मसले को बीच में न घसीटे। इन दोनों को गरीबी, भुखमरी या बेरोजगारी सरीखी समसामयिक समस्याओं का समाधान तलाशना चाहिएज्

भारत-पाक सीमा से सुखद समाचार यह है कि यहां फिलहाल शांति व स्थिरता है। एक साक्षात्कार के दौरान देश के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा है, 'सीमा पर गरमाहट के माहौल में कमी आई है।' इसका तो यही अर्थ निकाला जा सकता है कि भारत-पाकिस्तान के दरमियान अंतत: संबंध सामान्य हो रहे हैं, जिसके लिए गत 70 वर्ष पूर्व विभाजन के दौरान से ही प्रयास शुरू हो गए थे। अब अगर सीमा पर ऐसी हकीकत है, तो यहां से दोनों देशों को अपने रक्षा खर्चों में कटौती का विचार करना होगा। मौजूदा समय तक तो हमने इस कटौती को लेकर कोई बहुत बड़ा बदलाव महसूस नहीं किया है। दुर्भाग्य से भारत के रक्षा मंत्री का बयान, 'भारत का सशस्त्र बल आज जितना मजबूत है, उतना कभी भी नहीं रहा है।' यही संकेत देता है कि भारत की रक्षा व्ययों को बढ़ाने में कितनी अधिक रुचि रही है। ठीक इसी तरह से पाकिस्तान ने भी अपने रक्षा संबंधी खर्चों में कोई कटौती नहीं की है। यह परिदृश्य मुझे शीत युद्ध के दौर की याद दिलाता है, जब अमरीका के रणनीतिक प्रभाव ने सोवियत संघ को अपने कुल राजस्व में अधिकतर खर्च रक्षा क्षेत्र में करने के लिए मजबूर कर दिया था। उसका नतीजा यह हुआ कि विद्यालयों-महाविद्यालयों, अस्पतालों या जन परिषदों पर खर्च के लिए ज्यादा संसाधन इसके पास नहीं रह गए थे।
यह नीति सोवियत संघ को विघटन के द्वार तक ले गई और देश कई हिस्सों में बंट गया। उदाहरण के तौर पर यूके्रन स्वतंत्र हुआ। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कई मर्तबा दोहरा चुके हैं कि यूके्रन रूस का ही हिस्सा है, लेकिन इससे जुड़ा स्वतंत्रता आंदोलन उनके इस तर्क को झुठलाता रहा है। आज रूस की कई सैन्य टुकडिय़ां इस मोर्चे पर तैनात हैं। पाकिस्तान के बारे में तो यही कहा जा सकता है कि वहां कोई भी दल सत्ता में रहा हो, उसका लोकतंत्र पर प्रभाव सीमित ही रहा है। यहां सेना अध्यक्ष का वर्चस्व चुने हुए प्रधानमंत्री से अधिक ही रहा है। कुछ तस्वीरों में खुद प्रधानमंत्री नवाज शरीफ इस हकीकत को स्वीकार करते दिखे हैं कि खाकी वाला व्यक्ति ही वहां का असली बॉस है। इस प्रकार वहां के प्रधानमंत्री भी शासन व्यवस्था की इस परिपाटी को बेझिझक स्वीकार करते रहे हैं। इस्लामाबाद की चिंता यह है कि तालिबान, पाकिस्तान को निशाना बनाने के लिए अफगानिस्तान की भूमि का इस्तेमाल करता रहा है। इस्लामाबाद इस खतरे से महफूज नहीं रह गया है। यहां हर दूसरे दिन बम धमाके या किसी अन्य तरह की हिंसात्मक घटना के कारण कई बेकसूर लोग मारे जाते हैं। इसी वजह से इस्लामाबाद के असुरक्षित व अस्थिर माहौल से चिंतित कई लोग पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में पनाह लेते हैं।
अब अगर चीन हाफिज सईद को आंतकी घोषित करने के लिए सहमत हुआ है, तो इसमें संयुक्त राष्ट्र भी चीन पर दबाव बनाने के लिए धन्यवाद का अधिकारी है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी माना है कि पाकिस्तान हाफिज सईद सरीखे कुख्यात आतंकियों से खतरा झेल रहा है, जिसे कि कुछ समय पहले घर में नजरबंद कर दिया था। अब तक इस दिशा में दिखावटी तौर पर ही कार्रवाई होती रही है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में ज्यादातर सदस्यों ने सईद को आतंकी घोषित करने में अपनी सहमति प्रदान कर दी है। आखिरकार इस्लामाबाद को भी इस बात का एहसास हो ही गया है कि हाफिज सईद किसी न किसी रूप में आतंकी नेटवर्क का हिस्सा रहा है, लेकिन यहां यह देखना भी दिलचस्प होगा कि इस्लामाबाद कब तक उसे घर में नजरबंद करके रखता है। वास्तव में वर्ष 2008 में भी मुंबई हमले के मास्टरमाइंड के तौर पर इसे घर में नजरबंद किया गया था, लेकिन अदालत ने 2009 में उसे आजाद कर दिया था। इन हालात में हमारे समक्ष आज यह सवाल मौजूद है कि क्या हमें हाफिज के पाकिस्तान में नजरबंद होने की खबरों को ज्यादा तवज्जो देनी चाहिए या इस मर्तबा वहां के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के बयान को गंभीरता से लेना चाहिए?
पाकिस्तान में बैठे विशेषज्ञ भी इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि लश्कर-ए-तोएबा के सरगना के खिलाफ यह कोई नया कदम नहीं है या पिछले 20 वर्षों में उठाया गया सबसे मजबूत कदम है। वर्ष 2001 से लेकर अब तक लश्कर-ए-तोएबा के मुखिया को कम से कम पांच बार घर पर नजरबंद रखा गया है। यदि पाकिस्तान सच में संयुक्त राष्ट्र की आतंकी संगठनों या आतंकियों की सूची को लेकर गंभीर है, तो इसे 2008 से ही सईद के खिलाफ कार्रवाई की पहल कर देनी चाहिए थी। अमरीका में रह रहे विभिन्न मुस्लिम देशों के लोग भी इस समय काफी सहमे हुए हैं, क्योंकि वे नहीं जानते कि कब उन्हें भी राष्ट्रपति द्वारा प्रतिबंधित मुस्लिम देशों की सूची में शामिल कर दिया जाएगा। अगर अमरीका में रह रहे भारतीय मूल के मुस्लिमों की बात की जाए, तो उनके लिए फिलहाल किसी तरह का संकट नजर नहीं आता, लेकिन अप्रवासी मंत्रालय अधिकारी यहां कोई भी ढील नहीं बरतेंगे। इसे दुखद ही माना जाएगा कि जब भारतीय अभिनेता शाहरुख खान अमरीका गए, तो उस दौरान उन्हें तलाशी से संबंधी कई मुश्किलों से जूझना पड़ा। हालांकि भारतीय दूतावास की सक्रियता के बाद अमरीका में उनका प्रवेश हो पाया था।
आज से कुछ वर्ष पूर्व जब मैं पश्चिमी तट से होकर अमरीका गया, तो उस समय मुझे भी कड़वे अनुभवों से होकर गुजरना पड़ा। मेरे पास उस वक्त राजनयिक पासपोर्ट था। इसके बावजूद वे मेरी गहन छानबीन की जिद पर अड़ गए। प्रवासी विभाग के अधिकारियों ने बताया कि आपका वीजा अधिकतर पाकिस्तान या बांग्लादेश में जाने के लिए उपयोग में लाया गया है। वह इस बात को वे समझ नहीं पा रहे थे कि मैं इन देशों की अधिकतर यात्रा क्यों करता था। मेरी ख्वाहिश है कि अंतिम बार चीन में नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ से मुलाकात के बाद सौहार्दपूर्ण संबंधों की जो डोर छूट गई, नई दिल्ली एक बार फिर इसे उसी सिरे से थामने की पहल करे। उसे एक सकारात्मक संवाद माना गया था, लेकिन यह सिलसिला ज्यादा लंबा नहीं चल सका, क्योंकि नई दिल्ली ने इस्लामाबाद से कहा था की थी कि वह अपनी धरती का भारत के खिलाफ आतंकवाद को पोषित करने के लिए इस्तेमाल न करे। उसके पश्चात पठानकोट और उड़ी जैसे प्रकरणों ने उन तमाम उम्मीदों पर पानी फेर दिया था।
मौजूदा संदर्भों में भारत को अपना अगला कदम उठाने से पहले देखो और इंतजार करो की नीति का अनुसरण करना चाहिए। इजरायल ने भी कमोबेश ऐसी ही इच्छा जताई है। भारत-पाक के लिए फिलहाल यही उचित होगा कि वे संवाद के टेबल पर आकर महत्त्वपूर्ण मसलों को गहन मंथन के जरिए सुलझा लें। पाकिस्तान को भी चाहिए कि कुछ वक्त के लिए कश्मीर के मसले को बीच में न घसीटे। इन दोनों को गरीबी, भुखमरी या बेरोजगारी सरीखी समसामयिक समस्याओं का समाधान तलाशना चाहिए।

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