बाघ-तेंदुए से टकराते इंसान

  • 2016-11-30 09:30:00.0
  • उगता भारत ब्यूरो
बाघ-तेंदुए से टकराते इंसान

करीब सौ साल पहले शेर-बाघ-तेंदुए इस पृथ्वी के शक्तिशाली जानवरों में से एक थे। अब वे उस स्वर्णिम अतीत की छाया भी नहीं रह गए हैं। इंसानों ने कंक्रीट की ऐसी चारदीवारी जंगलों के चारों ओर खड़ी कर दी है कि रहे-बचे असली वनों में सिमटे इस शानदार जानवर का खाना-पीना तक दुश्वार हो गया है। पर उसकी ताकत से हम अब भी खौफजदा हैं। देश की राजधानी से सटे साइबर सिटी गुरुग्राम में एक तेंदुए के उत्पात और फिर उसे ग्रामीणों द्वारा पीट-पीट कर मार डालने की घटना ने एक बार फिर इस पर विचार के लिए प्रेरित किया है कि आखिर वन्यजीवों को आबादी वाले इलाकों में आने की क्या जरूरत पड़ गई है। इस साल के आरंभ में बेंगलुरु में भी एक तेंदुए का ऐसा खौफ छाया था कि शहर के 134 स्कूलों को बंद करने का आदेश प्रशासन को देना पड़ा था।
ेये गिनी-चुनी घटनाएं नहीं हैं। जंगलों से निकल कर शहरों और कस्बों में बिल्ली प्रजाति के इस सबसे बड़े जंगली जीव की घुसपैठ के अनगिनत किस्से अखबारों में तकरीबन रोज ही छाए रहते हैं। सवाल है कि आखिर उनके सामने जंगल से बाहर निकलने और इंसानी इलाकों व इंसानी आबादी पर धावा मारने की ऐसी क्या मजबूरी आ पड़ी है? अभयारण्यों और चिडिय़ाघरों में शेर-तेंदुए अब भी दिख जाते हैं। साथ ही, बेहिसाब शहरीकरण और कटते जंगलों के कारण क्षुब्ध और भौंचक वनराज (बाघ और तेंदुए) कभी-कभार मानव आबादी के बीचोबीच भी आ ठिठकते हैं। हालांकि मनुष्य और बाघ के बीच अस्तित्व की लड़ाई के वैसे किस्से अब कहीं सुनाई नहीं पड़ते, जैसे हमारी प्राचीन लोककथाओं में भरे पड़े हैं। पर इधर कुछ हादसों ने एक बार फिर यह सवाल उठा दिया है कि शेर-तेंदुओं को खतरा हम इंसानों से है या वे खुद खतरे में हैं।

कहने को तो अब ऐसे ज्यादातर शहरों के आसपास कहीं वैसा घना जंगल भी नहीं होता है, जहां से भोजन की तलाश में भटकता हुआ यह वन्यजीव गलती से शहर में आ पहुंचता हो। पर सच्चाई यह है कि ऐसे ज्यादातर इलाके वन्यजीव अभयारण्यों के नजदीक ही हैं। गुरुग्राम में आया तेंदुआ अरावली के जंगलों से ही यहां पहुंचा होगा, हालांकि हरियाणा सरकार अरावली की पहाडिय़ों में बाघ-तेंदुओं की मौजूदगी से इनकार करती रही है। इसी तरह घुसपैठ से आक्रांत रहने वाले उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले से दुधवा नेशनल पार्क तकरीबन सटा हुआ ही है। मेरठ भी उत्तराखंड के राजाजी राष्ट्रीय वन्यजीव अभयारण्य से ज्यादा दूर नहीं है। यही हाल देश के दूसरे शहरी इलाकों का है। ये जंगली जीव अपने ठिकानों को छोड़ कर यों ही अचानक मनुष्यों के बीच हमला करने नहीं पहुंच गए। इन्हें या तो जंगल में भोजन का अभाव सता रहा होगा या शिकारियों का खतरा।

पैंथरा टिग्रिस यानी बाघ के जीवन को जिन संकटों ने अरसे से घेरा हुआ है, उन्हें हम जानते भी हैं। अंधाधुंध तरीके से जंगलों को काटा जाना एक बड़ा कारण तो है, पर संरक्षित वनों के इर्दगिर्द तेजी से बसती मानव आबादियां भी जंगलों पर दबाव बना रही हैं। यह दबाव ऐसा है कि जंगली जीवों को अपना स्वाभाविक घर छोड़ कर भोजन के लिए बस्तियों पर धावा बोलना पड़ रहा है। बाघ-तेंदुए की तरह शेरों का जीवन भी संकट में है। गुजरात का गिर शेरों के अभयारण्य के लिए जाना जाता है। लेकिन वहां मनुष्यों की आवाजाही बढ़ गई है, जिससे शेर आसपास के गांवों में भागते हैं। कुछ साल पहले इसी भागदौड़ में कई शेर खेतों की बाड़ में दौड़ते करंट के स्पर्श से मर गए। कई शेरों ने कुओं में गिर कर दम तोड़ दिया। सच्चाई यह है कि जंगलों में इंसानी दखल लगातार बढ़ रहा है। देश में कई जगहों पर जंगलों के बीच सडक़ें और रेल पटरियां मौजूद (मिसाल के तौर पर उत्तराखंड के राजाजी राष्ट्रीय वन्यजीव अभयारण्य में) हैं, जिन पर चौबीसों घंटे वाहनों का आवागमन और चिल्ल-पों वन्यजीवों की जिंदगी में खलल डाल रहा है। कई स्थानों पर जंगलों के बीच होने वाले खनन की गतिविधियों ने भी जंगली जीवों का चैन छीन लिया है। इससे वे बुरी तरह घबरा गए हैं। जंगलों का खात्मा और वन्यजीवों के जीवन में हस्तक्षेप के अलावा, जानवरों के अंगों के वैश्विक बाजार के कारण भी वे शिकारियों के निशाने पर हैं।

बाघों की संख्या में तेजी से हो रही गिरावट के संबंध में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने कुछ नए आंकड़े जारी किए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार इस साल देश भर में अब तक 78 बाघ मर चुके हैं। यह संख्या पिछले पंद्रह सालों में सबसे ज्यादा है। अपने देश के लिए यह चिंता की बात इसलिए भी है कि कम से कम बाघों के मामले में दुनिया की उम्मीद भरी नजरें हम पर ही टिकी हुई हैं। बाघों की करीब सत्तर फीसद आबादी भारत में रहती है और मध्यप्रदेश इस मामले में अव्वल माना जाता रहा है। समस्या यह है कि इसी राज्य में बाघों के रख-रखाव में सबसे ज्यादा गिरावट आई है। इस राज्य में मौजूद 78 में से 26, यानी एक तिहाई बाघ इसी दौरान मारे गए हैं।  बाघ-तेंदुओं की आबादी आज दो मुख्य कारणों से कम हो रही है। एक तो तस्करी और दूसरे उनके स्वाभाविक आवास क्षेत्र की कमी। उन्हें बचाने के लिए जो टाइगर रिजर्व बनाए जा रहे हैं, उनसे इन दोनों में से एक भी समस्या का पूरी तरह निराकरण नहीं होता। उलटे सीमित क्षेत्र में विकसित किए गए संरक्षित क्षेत्र शिकारियों और तस्करों के लिए