अपरिहार्य होते हादसे जो रोके जा सकते हैं

  • 2016-12-29 09:30:35.0
  • उगता भारत ब्यूरो

अपरिहार्य होते हादसे जो रोके जा सकते हैं

राजेंद्र प्रसाद शर्मा
सबरीमाला में फिर हुए हादसे ने पुन: हमारे प्रशासनिक तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैकि प्रशासन भीड़ के मनोविज्ञान को समझने में नाकाम रहा है। सबरीमाला में यह पहला हादसा नहीं है। आज से कोई पांच साल पहले सबरीमाला मंदिर में पूजा के दौरान मची भगदड़ में एक सौ छह श्रद्धालुओं की मौत हुई थी, वहीं करीब सौ लोग घायल हो गए थे। सबरीमाला मंदिर में सालाना आयोजन और इस अवसर पर आने वाले संभावित श्रद्धालुओं की तादाद का अनुमान प्रशासन को पहले से रहता है। लिहाजा, इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति क्षम्य नहीं मानी जा सकती।

इकतालीस दिवसीय मंडला पूजन के समापन की पूर्व-संध्या व रविवार होने के कारण मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ था। ऐसे में प्रशासन इस बात को लेकर पर्याप्त सतर्क क्यों नहीं था कि एक छोटी घटना व अफवाह किसी बड़ी दुर्घटना की वजह बन सकती है। हुआ भी यही, भीड़ की खींच-तान में बेरिकेड टूट गया और फिर भगदड़ मचने से चालीस से अधिक लोग घायल हो गए। सबरीमाला मंदिर वैसे भी महिलाओं के प्रवेश के मुद््दे पर पिछले दिनों चर्चा में रहा है और सर्वोच्च न्यायालय के दखल से महिलाओं को प्रवेश की अनुमति मिल सकी है। वैसे भी हमारा देश धर्मप्रधान देश है। तीज-त्योहारों व धार्मिक मेलों में लोग पूरे उत्साह के साथ भाग लेते हैं। यही नहीं, धर्मगुरुओं के समागम तक में अनुयायियों की भीड़ उमड़ पड़ती है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब वाराणसी में बाबा जयगुरुदेव के अनुयायियों द्वारा आयोजित समागम व शोभायात्रा के दौरान एक छोटी-सी अफवाह के चलते भगदड़ मची, जिसमें चौबीस लोगों की जान चली गई। इस कार्यक्रम में आयोजकों ने प्रशासन से चार से पांच हजार लोगों के एकत्रित होने की अनुमति ली थी, जबकि तीन लाख से अधिक लोग जुटे। वहां राजघाट पुल पर एक तो समागम में आए पैदल यात्रियों का दबाव तथा दूसरी ओर रेल की गडग़ड़ाहट के बीच पुल टूटने की अफवाह के चलते इतना बड़ा हादसा हो गया और प्रशाासन की लाचारी कहिए या और कुछ, वह मूकदर्शक बनकर रह गया।
पिछले दिनों ही तमिलनाडु और आंध्र के कुछ हिस्सों में आए चक्रवाती तूफान से, प्रशासनिक तैयारियों के चलते, जनहानि कम से कम हुई। ऐसा इसलिए हो सका, क्योंकि तूफान की पूर्व सूचना के मद््देनजर आपदा प्रबंधन की पुख्ता तैयारी की गई थी। मगर धार्मिक स्थलों पर आयोजित समारोहों में एक अफवाह से सैकड़ों लोगों की जान चली जाती है और हम देखते रह जाते हैं। दोनों ही स्थितियां इस मायने में समान हैं कि हमें पहले से पता है कि क्या होने वाला है। तूफान की भयावहता का पता होने से हमने पूरी तैयारी की और जनहानि को न्यूनतम स्तर पर लाने में सफल रहे। दूसरी ओर, मेलों व समागमों और इस तरह के अन्य आयोजनों में आने वाले श्रद्धालुओं की संभावित संख्या पता होने के बाद भी हम समुचित व्यवस्था करने में विफल रह जाते हैं, और इसका नतीजा कई बार बहुत त्रासद होता है। ऐसा नहीं है कि धार्मिक अवसरों पर इस तरह की घटना पहली बार हुई हो। यह बेहद अफसोसनाक ही कहा जाएगा कि अमूमन ऐसी त्रासदियां भगदड़ के कारण हुई हैं। 1 अक्टूबर, 2006 को नवरात्र में रतनगढ़ में भगदड़ के कारण सत्तावन लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा था। मध्यप्रदेश के दतिया में पुल टूटने की अफवाह ने सौ से ज्यादा श्रद्धालुओं की जान ले ली। पिछले सालों का इतिहास इस बात का गवाह है कि एक अफवाह किस तरह से विकराल रूप ले लेती है और फलस्वरूप होने वाली भगदड़ कइयों की मौत का कारण बन जाती है। धार्मिक आयोजनों में बार-बार हादसे होने के बावजूद हम ऐसा तंत्र विकसित नहीं कर पाए, जिससे इनकी पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

वर्ष 2003 में नाशिक के कुंभ में भगदड़ मचने से चालीस लोगों की जान गई, 2005 में महाराष्ट्र के सतारा के मंधेरी देवी मंदिर में भगदड़ के कारण सैकड़ों लोग मारे गए। 2008 में जोधपुर के चामुंडा मंदिर में भगदड़ मची और सवा दो सौ लोग दब कर मर गए। इसी तरह से 2008 में हिमाचल प्रदेश के नैनादेवी मंदिर, 2011 में केरल के सबरीमाला मंदिर, 2011 में ही हरिद्वार में गंगाघाट, 2012 में छठ पूजन के दौरान और 2013 में इलाहाबाद कुंभ के दौरान रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ से कई श्रद्धालुओं को जान से हाथ धोना पड़ा। तीन अक्टूबर, 2014 को पटना के गांधी मैदान में रावण दहन समारोह में बत्तीस लोगों की मौत हो गई। अठारह जनवरी 2014 को बोहरा समाज के धार्मिक समारोह में भगदड़ से उन्नीस लोग मारे गए। दस अगस्त 2015 को देवघर मंदिर में पूजा के दौरान भगदड़ मची थी। इसी साल दस अगस्त को कोट्टायम में समारोह के दौरान पटाखा-विस्फोट के कारण भगदड़ मची और सौ से अधिक लोगों की जान चली गई।
ये घटनाएं कोई प्राकृतिक आपदा नहीं हैं। ऐसा भी नहीं है कि इस तरह की घटनाएं पहली बार हो रही हों। यह भी नहीं कहा जा सकता कि इतनी अधिक संख्या में लोगों के आने का अनुमान प्रशासन को और आयोजकों को न रहा हो। यह भी नहीं कहा जा सकता कि असामाजिक तत्त्वों ने एकाएक ऐसा कर दिया हो। जब सारी स्थितियां पहले से स्पष्ट हों, संभावित सभी कारण पहले से सामने हों, तो फिर ऐसे वाकये आपराधिक लापरवाही के ही परिणाम कहे जाएंगे।
दरअसल, ऐसी दुर्घटनाओं से निपटने का तंत्र विकसित करने में हम अभी तक विफल रहे हैं। दुर्घटनाएं होती है, संवेदनाएं प्रकट कर दी जाती हैं, मृतकों के आश्रितों को मुआवजा दे दिया जाता है। जांच बैठा दी जाती है। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन आ जाता है। पर सब कुछ पहले की तरह चलता रहता है। इतनी दुर्घटनाओं के बावजूद, किसी जांच-रिपोर्ट में प्राप्त सुझावों को गंभीरता से लेते हुए कोई हल क्यों नहीं खोजा जा सका है?

इस धर्मप्रधान देश में तरह-तरह के धार्मिक आयोजन होते ही रहते हैं। हमें यह भी पता होता है कि अमुक आयोजन में कितने लोग आ सकते हैं। आयोजन का रूटचार्ट भी हमारे पास होता है। सरकार का अपना सूचना तंत्र भी होता है। फिर भी वहां भगदड़ मचने और लोगों के मरने का सिलसिला साल-दर-साल चलता रहा है। इस तरह की घटनाओं से यह भी जाहिर है कि भीड़ के मनोविज्ञान को समझने में भूल हो रही है। इस तरह के अवसरों के मद््देनजर आपदा प्रबंधन तकनीक विकसित होनी चाहिए, जिससे दुर्घटना की आशंका होने मात्र पर तत्काल बचाव व राहत के उपाय किए जा सकें, अफवाहों पर फौरन रोक लगाई सके। यह सब सुनिश्चित करने से ही किसी गड़बड़ी को हादसे में बदलने से रोका जा सकेगा।
सबरीमाला मंदिर में बेरिकेड टूटना गंभीर बात है। इस तरह के आयोजन करने वाले आयोजकों की भी जिम्मेदारी हो जाती है कि जब वे इतने लोगों को एकत्रित कर रहे हैं तो भीड़ को संभालने व संभावित स्थिति को तत्काल काबू में करने की व्यवस्था भी सुनिश्चित करें। इसलिए आयोजकों को भी कमोबेश दोषी माना जाना चाहिए। प्रशासन को भी ऐसे आयोजनों को गंभीरता से लेते हुए चौकस रहना होगा, ताकि कोई अनहोनी न होने पाए। यह कानून-व्यवस्था संबंधी दायित्व का ही अंग है। भीड़ को नियंत्रित करने के उपायों और वैकल्पिक रास्तों को भी चिह्नित करना होगा।