भारत के तेजस्वी राष्ट्रवाद का हो रहा है मंगलगान

  • 2016-12-14 12:30:41.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत के तेजस्वी राष्ट्रवाद का हो रहा है मंगलगान

अथर्ववेद (12/1/39) में आया है कि जिस हमारी मातृभूमि का भूतकाल में निर्माण करने वाले, विविध कर्मों का अनुष्ठान करने वाले, नई रचनाओं के करने वाले, हमारे पूर्वज तत्वदर्शी ऋषिलोग, सत्पुरूषों का पालन करने वाले, यज्ञ और तप से युक्त होकर उत्तम वाणियां बोलते रहे हैं, जिसमें हमारे पूर्वज ऋषिलोग, पांच ज्ञानेन्द्रियां, मन और आत्मा जिसमें सप्तहोता के रूप में बैठते हैं, उस मातृभूमि की हम वंदना करते हैं, अर्थात राष्ट्रवासी प्राचीन ऐतिहासिक श्रेष्ठ विद्वानों, धर्मात्माओं और तपस्वियों के जीवन, कर्म एवं विद्घत्ता से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण कार्य में जुट जावें।

वेद राष्ट्रभक्ति और प्रभुभक्ति दो गंगा-यमुनाओं की धारा का नाम है। वेद के आशय को जानने वाले समझते हैं कि वेद की 'प्रभुभक्ति' तभी सफल होती है जब उसमें 'राष्ट्रभक्ति' समाहित होती है। राष्ट्रभक्ति में 'जनभक्ति' स्वयं ही सम्मिलित है और यह 'जनभक्ति' ही लोकतंत्र है। जनभक्ति करने वाला जो कोई भी सामने आएगा वही प्रधानमंत्री ना बनकर 'प्रधानसेवक' बन जाएगा। उसके चिंतन में चौबीस घंटे जनहित व राष्ट्रहित करते हुए 'प्रभुभक्ति' का स्रोत फूटता रहेगा। प्रभुभक्ति ऐसे 'प्रधानसेवक' या राष्ट्रनायक को बल देती है, सम्बल और आत्मविश्वास प्रदान करती है और राष्ट्रभक्ति उसे जननायक बनाती है। जब व्यक्ति 'जननायक' बन जाता है तो उसकी वाणी में ऐसा ओज समा जाता है कि सारा राष्ट्र उसके संकेत पर नाचने लगता है। यही स्थिति 'दिलों पर हुकूमत' करने वाली स्थिति होती है। इसी के लिए भारत जाना जाता है और भारत के राष्ट्रनायक जाने जाते हैं।

हमने राष्ट्रभक्तों से भी बढक़र तेजस्वी राष्ट्रनिर्माताओं की पूजा की है। तेजस्वी राष्ट्रभक्ति से राष्ट्रभक्ति की भावना उतनी ही छोटी होती है जितने मोदी से मनमोहनसिंह 'छोटे' सिद्घ हो चुके हैं। मनमोहन सिंह की राष्ट्रभक्ति कभी भी तेजस्वी राष्ट्रभक्ति नहीं बन पायी। बस यही उनकी दुर्बलता रही।
आज देश तेजस्वी राष्ट्रभक्ति से दैदीप्यमान है। इसका आत्मविश्वास देखने योग्य है। यह उचित ही है कि एक देश अपनी अखण्डता और राष्ट्रीय एकता को छिन्न-भिन्न करने वाले शत्रुओं के प्रति बड़े तेजस्वी शब्दों में कह दे कि-'उसके पास भी परमाणु बम के पहले प्रयोग करने के विकल्प खुले हैं।' सचमुच आज लगता है कि पराजित मानसिकता के साथ देश का नेतृत्व करने वाले उन नेताओं के दिन लद गये हैं जो बात-बात पर शांति के नाम पर पीछे हटते रहे, और जो शत्रु हमें जीने नही दे रहे थे उन्हें मिटाने हेतु पराक्रम न दिखाकर वे उनके सामने 'जीओ और जीने दो' की बात करते रहे कि भारत अपनी इसी नीति का पालन करेगा।

यह कैसी राष्ट्रभक्ति थी कि जो हम जिओ और जीने दो की बात कर रहे थे और तब कर रहे थे जब वे हमारे बार-बार थप्पड़ मारते जा रहे थे। उन्होंने हमारी 'जिओ और जीने दो' की नीति का उपहास करने में कोई कमी नही छोड़ी। हमारा ओज बुझ गया, तेज शांत हो गया। राष्ट्रीय नेतृत्व फीका हो गया और जनता किंकत्र्तव्यविमूढ़ की स्थिति में आ गयी।
तब एक आश्चर्यचकित घटना घटी, ऐसी घटना जिसने सारे विश्व को आश्चर्यचकित कर के रख दिया, भारत में पश्चिम से सूर्य उदय हुआ, गुजरात की पवित्र भूमि की ओर सबका ध्यान गया, देखा आकाश में पौ फट रही थी और उस पौ ने 'नरेन्द्र' दिया। आज उसी 'नरेन्द्र' के नाम से अमरीका का नया राष्ट्रपति भारत को जानता है और भारतीय मूल के लोगों से उसी के नाम से वोट मांगता है, कहता है कि मैं हिंदू और हिन्दुस्तान का सम्मान करता हूं, इतना ही नही 'सबका साथ सबका विकास' कहकर उसने यह भी सिद्घ कर दिया कि मैं हिंदी का भी सम्मान करता हूं। बात साफ हो गयी कि हिंदू, हिंदी, हिंदुस्तान अमेरिका में भी छा गया और भारत के प्रधानमंत्री का नाम राष्ट्रीयता का प्रतीक बन गया। भारत के विश्वगुरू बनने का और क्या प्रमाण चाहिए?
भारत 'पुनरूज्जीवी पराक्रम' को अपनाने वाला देश रहा है, यह कभी निराश नही होता है, हताश और उदास नही होता है, क्योंकि यह उजालों का उपासक देश है। यह ऐसे ही नही है कि इस देश ने अपनी सबसे पहली राजधानी का नाम अवध (जहां कोई वध हिसा नही होती) रखा तो पहले राजवंश का नाम सूर्यवंश (उजालों का प्रतीक) रखा।
इसने अहिंसा को अपना राष्ट्रधर्म बनाया और सूर्य को अपना उपासक देव बनाया। किसलिए? स्पष्ट है कि इसने तेजस्वी राष्ट्र का निर्माण करना अपना लक्ष्य बनाया जो सूर्य के तेज की भांति बीमारियों (आतंकवादियों, राक्षसों, देश के शत्रुओं, देशघातक, चोर डकैतों, जमाखोरों, भ्रष्टाचारियों आदि) का अंत करना चाहता था।

आज का भारत अपने सूर्यवंश की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए कृतसंकल्प है। सूर्य पश्चिम से निकला है और शत्रु संतापक सिद्घ हो रहा है, भारत 'पुनरूज्जीवी पराक्रम' (गिरकर उठने और उठकर जीने का संकल्प लेने वाला) के साथ आगे बढ़ रहा है। आज इसके एक हाथ में शास्त्र है तो एक हाथ में शस्त्र भी है। यह 'सत्यमेव जयते' के साथ-साथ 'शस्त्रमेव जयते' की आवश्यकता को भी अनुभव करते हुए आगे बढ़ रहा है और कदाचित इसी को इसका तेजस्वी राष्ट्रवाद कहना उचित होगा। जापान ने हमको साथ देने का वचन नही दिया है-याद रखो उसने हमारे 'तेजस्वी राष्ट्रवाद' को नमन किया है। ट्रंप ने हमारी चर्चा नही की है उन्होंने भी हमारे 'तेजस्वी राष्ट्रवाद' का अभिनंदन किया है, चीन हमारे सामने चुप नही है-वह भी सवा सौ करोड़ लोगों के 'तेजस्वी राष्ट्रवाद' के समक्ष मौन है, पुतिन हमारे साथ नही है, वह भी हमारे 'तेजस्वी राष्ट्रवाद' के साथ है। सचमुच भारत के तेजस्वी राष्ट्र का आज सभी दिशाएं मंगलगान कर रही हैं। किसी शायर ने क्या खूब कहा है:-
'जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है, मुर्दादिल भी क्या खाक जिया करते हैं।'