रियो का रंज भूल, टोक्यो की करें तैयारी

  • 2016-08-24 06:30:12.0
  • कुलदीप नैयर
रियो का रंज भूल, टोक्यो की करें तैयारी

भविष्य की ओर देखते हुए भारत को ओलंपिक की रणभूमि में शानदार उपलब्धियां हासिल करने के लिए ओलंपिक में सभी खेलों में पैसा बर्बाद करने के बजाय कुछ चयनित खेलों में अभी से युवा प्रतिभाओं का चयन कर लेना चाहिए। जिस वर्तमान नीति को भारत सरकार ने अपनाया है, उससे हटकर एक विशेष खेल नीति बनानी होगी, जो खिलाडिय़ों का सुरक्षित भविष्य भी सुनिश्चित करे। टुकड़ों में प्रोत्साहन से मेडल नहीं झटके जा सकते। रियो के नकारात्मक अनुभवों को भूल जाइए और आज से ही टोक्यो ओलंपिक की तैयारियों में जुट जाइए.

यह सोचने का विषय है कि ओलंपिक-2016 में भारत अब तक केवल दो ही पदक क्यों जीत पाया है। जब ओलंपिक खेल शुरू हुए, तो विशाल भारतीय दल से बहुत ज्यादा उम्मीदें थीं, लेकिन जब प्रदर्शन की बारी आई, तो एक-एक कर ये तमाम उम्मीदें बिखरती दिखने लगीं। हाकी का जो खेल हमने पश्चिम को सिखाया, उस खेल की चुनौती में भी आज यह उपमहाद्वीप कहीं नजर नहीं आता। हाकी को आकर्षक बनाने के नाम पर नियमों में अपनी सहूलियत के हिसाब से बदलाव करके पश्चिम ने इस पर अपना एकाधिकार जमा लिया है। लेकिन आज यदि हाकी में भारत का प्रदर्शन लगातार नीचे गिर रहा है

, तो इसके लिए एकमात्र कारण नियमों में बदलाव नहीं ठहराया जा सकता। इस समस्या का मूल हमारे खिलाडिय़ों में स्टेमिना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी है।

हालांकि पुरुषों की टीम महिलाओं की अपेक्षा मजबूत दिखती है, लेकिन इसके बावजूद इन्हें भी कड़े परिश्रम की जरूरत है। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले कुछ वर्षों में हाकी में हमारी स्थिति विश्व के छोटे देशों सरीखी हो जाएगी। बड़ी जनसंख्या वाला देश होने के बावजूद भारत ओलंपिक खेलों की पदक तालिका में काफी नीचे है। इसके पीछे कई और कारण भी जिम्मेदार हैं। मोटे तौर पर भारत के राज्यों में खेल का सालाना बजट 250 करोड़ और केंद्र का बजट 1500 करोड़ रुपए के करीब रहता है। कुछ राज्यों में खेल अधोसंरचना का विकास तो हुआ है, लेकिन उनकी उचित देखरेख और नियमित उपयोग पर विशेष ध्यान नहीं दिया जा सका है। राज्य व केंद्र खेलों के प्रति समग्र दृष्टिकोण विकसित नहीं कर पाए हैं। इसी का नतीजा है कि बजट में खेलों को महज एक मद के तौर पर शामिल किया जाता रहा है, जबकि किसी एक खेल में उत्कृष्टता हासिल करने के लिए कोई खास प्रयास नहीं किए जा सके हैं।

क्रिकेट में हम जरूर बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, क्योंकि इसके प्रति जनता इतनी दीवानी दिखती है, जितनी कि एक समय हाकी के प्रति थी। यह दर्शाता है कि देश में खेल संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कभी समुचित योजना या वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित नहीं किया जा सका। वर्ष 1980 में मास्को में खेले गए ओलंपिक तक हाकी भारत में एक प्रतिष्ठित खेल था, जब भारतीय टीम ने ओलंपिक में अपना आठवां व अंतिम स्वर्ण पदक जीता था। उसके बाद से भारत का इस खेल में प्रदर्शन लगातार गिरता गया और फिर उसके बाद आज तक भारत कभी ओलंपिक के सेमीफाइनल में भी जगह नहीं बना सका है। इसकी तुलना में 1983 में भारतीय क्रिकेट टीम ने अपना पहला विश्व कप जीता था और उसके बाद से इस खेल के प्रति जुनून बढ़ता गया। आज क्रिकेट कई उपलब्धियां हासिल कर चुका है और इसमें नए-नए प्रारूप जुडऩे से यह खेल बेहद लाभदायक बन चुका है। यही वजह है कि भारत में क्रिकेट धर्म की तरह पूजा जाता है। क्रिकेट को नियंत्रित करने वाले बोर्ड (बीसीसीआई) के पास आज इतनी ज्यादा दौलत है कि क्रिकेट के प्रचार-प्रसार के लिए कभी सरकारी इमदाद की जरूरत भी महसूस नहीं हुई।

इसी दौरान खेलों, विशेषकर क्रिकेट में राजनीति काफी गहरे तक घर कर चुकी है। हर राजनीतिक दल का कोई न कोई नेता खेल संघों के पदों पर काबिज नजर आता है। क्रिकेट भी इसका अपवाद नहीं है। इसका खेलों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है, क्योंकि खेल संघों के पदों पर विराजमान राजनेताओं द्वारा इनका इस्तेमाल खुद के नाम व ख्याति के लिए किया जाता रहा है। इसे भी दुर्भाग्यपूर्ण ही माना जाएगा कि हर खेल संघ ने पैसा जुटाने के चक्कर में किसी शीर्ष के स्तर के नेता या नौकरशाह की मदद ली है। बदले में इन नेताओं ने भी संघ द्वारा सौंपे गए पद का इस्तेमाल अपने कद व महत्त्व को बढ़ाने के लिए किया है। दूसरे शब्दों में कहें, तो ऐसी स्थिति में दोनों ही पार्टियों की जीत होती है। अभी हाल ही में न्यायाधीश लोढा की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों को देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनाया गया फैसला आंखें खेल देने वाला है। इस समिति की सिफारिशों को भविष्य में लागू किया जाना है, जिनके तहत बीसीसीआई व अन्य खेल संघों में उच्च पदों पर राजनेताओं की नियुक्तियों पर पाबंदी होगी। यह एक खुला रहस्य है कि शरद पवार, अरुण जेटली, फारूक अब्दुल्ला, राजीव शुक्ला जैसे कई अन्य राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोग इन संस्थाओं में उच्च पदों पर आसीन रहे हैं। इन लोगों को खेल संस्थाओं में उच्च पद इसलिए मिले, क्योंकि ये उच्च अधिकारियों या अन्य स्रोतों से फंड जुटाने में हर तरह से समर्थ थे।

जब ऐसे लोगों को इन पदों से हटा दिया जाता है, तो राज्य से इन संघों को काफी कम वित्तीय सहायता मिल पाती है। यदि क्रिकेट को एक अपवाद के तौर पर छोड़ दें, तो कारपोरेट जगत से इन संघों को होने वाली फंडिंग भी नाम की ही होती है। इस सबके बीच सबसे बड़ी खामी यह है ग्रामीण क्षेत्रों में खेलों के विकास के प्रति उपेक्षित दृष्टिकोण। भारतीय गांव ऐसा स्थान हैं, जहां खेल प्रतिभाएं बहुतायत में उपलब्ध हैं, लेकिन इन्हें सही ढंग से तराशने की कभी कोशिश ही नहीं हुई। कुल मिलाकर इसे देश का दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि यहां उन्नत खेल संस्कृति विकसित नहीं हो पाई है। कनिष्ठ स्तर के अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों के लिए फंड मुहैया करवाने से हाथ खींचकर सरकार ने खेल संघों की मुश्किलों को और भी बढ़ा दिया है। युवा प्रतिभाओं को यथोचित सहायता दिए बगैर सरकार खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन की उम्मीद कैसे कर सकती है। टीओपीएस के तहत क्वालिफाई करने वाले ओलंपियनों को महज 300 करोड़ की राशि आबंटित करके और वह भी रियो ओलंपिक से तीन महीने पहले, इन खेलों में हमारा प्रदर्शन बेहतर नहीं हो सकता था। कई वर्षों तक सतत् प्रयास व पर्याप्त फंड्ज उपलब्ध करवाना हमें पदक दिलाने में सहायता कर सकता है। चीन का ही उदाहरण ले लीजिए।

वह बहुत कम उम्र की युवा प्रतिभाओं को चुनकर उनके हुनर को तराशने का कार्य शुरू कर देता है। जिस वक्त वे खिलाड़ी राष्ट्रीय केंद्रों में प्रशिक्षण के लिए जाते हैं, तभी से उनकी देखरेख का सारा दायित्व राज्य के कंधों पर आ जाता है और उसके पश्चात उन्हें बाकी कोई चिंता नहीं रह जाती है। यहां तक कि उनकी पढ़ाई का जिम्मा भी सरकार खुद उठाती है, लेकिन भारत में खेल की कीमत पर पढ़ाई-लिखाई को आगे बढ़ाया जाता है।

पदकों के सूखे से जूझ रहे भारत में दीपा कर्माकर सरीखी कई उम्मीदें भी उभरकर सामने आई हैं, जो ओलंपिक में क्वालिफाई करने वाली पहली भारतीय जिम्नास्ट का गौरव हासिल करके पहले ही इतिहास बना चुकी हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने जिम्नास्ट की वॉल्ट स्पर्धा में फाइनल तक का सफर तय किया। फाइनल में चौथा स्थान हासिल करना भारतीयों को उनके द्वारा पदक जीतने सरीखा एहसास ही करवा गया, क्योंकि प्रशिक्षण सुविधाओं में कमी के बावजूद उन्होंने इस शिखर तक पहुंचने का साहस दिखाया। भविष्य की ओर देखते हुए भारत को ओलंपिक की रणभूमि में शानदार उपलब्धियां हासिल करने के लिए ओलंपिक में सभी खेलों में पैसा बर्बाद करने के बजाय कुछ चयनित खेलों में अभी से युवा प्रतिभाओं का चयन कर लेना चाहिए। जिस वर्तमान नीति को भारत सरकार ने अपनाया है, उससे हटकर एक विशेष खेल नीति बनानी होगी, जो खिलाडिय़ों का सुरक्षित भविष्य भी सुनिश्चित करे। टुकड़ों में प्रोत्साहन से मेडल नहीं झटके जा सकते। रियो के नकारात्मक अनुभवों को भूल जाइए और आज से ही टोक्यो ओलंपिक की तैयारियों में जुट जाइए।